चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७ कुमारो ने उसकी चिकित्सा की । इस प्रकार रोग से मुक्त चन्द्रमा विशेष रूप से शोभित होने लगा, उसका ओज बढने लगा और शुद्ध सत्त्व ( मन ) को प्राप्त हुआ । क्रोध, यक्ष्मा, ज्वर, रोग ये सब एक ही अर्थ को बतलाते है । यह रोग सबसे प्रथम नक्षत्रराज चन्द्रमा को हुआ, अतएव राजयक्ष्मा नाम से कहा जाता है। यह यक्ष्मा रोग अश्विनीकुमारो के हुकार से भयभीत होकर मनुष्य- लोक मे आगया । यह चार प्रकार के कारणो का प्राप्त करके मनुष्यो मे प्रवेश कर जाता है ॥ ८-१२ ॥ अयथाबलमारम्भ वेगसन्धारणं क्षयम् । यक्ष्मणः कारणं विद्याच्चतुथं विषमाशनम् ॥ १३ ॥ यक्ष्मा के चार कारण—( १ ) अपने बल वा शक्ति से अधिक कार्य करना, ( २ ) वेगो का रोकना, ( ३ ) धातुक्षय और ( ४ ) विषम भोजन, राजयक्ष्मा के ये चार कारण है ॥ १३ ॥ युद्धाध्ययनभाराध्वलङ्घनलवनादिभिः । पतनैरभिघातैर्वा साहसर्वा तथाऽपरः ॥ १४ ॥ अयथाबलमारम्भेर्जन्तोरुरसि विक्षते । वायुः प्रकुपितो दोषावुदीर्योभौ विधावति ॥ १५ ॥ स शिरःस्थः शिरःशूल करोति गलमाश्रितः । कण्ठोद्ध्वंस च कास च स्वरभेदमरोचकम् ॥ १६ ॥ पार्श्वशूलं च पार्श्वस्थो वर्चोभेदं गुदे स्थितः । जम्भा ज्वरं च सन्धिस्थ उरस्थश्चोरसो रुजम् ॥ १७॥ क्षोभनाच्चोरसो रक्तं कासमानः कफानुगम् । जर्जरेणोरसा कृच्छ्रमुरःशूली निरस्यति ॥ १८ ॥ इति साहसिको यक्ष्मा रूपैरेतैः प्रपद्यते । एकादशभिरात्मज्ञः सेवेतातो१ न साहसम् ॥ १९ ॥ ( १ ) शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न क्षय—खूब युद्ध करना, खूब अध्ययन ( पढना ), बहुत भार उठाना, बहुत मार्ग चलना, बहुत लङ्घन, बहुत लवन ( कूदना ), गिरना, चोट लगना, साहस तथा शक्ति से बाहर के अन्यान्य कार्य करने पर पुरुष की छाती मे क्षत हो जाता है। तब प्रकुपित वायु-पित्त और कफ दोनो दोषो को उदीर्ण करके इधर-उधर भागता है। शिर मे पहुच कर शिरःशूल उत्पन्न करता है, गले मे आश्रित होकर कण्ठोद्ध्वंस, १. 'भजेत्तस्मात्' इति वा पाठः ।