चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२७ (१८) सिर, पार्श्व और स्कन्ध मे शूल होने पर-नस्य, धूमपान, भोजन के पश्चात् स्नेहपान, अभ्यग के लिये तैल और बस्तिकर्म करे । पित्त से दूषित रक्त को जलौका, कफ से दूषित को अलाबु, वात से दूषित को शृङ्ग द्वारा, अथवा अति दूषित व्यापक रूप मे रक्त को शिरावेध से निकाले ॥ ८०-८२ ॥ प्रदेहः सघृतश्चेष्टः पद्माकोशीरचन्दनैः । दूर्वामधुकमञ्जिष्ठाकेशरैर्वा घृताप्लुतैः ॥ ८३ ॥ प्रपौण्डरीकनिर्गुण्डीपद्मकेशरमुत्पलम् । कशेरुकाः पयस्या च ससर्पिष्क प्रलेपनम् ॥ ८४ ॥ (६) पद्माख, खस, चन्दन इनको घी मे मिलाकर अथवा दूब, मुलहठी, मजीठ और नागकेशर इनको घी मे मिला कर प्रलेप करे । (१०) पुण्डरीक काष्ठ, सम्भालु, पद्म ( कमल ), नागकेसर ( अथवा कमल-केसर ), नीलोत्पल, कशेरु, क्षीरकाकोली इन्हे पीस कर घी के साथ मिलाकर लेप करे ॥ ८३-८४ ॥ चन्दनाद्येन तैलेन शतधौतेन सर्पिषा । अभ्यङ्गः पयसा सेकः शस्तश्च मधुकाम्बुना ॥ ८५ ॥ माहेन्द्रेण सुशीतेन चन्दनादिशृतेन वा । परिषेकः प्रयोक्तव्य इति सशमनी क्रिया ॥ ८६ ॥ इति संशमनी क्रिया । (११) चन्दनाद्य तैल, अथवा शतधौत घृत का अभ्यग उत्तम है । दूध या मुलहठी के क्वाथ का परिषेचन हितकारी है । (१२) सुशीतल वर्षोजल से अथवा चन्दनादि गण ( चन्दनाद्य तैलोक्त ) के क्वाथ से परिषेचन करे । यह सशमन चिकित्सा का उपदेश कर दिया ॥ ८५-८६ ॥ दोषाधिकानां वमनं शस्यते सविरेचनम् । स्नेहस्वेदोपपन्नाना सस्नेहं यन्न कर्षणम् ॥ ८७ ॥ (१३) यक्ष्मा के जिन रोगियो मे दोष की अधिकता हो उनको प्रथम स्ने- हन और स्वेदन कराके पीछे से स्नेहयुक्त वमन और स्नेहयुक्त विरेचन देवे । परन्तु ये वमन-विरेचन ऐसे होने चाहिये जिनसे रोगी का शरीर कृश या निर्बल न हो जाय ॥ ८७ ॥ शोषी मुञ्चति गात्राणि पुरीषस्रंसनादपि । अबलापेक्षिणीं मात्रा कि पुनर्यो विरिच्यते ॥ ८८ ॥ यक्ष्मा रोगी मल के स्रसन ( छूटकर लगने ) मात्र से मर जाता है । इस- लिये रोगी के बल की अपेक्षा न करके दी गई विरेचन की मात्रा का क्या