चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८३ ( ७ ) लोध्रासव—लोध्र, कचूर, पोहकरमूल, छोटी इलायची, मूर्वा मूल, बायविडंग, त्रिफला, अजवायन, चविका, फल प्रियंगु, क्रमुक (सुपारी या पट्टिका लोध्र), इन्द्रायण, चिरायता, कुटकी, भार्गी, तगर, चीतामूल, पिप्पलीमूल, कूठ, अतीस, पाठा, इन्द्रजा, नागकेसर, इन्द्रसाह्वा ( छोटी इन्द्रायण ), नखी, तेज- पत्र, कालीमिर्च, प्लव ( केवटी मोथा ) प्रत्येक वस्तु १ कर्ष लेकर दो द्रोण पानी में क्वाथ करे। चतुर्थांश ( ( २ आढक ) रहने पर छान ले। इसमें एक आढक मधु मिला कर घी से भावित पात्र में डाल कर पन्द्रह दिना तक सन्धान करके रख दे। मात्रा—दो पल है, यह लोध्रासव कफजन्य, पित्तजन्य प्रमेहो का, पाण्डुरोग, अर्श अरुचि, ग्रहणीरोग, किलास और नाना प्रकार के कुष्ठ का नष्ट करता हे ॥४१-४४॥ क्वाथः स एवाष्टपले च दन्त्या भल्लातकानां च चतुष्पलं स्यात् । सितोपला त्वष्टपला विशेषः क्षौद्रं च तावत्पृथगासवौ तौ ॥ ४५ ॥ ( ८) दन्त्यासव—पूर्वोक्त लोध्रासव के क्वाथ में दन्तीमूल के आठ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा ( १ आढक ) मिला कर रखे। यह दन्त्यासव है। ( ६ ) भल्लातकासव—लोध्रासवोक्त क्वाथ आधा द्रोण, विशुद्ध भिलावा का चूर्ण ४ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा डाल कर सन्धान करे। ये दोनो आसव कफजन्य और पित्तजन्य प्रमेहा को नष्ट करते है ॥ ४५ ॥ सारोदकं वाथ कुशोदकं वा मधूदकं वा त्रिफलारस वा। शीधु पिबेद्वा निगदं प्रमेही माध्वीकमग्र्यं चिरसंस्थितं वा ॥४६॥ ( १० ) षडगपानीय विधि से खैर की लकडी का सावित जल, कुशा मूल का जल ( क्वाथ ), शहद का शरबत, त्रिफला का क्वाथ या रस, दोष रहित शीधु ( जौ का मद्य ), या पुरातन श्रेष्ठ माध्वोक ( मधु या द्राक्षा आदि से बना मद्य ) पीवे ॥ ४६ ॥ मांसानि शूल्यानि मृगद्विजानां खादेद्यवानां विविधांश्च भक्ष्यान् । संशोधनाविष्टकषायलेहैः सन्तर्पणोत्थान् १ शमयेत्प्रमेहान् ॥४७॥ भृष्टान् यवान् भक्षयतः प्रयोगाच्छुष्कांश्च सक्तून्न भवन्ति मेहाः । श्वित्रं च कुष्ठं च कफ च कृच्छ्रं तथैव मुद्गामलकप्रयोगात् ॥४८॥ सन्तर्पणोत्थेषु गदेषु योगा मेदस्विना ये च मयोपदिष्टाः । विरूक्षणार्थं कफपित्तजेषु सिद्धाः प्रमेहेष्वपि ते प्रयोज्याः ॥४९॥ १ सतर्पणज्ञ इति च पाठः ।