भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 399

३८४ चरकसंहिता [अ० ६ व्यायामयोगैर्विविधैः प्रगाढैरुद्वर्तनैः स्नानजलावसेकैः। सेव्यत्वगेलागुरुचन्दनाद्यैर्विलेपनैश्चाशु न सन्ति मेहाः ॥५०॥ क्लेदश्च मेदश्च कफश्च वृद्धः प्रमेहहेतुः१ प्रसमीक्ष्य तस्मात् । वैद्येन पूर्वं कफपित्तजेषु मेहेषु कार्याण्यपतर्पणानि ॥ ५१ ॥ या वातमेहान्प्रति पूर्वमुक्ता वातोल्बणाना विहिता क्रिया सा । वायुर्हि मेहेष्वतिकर्पिताना कुर्यात्यसाध्यान् प्रति नास्ति चिन्ता॥५२॥ येर्हेतुभिर्ये प्रभवन्ति मेहास्तेषु प्रमेहेषु न ते निषेव्याः । हेतोरसेवा विहिता यथैव जातस्य रोगस्य भवेच्चिकित्सा ॥ ५३ ॥ (१०) पशु-पक्षियो के शलाका पर भुने मास, जो से बने नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थ खावे । रुतर्पण से उत्पन्न प्रमेहो का सशोधन, अरिष्ट, कषाय, अवलेहो द्वारा शान्त करे । (११) भुने हुए जौ को, सूखे सत्तूओ का, मूग ओर आवलो के आहार को नित्य खाने से प्रमेह, श्वित्र, कुष्ठ, कफ रोग ओर मूत्रकृच्छू नही होते । (१२) सन्तर्पण से उत्पन्न रोगो मे तथा मेदस्वी पुरुषो के लिये विरूक्षण योग जो पहिले सन्तर्पणीय अध्याय मे तथा 'अष्टौ-निन्दिताय' अध्याय मे कहे है, उनका कफज ओर पित्तज प्रमेहो मे प्रयोग करे । (१३) नाना प्रकार की व्यायामों से, बलपूर्वक मर्दन से, स्नानजल के परिषेक से, खस, दालचीनी, इलायची, अगरु, चन्दन आदि के लेपन से प्रमेह नष्ट होते है। (१४) प्रवृद्ध क्लेद, मेद और कफ प्रमेह के कारण है, इसलिये वैद्य को चाहिये कि कफ-पि- त्तज प्रमेहो मे अपतर्पण करे । (१५) वात-प्रमेहो की जो चिकित्सा प्रथम कही है, वही चिकित्सा वाताल्बण प्रमेही की होनी चाहिये । क्योकि प्रमेहो मे अत्य- धिक कर्षण होने से वायु प्रकुपित हो जाती है, इसलिये ये वाताल्बण है। असाध्य वातजन्य प्रमेहो का चिकित्साविधि मे विचार करना व्यर्थ है । (१६) जिन जिन कारणों से प्रमेह उत्पन्न होता है, प्रमेही को चाहिये कि उनका सेवन न करे । जैसे—स्वस्थ पुरुषो मे रोगोत्पत्ति के कारणों को सेवन न करने का विधान है उसी प्रकार यहा भी कारणों को सेवन न करना ही चिकित्सा है ॥ ४७-५३ ॥ हारिद्रवर्णं रुधिरं च मूत्रं विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूपैः । यो मूत्रयेत्तं न वदेत्प्रमेहं रक्तस्य पित्तस्य हि स प्रकोपः ॥५४॥ १ 'नाशं प्रयाति' इति च पाठ ।