चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८१ क्वाथ-योग श्लोक के चतुर्थांशो में कहे गये है । इनको शहद के साथ मिलाकर प्रयोग करे । ये पित्तनाशक है ॥ ३०-३२ ॥ सर्वेषु मेहेषु मतौ तु पूर्वौ कषाययोगौ विहितास्तु सर्वे । मन्थस्य पाने यवभावनाया स्युर्भोजने पानविधौ पृथक्च ॥ ३३ ॥ सिद्धानि तैलानि घृतानि चैव देयानि मेहेष्वनिलात्मकेषु । मेदः कफश्चैव कषाययोगैः स्नेहेश्च वायुः शममेति तेषाम् ॥ ३४ ॥ ( १) सब से पूर्व (दार्बी और सुराह्वा) कहे दो योगो को सब प्रकार के प्रमेहो मे देवे । इन बाईस प्रयोगो को मन्थ के पान मे, जौ की भावना देने मे, भक्ष्य और पेय पदार्थों के सस्कार मे विवेचनापूर्वक देवे । ( २ ) वात प्रमेह में इन्हीं कषायो से सिद्ध घी और तैल का प्रयोग करे । इन कषाया से मेद और कफ शान्त होते हे और स्नेहन से वायु शान्त होता है ॥ ३३-३४ ॥ [ वातज और कफपित्तज मे यापन के लिये कषाय पीये वसामेह में अग्निमन्थ का, मज्जामेह मे गिलोय और चीते का, उसमे कूठ, कुड़ा, पाठा और कटुरोहिणी मिला ले । हस्तिमेह मे हाथी, शूकर, गधा, ऊट इनकी अस्थि के सार का उपयोग करे । मधुमेह मे कदर और खदिर का, कफानुगतादि मेहो मे तदनुसार उपदेश किये कषायो से साधित तैलो का उपयोग करे ओर पित्तानु- गत म घृत और यमको का प्रयोग करे—अष्टाग-स० ] । कम्पिल्लसप्तच्छदशालजानि बैभीतरौहीतककौटजानि । कपित्थपुष्पाणि च चूर्णितानि क्षौद्रेण लिह्यात्कफपित्तमेही ॥ ३५ ॥ पिबेद्रसेनामलकस्य वापि कल्कीकृतान्यक्षसमानि काले । जीर्णे च भुञ्जीत पुराणमन्नं मेही रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ॥ ३६ ॥ ( ३ ) कफ प्रमेह और पित्त-प्रमेह मे—कमीला, सतवन की छाल, शाल की लकडी इनका चूर्ण या बहेडा, रोहेडा की छाल, कुटज की छाल इनका चूर्ण अथवा कैथ के फूलो के चूर्ण को मधु के साथ चाटे । अथवा इन्ही तीनो योगो मे से एक का चूर्ण ( एक कर्ष ) करके आवले के रस के साथ पीवे । औषध के जीर्ण होने पर पुराने शालि आदि के भात को जगल पशु-पक्षियो के स्वादु मास-रसो के साथ खावे ॥ ३५-३६ ॥ दृष्ट्वाऽनुबन्धं पवनात्मकस्य पित्तस्य वा स्नेहविधिर्विकल्प्यः । तैलं कफे स्यात्त्वकषायसिद्धं पित्ते घृतं पित्तहरैः कषायैः ॥ ३७ ॥ वायु के साथ पित्त या कफ का अनुबन्ध देखकर स्नेह विधि मे भेद करना चाहिये । अर्थात् कफ मे कफघ्न औषधियो के कषाय मे सिद्ध तैल बरते । पित्त का अनुबन्ध होने पर पित्तघ्न ओषधियो के कषाय मे सिद्ध घृत बरते ॥३७॥