चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४१८ चरकसंहिता [ अ० ८ कास, स्वरभेद और अरुचि उत्पन्न करता है। पार्श्व मे स्थित पार्श्वशूल को गुदा मे स्थित होकर अतीसार को, सन्धियों मे स्थित वायु जम्भाई और ज्वर को, उरः मे स्थित वायु छाती मे दर्द को उत्पन्न करता है। उरः (फेफड़ों) मे छत होने से रोगी के खांसते समय कफ से मिला रक्त बाहर आता है। छाती के जर्जरित होने से कष्ट के साथ कफ निकलता है। साहसिक यक्ष्मा इन कारणो से उत्पन्न होता है, यह यक्ष्मा ग्यारह लक्षणो सहित होता है। इसलिये अपने सामर्थ्य को जानने वाला पुरुष कभी साहस नही करे ॥ १४-१६ ॥ ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् । वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः ॥ २० ॥ तदा वेगप्रतीघातात्कफपित्ते समीरयन् । ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव १ विकारान्कुरुतेऽनिलः ॥ २१ ॥ प्रतिश्यायं च कासं च स्वरभेदमरोचकम् । पार्श्वशूलं शिरःशूलं ज्वरमंसावमर्दनम् ॥ २२ ॥ अङ्गमर्दं मुहुश्छर्दि वर्चोभेदं त्रिलक्षणम् । रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मा यैरुच्यते महान् ॥ २३ ॥ (२) वेग-सन्धारण से उत्पन्न यक्ष्मा—लज्जा से, घृणा से वा भय के कारण जब मनुष्य वायु, मूत्र तथा मल के उपस्थित वेगो को रोकता है, तब वेगों के रुक जाने से प्रकुपित वायु कफ और पित्त को ऊपर, नीचे, तिरछे तीनों गतियों मे प्रेरित करके अनेक विकारो को उत्पन्न करता है। तब प्रतिश्याय, कास, स्वरभेद, अरोचक, पार्श्वशूल, शिरःशूल, ज्वर, कधो मे पीड़ा, अंगमर्द बार बार वमन, अतीसार ये नाना विकार तीनो लक्षणो से उत्पन्न होते हैं। राजयक्ष्मा के ये ग्यारह रूप है, जिनको देख कर राजयक्ष्मा महान् रोग कहा जाता है ॥ २०-२३ ॥ हर्षोत्कण्ठाभयत्रासक्रोधशोकातिकर्शनात् । व्यवायान्शनाभ्या च शुक्रमोजश्च हीयते ॥ २४ ॥ ततः स्नेहक्षयाद्वायुर्वृद्धो दोषानुदीरयन् ॥ प्रतिश्यायं ज्वरं कासमङ्गमर्दं शिरोरुजम् ॥ २५ ॥ श्वासं विड्भेदमरुचि पार्श्वशूलं स्वरक्षयम् । करोति चांससन्तापमेकादशमिमान् गदान् ॥ २६ ॥ १ 'तिर्यगधः कुर्याद्' इति च