चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७१
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७१ फलप्रद अरिष्ट प्रयोगो का ग्रहणी तथा अर्शरोग की चिकित्सा मे कहेगे । जो चूर्ण ओर गुटिकाये वातगुल्म मे कही है, उनमे यवक्षार, हीग और अम्लवेतस की मात्रा को दुगुना करके (शेष चूर्ण को उसी परिमाण मे ) कफ-गुल्म मे प्रयोग करे । ग्रहणी राग मे जो क्षार कहे है, उनको कफ-गुल्म मे प्रयोग करे, ये क्षार निर्दोष ओर प्रशस्त है । जब किसी भी चिकित्सा से लाभ न हो तभी अन्त मे दाहकर्म करे ॥ १६१-१६३ ॥ प्रपुराणानि धान्यानि जाङ्गला मृगपक्षिणः ॥ १६४ ॥ कौलत्थो मुद्गयूपश्च पिप्पल्या नागरस्य च । शुष्कमूलकयूपश्च बिल्वस्य वरुणस्य च ॥ १६५ ॥ चिरबिल्वाङ्कुराणां च यवान्याश्चित्रकस्य च । बीजपूरकहिङ्ग्वम्लवेतसक्षारदाडिमैः ॥ १६६ ॥ तक्रेण तैलसर्पिर्भ्यां व्यञ्जनान्युपकल्पयेत् । पञ्चमूलीशृतं तोयं पुराणं वारुणीरसम् ॥ १६७ ॥ कफगुल्मी पिबेत्काले जीर्णं माध्वीकमेव वा । यवानीचूर्णितं तक्रं बिडेन लवणीकृतम् ॥ १६८ ॥ पिबेत्सद्दीपनं वातमूत्रवर्चोऽनुलोमनम् । आहार—तीन चार वर्ष पुराने धान्य, जागल पशु-पक्षिया का मास, कुलथी, मूग का यूप, पिप्पली का यूप, सोंठ का यूप, सूखी मूली का यूष, बेलगिरी, वरुण, करज के अकूर, अजवायन और चित्रक का यूष कफ-गुल्म मे उत्तम है। बिजौरा, हींग, अम्लवेतस, क्षार, अनारदाना, छाछ, तैल और घी इनके साथ व्यजन ( सूप शाक आदि ) बनावे । कफ-गुल्म रोगी को प्यास लगने पर स्वल्प पञ्चमूल से सिद्ध किया पानी या पुरातन वारुणी ( ताड़ वा खजूर का मद्य ) अथवा पुरातन माध्वीक ( मधु, महुवे, अगूर के रस से बना मद्य ) पीने के लिये दे । तक्र मे अजवायन का चूर्ण और बिड नमक मिलाकर पीवे । यह तक्र अग्निदीपक, वायु, मल, मूत्र का अनुलोमन करती है ॥ १६४-१६८ ॥ संचितः क्रमशो गुल्मो महावास्तुपरिग्रहः ॥ १६९ ॥ कृतमूलः सिरानद्धो यदा कूर्म इवोन्नतः । दौर्बल्यारुचिहृल्लासकासवम्यरतिज्वरैः ॥ १७० ॥ तृष्णातन्द्राप्रतिश्यायैर्यंयुज्यते न स सिध्यति । गृहीत्वा सज्वरश्वासं वम्यतीसारपीडितम् ॥ १७१ ॥ हृन्नाभिहस्तपादेषु शोफः कर्षति गुल्मिनम् ।
असाध्यता—जो गुल्म धीरे-धीरे बढ़ कर बड़े भारी स्थान को घेर
३७२ चरकसंहिता [ अ० ५ असाध्यता—जो गुल्म धीरे-धीरे बढ़ कर बड़े भारी स्थान को घेर लेता है, जिसने जड़ पकड़ ली हो, सिराओ से व्याप्त, कछुुए के समान ऊपर को उठा हुआ, दुर्बलता, अरुचि, जी मचलाना, कास, वमन, बेचैनी, ज्वर, प्यास, तन्द्रा, प्रतिश्याय से युक्त होता है, वह गुल्म असाध्य हे । ज्वर, श्वास, वमन और अतीसार से पीड़ित गुल्म रोगी के हृदय, नाभि ओर हाथ पाव मे शोथ हो जाय ता रोगी की मृत्यु हा जाती है। यह शोथ उसका पीडित करता है ॥ १६६-१७१ ॥ रोधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे ॥ १७२ ॥ स्निग्धस्विन्नशरीराय दद्यात्स्नेहविरेचनम् । रक्त-गुल्म की चिकित्सा—( १ ) गर्भकाल अथोत् दस मास व्यतीत हो जाने पर गर्भवती के शरीर का स्नेहन और स्वेदन करके [ घृत आदि को ] स्निग्ध विरेचन दे । जैसे—एरण्ड तैल ॥ १७२ ॥ पलाशक्षारपात्रे१ द्वे द्वे पात्रे तैलसर्पिषोः ॥ १७३ ॥ गुल्मशैथिल्यजननीं पक्त्वा मात्रां प्रयोजयेत् । ( २ ) पलाश-क्षार यमक—तिल तैल २ पात्र ( २ आढक ), घी २ पात्र, पलाश क्षारादक [ ढाक की भस्म को ६ गुने पानी मे २१ वार परिस्रुत करके तय्यार किया क्षारादक ] चार आढक लेकर स्नेह पाक करे । जब झाग उठ जाये और आकृति फटे दूध के समान हो जाये तब स्नेहपाक समझे । इस यमक की मात्रा रागिणी का पिलावे इससे गुल्म शिथिल हो जाता है । [ मात्रा ३ मासा ] ॥ १७३- ॥ प्रभिद्येत न यद्येवं दद्याद्योनिविशोधनम् ॥ १७४ ॥ क्षारेण युक्तं पललं सुधाक्षीरेण वा पुनः । आभ्यां वा भावितन्दद्याद्योनौ कटुकमत्स्यकान् ॥ १७५ ॥ वराहमत्स्यपित्ताभ्यां लक्तकान् वा सुभावितान् । अधोहरैश्चोर्ध्वहरैर्भावितान् वा समाक्षिकैः२ ॥ १७६ ॥ किण्वं वा सगुडक्षारं दद्याद्योनिविशोधनम् । रक्तपित्तहरं क्षारं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १७७ ॥ लशुनं मदिरा तीक्ष्णा मत्स्यांश्चास्यै प्रदापयेत् । बस्ति सक्षीरगोमूत्रं सक्षारं दाशमूलिकम् ॥ १७८ ॥ १ 'पादे' इति च पाठ. । २ 'समाक्षिकान्' इत च पाठ ॥
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७३ अदृश्यमाने रुधिरे दद्याद् गुल्मप्रभेदनम् । प्रवर्त्तमाने रुधिरे दद्यान्मांसरसौदनम् ॥ १७९ ॥ घृततैलेन चाभ्यङ्ग पानार्थं तरुणीं सुराम् । रुधिरेऽतिप्रवृत्ते तु रक्तपित्तहराः क्रियाः ॥ १८० ॥ कार्या वातरुगार्ता याः सर्वा वातहराः पुनः । घृततैलावसेकाश्च तित्तिरींश्चरणायुधान् ॥ १८१ ॥ सुरा समण्डा पूर्वा च पानमम्लस्य सर्पिषः ॥ १८२ ॥ प्रयोजयेदुत्तर वा जीवनीयेन सर्पिषा । अतिप्रवृत्ते रुधिरे सतिकेनानुवासनम् ॥ १८३ ॥ ( ३ ) यदि इस प्रकार से गुल्म का भेदन न हो तो योनि-शोधन करावे । इसके लिये ( १ ) क्षार से युक्त तिल-कल्क या सेहुण्ड के दूध से युक्त तिल- कल्क अथवा क्षार और सेहुण्ड के दूध से भावित कटु मछलियो ( शफरी मछली ) को योनि मे रखे । [ यहा पर तिल-कल्क न लेकर मास ( छुछुन्दरी या मूषक ) का प्रयोग करना अच्छा है । श्रीगगाधर की भी यही मान्यता है, क्षार मे पलाशक्षार या यवक्षार बरते । ] ( २ ) पिचुओ ( फाया ), को सूअर या मछली के पित्तो से अच्छी प्रकार भावना देकर अथवा मधु-युक्त विरेचन द्रव्यो या मधु-मिश्रित वमन-द्रव्या से पिचुओ को भावित करके योनि मे रखे । ( ३ ) योनि के शोधन के लिये किण्व ( सुरा-बीज ) को गुड और पलाश- क्षार मे मिला कर योनि मे रखे । रक्तपित्तनाशक क्षार ( नीलोत्पल क्षार ) मधु और घी के साथ चटावे । ( ४ ) अन्नपान मे—लहसुन, तीक्ष्ण मदिरा, मछलिया देवे । दूध, गोमूत्र और क्षार से युक्त दशमूल क्वाथ की उत्तर बस्ति देवे । ( ५ ) यदि योनि से रक्त स्रावित न हो तो गुल्म को फाडने की चिकित्सा करे । यदि रक्त योनि से बहता हो ता मास रस और चावल दे, घी और तैल की मालिश करे, पीने के लिये सुरा दे । रक्त के अधिक बहने पर रक्तपित्त नाशक क्रिया करे । वातव्याधि हा ता वातनाशक चिकित्सा करे । घी और तैल का परिषेक, तीतर, मुर्गे के मास-रस का भोजन, सुरा, मण्ड- युक्त सुरा, अम्ल रस द्रव्यो से युक्त घी का पान करावे । रक्त के अधिक बहने पर जीवनीय गण से साधित घृत की उत्तर बस्ति देवे । तिक्त घृत से
३७४ चरकसंहिता [ अ० ५ अनुवासन दे, अथवा तिक्त द्रव्यों से युक्त जीवनीय घृत से अनुवासन करावे ॥ १७४-१८३ ॥ तत्र श्लोकाः—स्नेहः स्वेदः सर्पिश्शूर्णानि बृंहणं गुडिकाः । वमनविरेकौ मोक्षः क्षतजस्य च वातगुल्मवताम् ॥ १८४ ॥ सर्पिः सतिक्तसिद्ध क्षीर प्रस्रंसनं निरूहाश्च । रक्तस्य चावसेचनमाश्वामनसमनयोगाः ॥ १८५ ॥ उपनाहनं सशस्त्र पक्वस्याभ्यन्तरप्रभिन्नस्य । संशोधनसंशमने पित्तप्रभवस्य गुल्मस्य ॥ १८३ ॥ स्नेहः स्वेदो भेदो लङ्घनमूल्लेखनं विरेकश्च । सर्पिर्बस्तिर्गुडिकाश्चूर्णमरिष्टाश्च सक्षाराः ॥ १८७ ॥ गुल्मस्यान्ते दाहः कफजस्याग्रेऽपनीतरक्तस्य । गुल्मस्य रौधिरस्य क्रियाक्रमः स्त्रीभवस्योक्तः ॥ १८८ ॥ पथ्यान्नपानसेवाहेतूनां वर्जनं यथास्वं च । नित्यं चाग्निसमाधिः स्निग्धस्य च सर्वकर्माणि ॥ १८९ ॥ हेतुर्लिङ्गं सिद्धिः क्रियाक्रमः साध्यतानुयोगाश्च । गुल्मचिकित्सितसंग्रह एतावानग्निवेशस्य ॥ १९० ॥ वात-गुल्म मे—स्नेह, स्वेद, घृत, चूर्ण, बृं हण गुटिकाये, वमन, विरेचन, रक्त-मोक्षण करे । पित्त गुल्म मे—तिक्त द्रव्यो से सिद्ध घृत, दूध, विरेचन, निरूह, रक्तमोक्षण, आश्वासन, सशमनीय योग, उपनाहन, पकने पर शस्त्र-क्रिया, अन्तः गुल्म के प्रभिन्न होने पर सशोवन और समशन चिकित्सा करे । कफ- गुल्म मे—स्नेहन, स्वेदन, भेदन, लघन, वमन, विरेचन, घृत, बस्तिया, गुटिका, चूर्ण, अरिष्ट-पान, क्षार-प्रयोग, रक्तभाक्षण और अन्त मे दाह करना यह चिकित्सा-क्रम है । स्त्रियो मे होने वाले रक्त-गुल्म का चिकित्सा-क्रम कह दिया है । पथ्यकारी खान-पान, रोग के अपने कारण का परित्याग, नित्य अग्नि की रक्षा, गुल्म-रागी को स्नेहन देकर पश्चात् सब कायो का करना, गुल्म का हेतु, लक्षण, चिकित्साविधि, साध्यासाध्यता और योग इतना गुल्म की चिकित्सा का सग्रह अग्निवेश ने बतलाया है ॥ १८४-१९० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने गुल्मचिकित्सित नाम पञ्चमोऽध्याय समाप्तः ॥ ५ ॥
अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७५ षष्ठोऽध्यायः अथातः प्रमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब प्रमेह की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥१-२॥ निर्मोहमानानुशयो निराशः पुनर्वसुर्ज्ञानतपोविशालः । कालेऽग्निवेशाय सहेतुलिङ्गानुवाच मेहान् शमनं च तेषाम् ॥ ३ ॥ आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि । नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ ४ ॥ निर्मोह, निरभिमानी, तृणारहित, आकाक्षारहित, महाज्ञानी, महातपस्वी पुनर्वसु ने उचित समय पर अग्निवेश का प्रमेह, उसके कारण, लक्षण और चिकित्सा का उपदेश दिया । कफ-प्रमेह का निदान—सुख का जीवन बिताना ( चलना फिरना नही ), आराम तलबी मे लेटे रहना, दही, ग्राम्य, औदक ( जलचर ) जन्तु और आनूप ( जल-प्रधान ) देश के पशु-पक्षिया का मास-रस, दूध, नूतन खान-पान ( नवीन अनाज ओर नूतन मद्य ), गुड से बने पदार्थों का अति सेवन तथा अन्य कफकारक पदार्थ कफ-प्रमेह को उत्पन्न करते है ॥३-४॥ मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतं प्रदूष्य । करोति मेहान्समुदीर्णमुष्णैस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ ५ ॥ क्षीणेपु दोषेष्ववकृष्य बस्तौ धातून्प्रमेहाननिलः करोति । दोषो हि बस्ति समुपत्य मूत्रं संदूष्य मेहाञ्जनयेद्यथास्वम् ॥ ६ ॥ सम्प्राप्ति—( १ ) दूषित कफ-मेद, मास और शारीरिक क्लेद को दूषित करके वस्ति मे पहुच कर प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( २ ) उष्ण द्रव्यों से प्रवृद्ध और कुपित पित्त मेद आदि को दूषित करके पैत्तिक प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( ३ ) कफ-पित्त दोषो के क्षीण होने पर वायु, मज्जा, वसा, ओज ओर लसीका को बस्ति मे लाकर प्रमेह को उत्पन्न करता है । ( ४ ) दूषित दाष बस्ति मे पहुच कर मूत्र को दूषित बनाकर अपने अपने लक्षणो वाले प्रमेहों को उत्पन्न करते है ॥ ५-६ ॥
३७६ चरकसंहिता [अ० ६
साध्याः कफोत्था दश, पित्तजाः षट् याप्या, न साध्याः पवनाच्चतुष्काः ।
समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ७ ॥
कफः सपित्तः पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः ।
मज्जारसौजः पिशितं च दूष्यं प्रमेहिणा विंशतिरेव मेहाः ॥ ८ ॥
(१) सम क्रिया होने से कफजन्य दस प्रमेह साध्य है, (२) विषम
क्रिया होने से पित्तजन्य छः प्रमेह याप्य है और (३) महात्यय अर्थात् बहुत
आपत्तिकारक होने से वातजन्य चार प्रमेह असाध्य है ।
(१) समक्रिय—जो ओषधिया दूष्य, मेद, मज्जा, लसीका आदि को शान्त
करते है, वे ही ओषधिया कफ को भी शान्त करती है, इसलिये इनकी क्रिया
समान है। (२) विषमक्रिय—जो ओषधिया कटु, तिक्त आदि मेद, मज्जा
को कम करती है, वे पित्त को बढाती है, और जो मधुर आदि रस पित्त को
शान्त करते है, वे इनको बढाते है, इसलिये विषम क्रिया है। (३)
महात्यय—मज्जा, ओज, लसीका आदि महान् धातुओ का इसमे क्षय होता है ।
स्निग्ध चिकित्सा जो वायु को शमन करती है, इनको बढाती है। रूक्ष चिकित्सा
वायु को बढाती है। इसलिये ये असाध्य है¹।
प्रमेह मे कफ, पित्त और वायु ये तीन दोष है, मेद, रक्त, शुक्र, आप्य
(जलीय भाग) वसा, लसीका, मज्जा, रस, ओज और मास ये दूष्य हे ।
प्रमेहियो के बीस प्रकार के ही प्रमेह होते है ॥ ७–८ ॥
जलोपमं चेक्षुरसोपमं वा घनं घनं चोपरि विप्रसन्नम् ।
शुक्लं सशुक्रं शिशिरं शनैर्वा लालेव वा बालुकया युतं वा ॥ ९ ॥
विद्यात्प्रमेहान्कफजान्दशैतान्
दस प्रकार के कफजन्य प्रमेह—(१) जिसमे मूत्र जल के समान हो
(उदक-मेह), २–गन्ने के रस के समान हो (इक्षुमेह), ३–मूत्र घना हो
(सान्द्रमेह), ४–जिसमे मूत्र नीचे घना और ऊपर स्वच्छ हो (सान्द्रप्रसाद
प्रमेह), ५–मूत्र श्वेत हो (शुक्लमेह), ६–शुक्रमिश्रित मूत्र हो (शुक्रमेह),
७–मूत्र शीतल हो (शीतमेह), ८–मूत्र का वेग धीमा हो (शनैर्मेह), ९–मूत्र
लार के समान हो (लालामेह), १०–मूत्र बालुका के कणों से युक्त हो
(सिकतामेह), इन दस प्रमेहो को कफ से उत्पन्न हुआ जाने ॥ ६-॥
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१ प्रमेह मे दोष ओर दूष्य की समानता का होना ही सुखसाध्यता का
लक्षण है। ज्वर मे ऋतु और दोष की समानता, प्रमेह मे दोष और दूष्य की
समता तथा रक्तगुल्म मे पुरातनता ये सुखसाध्यता के चिह्न कहे जाते है ।
अ० ६ ] \hspace{150pt} चिकित्सितस्थानम् \hspace{150pt} ३७७
अ० ६ ] \hspace{150pt} चिकित्सितस्थानम् \hspace{150pt} ३७७ \hspace{100pt} क्षारोपमं कालमथापि नीलम् । हारिद्रमाञ्जिष्ठमथापि रक्तमेतान्प्रमेहान्षडुशन्ति पैत्तान् ॥ १० ॥ \hspace{20pt} पित्तजन्य छ प्रमेह—( १ ) क्षार के समान 'क्षारमेह', ( २ ) काले वर्ण का मूत्र 'कालमेह', ( ३ ) नीलेवर्ण का मूत्र 'नीलमेह', ( ४ ) हल्दी के समान वर्ण का मूत्र 'हारिद्रमेह', ( ५ ) मजीठ के वर्ण का 'माञ्जिष्ठमेह', ( ६ ) लालवर्ण का 'रक्तमेह', ये छ. पित्तजन्य प्रमेह है ॥ १० ॥ मज्जौजसा वा वसयाऽन्वित वा लसीकया वा सतन विबद्धम् । चतुर्विधं मूत्रयतीह वाताच्छ्लेषेषु धातुष्वपकर्षितेषु ॥ ११ ॥ वर्णं रस स्पर्शमथापि गन्ध यथास्वदोष भजते प्रमेहः । श्यावारुणो वातकृतः सशूलो मज्जादिसाद्गुण्यमुपैत्यसाध्यः ॥ १२ ॥ \hspace{20pt} चार प्रकार के वातिक प्रमेह—( १ ) मजामेह, ( २ ) ओजामेह, ( ३ ) वसामेह ओर ( ४ ) लसीकामेह ( जिसमे लसीका की तारे निकलती है ) ये चार प्रमेह आरम्भक धातुओ ( मज्जा, ओज आदि ) के क्षीण होने पर होते है । अथवा पित्त और कफ की अपेक्षाकृत न्यूनता होने से प्रमेह होते है । \hspace{20pt} प्रमेह मे अपने वात आदि दोषो के अनुसार वर्ण, रस, स्पर्श अथवा गन्ध होता है । असाध्य वातजन्य प्रमेह मे श्याव, अरुण, शूलयुक्त तथा मज्जा, वसा, लसीका या ओज के समान गुण होता है ॥११-१२॥ स्वेदोऽङ्गगन्धः शिथिलाङ्गता तु शय्यासनस्वप्नसुख रतिश्च । हृन्नेत्रजिह्वाश्रवणोपदेहा घनाङ्गता केशनखातिवृद्धिः ॥ १३ ॥ शीतप्रियत्व गलतालुशोषो माधुर्यमास्ये करपाददाहः । भविष्यतो मेहगदस्य रूपं मूत्रेऽभिधावन्ति पिपीलिकाश्च ॥ १४ ॥ \hspace{20pt} पूर्वरूप—पसीना, शरीर से गन्ध का आना, अगा मे शिथिलता, लेटने, बैठने और सोने मे प्रीति, हृदय, नेत्र, जीभ और कान मे मैल का आना, शरीर मे मोटापा, केश, नखो का अधिक बढना, शीत की चाह, गला और तालु का शुष्क होना, मुख मे मधुरता, हाथ और पाव के तलुवे मे जलन, मूत्र पर ( मधुरता से ) चिउटियो का आना, ये प्रमेह के पूर्वरूप है ॥ १३-१४ ॥ स्थूलः प्रमेही बलवानिहैंकः कृशस्तथैकः परिदुर्बलश्च । संबृंहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषबलाधिकस्य ॥ १५ ॥ \hspace{20pt} प्रमेह रोगी दो प्रकार के हैं। जैसे एक स्थूल और बलवान्, दूसरा कृश तथा दुर्बल शरीर का। इनमे से कृश व्यक्ति का बृं हण करना चाहिये और प्रबल दोष ओर अधिक बलवान् पुरुष मे सशोधन करना चाहिये । चिकित्सा
३७८ चरकसंहिता [ अ० ६ दो प्रकार की है, सशोधन और सशमनी। इनमे जिन पुरुषो की माता-पिता के द्वारा जन्म से प्रमेह होता है वे कृश होते है और जिन को अधिक खाने से वा स्निग्ध भोजन से होता है, वे बलवान् होते है। [ दो प्रकार के प्रमेह होते है (१) सहज, और (२) अपथ्य से उत्पन्न। माता-पिता के बीजदोष से उत्पन्न 'सहज' है, प्रतिकूल आहार से उत्पन्न 'अपथ्यज' होता है। प्रथम प्रकार का प्रमेही कृश, अल्पभोजी और प्यास बहुत अनुभव करता है। दूसरे प्रकार का प्रमेही स्थूल, बहुत खानेवाला, सेज पर पडे रहने वाला, आलसी होता है। [ सुश्रुत।]॥ १५॥ स्निग्धस्य योगा विविधाः प्रयोज्याः कल्पोपदिष्टा मलशोधनाय। ऊर्ध्वं तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ॥ १६॥ उपचार—(१) स्निग्ध रोगी के मल के सशावन के लिये कल्पस्थान ने वर्णित नाना प्रकार के यागा का प्रयाग करे। इसके लिये वमन और विरेचन का प्रयाग करे। वमन और विरेचन द्वारा मल निकल जाने पर प्रमेह मे सन्तर्पण ही कर। स्नेहन के लिये सरसा, अलसी, इगुदी आदि के तैल हो या प्रियग्वादि गण से सिद्ध घृत आदि से स्नेहन कर ॥ १६ ॥ गुल्मः क्षयो मेहनबस्तिशूलं मूत्रग्रहश्चाप्यपतर्पणेन । प्रमेहिणः स्युः परिबृंहणानि १ कार्याणि तस्य प्रसमीक्ष्य वह्निम् ॥१७॥ संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया सशमनी प्रयोज्या । मन्थाः कषाया यवचूर्णलेहाः प्रमेहशान्त्यै लघवश्च भक्ष्याः ॥ १८ ॥ ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषा रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः । यवौदनं रूक्षमथापि वाट्यं मद्यात्ससक्तूनपि चायपूपान् ॥ १६ ॥ मुद्गादियूषैरथ तिक्तशाकैः पुराणशाल्योदनमाददीत । दन्तीङ्गुदीतैलयुत प्रमेही तथाऽतसीसर्षपतैलयुक्तम् ॥ २० ॥ सषष्टिकं स्यात्तृणधान्यमन्न यवप्रधानस्तु भवेत्प्रमेही । यवस्य भक्ष्यान्विविधास्तथाऽद्यात्कफप्रमेही मधुसप्रयुक्तान् ॥२१॥ निशिस्थिताना त्रिफलाकषायैः स्युस्तर्पणाः क्षौद्रयुता यवानाम् । तान्सीधुयुक्तान्पिबेत्प्रमेही प्रायोगिकान्मेहवधार्थमेव ॥ २२॥ (२) प्रमेह-रोगी को अपतर्पण कराने से गुल्म, क्षय, मूत्रेन्द्रिय वा बस्ति मे शूल, मूत्रग्रह (मूत्र का कम आना) हो जाता है। इसके लिये रोगी की अग्नि देखकर बृंहण चिकित्सा करे। १ 'परितर्पणानि' इति च पाठ ।
अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७६
अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७६ ( ३ ) जो प्रमेह रोगी सशोधन के योग्य न हो उसके लिये सशमनी चिकित्सा करे । उसको प्रमेह की शान्ति के लिये—मन्थ, कषाय, जौ, चूर्ण, अवलेह और लघु भक्ष्य पदार्थों का सेवन करावे । ( ४ ) विष्किर, प्रतुद पक्षियो का तथा जागल पशु-पक्षियों के मन-मोहक सुस्वादु मास-रसो के साथ, रूक्ष यवान्न, वाट्य ( जौ का मण्ड ), पुराना मद्य, सत्तू, अपूप ( वडे ) मूग आदि का यूष, तिक्त शाक, पुराने शालियो का भात, दन्ती तैल, इङ्गुदी ( हिंगोट ) का तैल, अलसी तथा सरसो के तैल के साथ साठी आदि तृणधान्यो को दे । प्रमेह रोगी का खास कर जौ का भोजन करावे । कफ-प्रमेही को मधु के साथ जौ के नाना प्रकार के पदार्थ खाने क लिये दे । ( ५ ) प्रमेह का रोगी त्रिफला के काथ म जौ का डालकर रात भर रख दे । पीछे स इनको सत्तू बनाकर जल मे आलोड़ित करके मधु मिला कर तर्पण बनावे । इन तर्पणो का सीधु के साथ मिलाकर प्रति दिन पान करे ॥१७–२२॥ ये श्लेष्ममेहे विहिताः कषायास्तैर्भाविताना च पृथग्यवानाम् । सक्तूनपूपान्सगुडान्सधानान्भक्ष्यांस्तथाऽन्यान्यविधान्श्चखादेत् २३ खराश्वगोहस्रपृषदूभृताना' तथा यवाना विविधाश्चभक्ष्याः । देयास्तथा वेणुयवा यवाना कल्पेन गोधूममयाश्च भक्ष्याः ॥२४॥ सशोधनोल्लेखनलंधनानि काले प्रयुक्तानि कफप्रमेहान् । जयन्ति पित्तप्रभवान्विरेकाः संतर्पणः सशमनो विधिश्च॥ २५॥ दार्वा सुराह्वां त्रिफला समुस्ता कषायमुत्क्वाथ्य पिबेत्प्रमेही । क्षौद्रेण युक्तामथवा हरिद्रा पिबेद्रसेनामलकीफलानाम् ॥ २६ ॥ ( ६ ) कफप्रमेह मे जो कषाय कहे है, उन कषायो से पृथग् २ रूप मे जौ को भावित करके सत्तू, अपूप, धाना ( भुने जौ ) और अन्य भक्ष्य पदार्थों का बनाकर गुड के साथ खावे । ( ७ ) गदहा, घोडा, गाय, हस, पृषत् ( हरिण ) इनके द्वारा खाये हुए जौ जो उनके मल मे बाहर आवे उनसे नाना प्रकार के भक्ष्य बना कर देवे । इसी प्रकार वेणुयव ( बास के जो, वशफल ) और गेहूँ के बने भक्ष्य पदार्थ सेवन करने के लिये देवे । ( ८ ) उचित समय मे दिये गये सशोधन, उल्लेखन (वमन), लघन कफप्रमेह को नष्ट करते है, सतर्पण, सशमन और विरेचन पित्तजन्य प्रमेहो को जीतते है । १ 'खराश्वगोधेणुकसभृताना' इति च पाठः ।
३८० चरकसंहिता [ अ० ६ (६) दारु हरिद्रा, हरड, बहेडा, आवला और मोथा इनके क्वाथ पीवे, अथवा हल्दी के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर आवले के रस के साथ पीवे ॥२३-२६॥ हरीतकीकट्फलमुस्तलोध्र पाठाविडङ्गाजु॑नधन्वनाश्च । उभे हरिद्रे तगर विडङ्ग कदम्बशालार्जुनदीप्यकाश्च ॥ २७ ॥ दार्वी विडङ्ग खदिरो धवश्च सुराह्वकुष्ठागुरुचन्दनानि । दार्व्यग्निमन्थौ त्रिफला सपाठा पाठा च मूर्वा च तथा श्वदंष्ट्रा ॥२८॥ यवान्युशीरान्यभया गुडूची चव्याभयाचित्रकसप्तपर्णाः । पादैः कषायाः कफमेहिना ते दशोपदिष्टा मधुसंप्रयुक्ताः ॥ २६ ॥ कफप्रमेह के दस योग—(१) हरड, कायफल, मोथा और लोध, (२) पाठा, वायविडंग, अर्जुन, धन्वन (धावन की छाल), (३) हल्दी, दारुहल्दी, तगर, वायविडग, (४) कदम्ब, शाल, अर्जुन, अजवायन, (५) दारुहल्दी, वायविडंग खैर और धव की छाल, (६) देवदारु, कूठ, अगरु और लालचन्दन, (७) दारुहल्दी, अग्निमन्थ, त्रिफला और पाठा, (८) पाठा, मूवा और गाखरू, (६) अजवायन, खस और हरड़ तथा गिलोय, (१०) चविका, हरड, चीतामूल, सतवन की छाल, ये दस कषाय श्लोका के चतुर्थ भागो मे कहे गये है । इनका मधु के साथ मिलाकर कफ-प्रमेह मे बरते ॥ २७-२६ ॥ उशीरलोध्राञ्जनचन्दनानामुशीरमुस्तामलकाभयानाम् । पटोलनिम्बामलकामृताना मुस्ताभयापद्मकवृक्षकाणाम् ॥ ३० ॥ लोध्राम्बुकालीय कधातकीना निम्बार्जुनाम्रातनिशोत्पलानाम् । शिरीषसर्जार्जुनकेशराणि प्रियङ्गुपद्मोत्पर्लाकशुकानाम् ॥ ३१ ॥ अश्वत्थपाठासनवेतसाना कटङ्कटेड्युत्पलमुस्तकानाम् । पैत्तेषु मेहेषु दशैव दृष्टाः पादैः कषायाः मधुसंप्रयुक्ताः ॥ ३२ ॥ पैत्तिक प्रमेह मे दस प्रयोग—(१) खस, लाध, अंजन (रसांजन) लाल चन्दन, (२) खस, मोथा, आवला ओर हरड, (३) परवल, नीम की छाल, आवला, गिलाय, (४) मोथा, हरड, पद्माख और इन्द्रजो (कूडे की छाल), (५) लोध, गन्धबाला, कालीयक (पीतकाष्ठ चन्दन) धान के फूल, (६) नीम की छाल, अर्जुन की छाल, अम्बाडा, हल्दी, नीला कमल, (७) सिरस की छाल, सर्जत्वक्, अर्जुन की छाल, नाग केसर, (८) फूलप्रियगु, श्वेतकमल, नीलोत्पल, ढाक के फूल, (६) अश्वत्थ, पाठा, असन (पीतशाल) की छाल, वेतस की छाल, (१०) कटकटेरी, (दारुहल्दी), नीलोत्पल, मोथा, ये दस
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८१
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८१ क्वाथ-योग श्लोक के चतुर्थांशो में कहे गये है । इनको शहद के साथ मिलाकर प्रयोग करे । ये पित्तनाशक है ॥ ३०-३२ ॥ सर्वेषु मेहेषु मतौ तु पूर्वौ कषाययोगौ विहितास्तु सर्वे । मन्थस्य पाने यवभावनाया स्युर्भोजने पानविधौ पृथक्च ॥ ३३ ॥ सिद्धानि तैलानि घृतानि चैव देयानि मेहेष्वनिलात्मकेषु । मेदः कफश्चैव कषाययोगैः स्नेहेश्च वायुः शममेति तेषाम् ॥ ३४ ॥ ( १) सब से पूर्व (दार्बी और सुराह्वा) कहे दो योगो को सब प्रकार के प्रमेहो मे देवे । इन बाईस प्रयोगो को मन्थ के पान मे, जौ की भावना देने मे, भक्ष्य और पेय पदार्थों के सस्कार मे विवेचनापूर्वक देवे । ( २ ) वात प्रमेह में इन्हीं कषायो से सिद्ध घी और तैल का प्रयोग करे । इन कषाया से मेद और कफ शान्त होते हे और स्नेहन से वायु शान्त होता है ॥ ३३-३४ ॥ [ वातज और कफपित्तज मे यापन के लिये कषाय पीये वसामेह में अग्निमन्थ का, मज्जामेह मे गिलोय और चीते का, उसमे कूठ, कुड़ा, पाठा और कटुरोहिणी मिला ले । हस्तिमेह मे हाथी, शूकर, गधा, ऊट इनकी अस्थि के सार का उपयोग करे । मधुमेह मे कदर और खदिर का, कफानुगतादि मेहो मे तदनुसार उपदेश किये कषायो से साधित तैलो का उपयोग करे ओर पित्तानु- गत म घृत और यमको का प्रयोग करे—अष्टाग-स० ] । कम्पिल्लसप्तच्छदशालजानि बैभीतरौहीतककौटजानि । कपित्थपुष्पाणि च चूर्णितानि क्षौद्रेण लिह्यात्कफपित्तमेही ॥ ३५ ॥ पिबेद्रसेनामलकस्य वापि कल्कीकृतान्यक्षसमानि काले । जीर्णे च भुञ्जीत पुराणमन्नं मेही रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ॥ ३६ ॥ ( ३ ) कफ प्रमेह और पित्त-प्रमेह मे—कमीला, सतवन की छाल, शाल की लकडी इनका चूर्ण या बहेडा, रोहेडा की छाल, कुटज की छाल इनका चूर्ण अथवा कैथ के फूलो के चूर्ण को मधु के साथ चाटे । अथवा इन्ही तीनो योगो मे से एक का चूर्ण ( एक कर्ष ) करके आवले के रस के साथ पीवे । औषध के जीर्ण होने पर पुराने शालि आदि के भात को जगल पशु-पक्षियो के स्वादु मास-रसो के साथ खावे ॥ ३५-३६ ॥ दृष्ट्वाऽनुबन्धं पवनात्मकस्य पित्तस्य वा स्नेहविधिर्विकल्प्यः । तैलं कफे स्यात्त्वकषायसिद्धं पित्ते घृतं पित्तहरैः कषायैः ॥ ३७ ॥ वायु के साथ पित्त या कफ का अनुबन्ध देखकर स्नेह विधि मे भेद करना चाहिये । अर्थात् कफ मे कफघ्न औषधियो के कषाय मे सिद्ध तैल बरते । पित्त का अनुबन्ध होने पर पित्तघ्न ओषधियो के कषाय मे सिद्ध घृत बरते ॥३७॥
३८२ चरकसंहिता [ अ० ६ त्रिकण्टकाश्मन्तकसोमवल्कैर्भल्लातकैः सातिविषैः सलोध्रैः । वचापटोलार्जुननिम्बमुस्तैर्हरिद्रया पद्मकदीप्यकैश्च ॥ ३८ ॥ मञ्जिष्ठया वाऽगुरुचन्दनैश्च सर्वैः समुस्तैः कफवातजेषु । मेहेषु तैलं, विपचेद् घृतं तु पैत्तेषु, मिश्रं त्रिषु लक्षणेषु ॥ ३६ ॥ ( ५ ) त्रिकण्टकाद्य तैल, घृत और यमक—( १ ) गोखरू, अश्मन्तक, सोमवल्क ( श्वेत खदिर ) । ( २ ) भिलावा अतीस, लोध । ( ३ ) वच, पर- वल, अर्जुन, नीम की छाल, नागरमोथा । ( ४ ) हल्दी, पद्माख, अजवायन । ( ५ ) मजीठ, अगर और लाल चन्दन इन पाच योगो को मोथे के साथ मिला कर कफ-वातजन्य प्रमेहो ( कफमेह मे वायु का योग हो ) मे, तैल का पाक करे । तैल से चतुर्थाश कल्क और चौगुने जल मे धीरे २ तैल पकावे । पित्त- जन्य प्रमेह मे वायु का अनुबन्ध हा तो इनके कल्क से घृत पाक करे । तीनो दोषो के लक्षण हो तो इन्ही द्रव्यो के कल्क से घी और तैल के यमक को यथा- विधि सिद्ध करके प्रयोग करे१ । ॥३८-३६॥ फलत्रिकं दारुनिशा विशालां मुस्ता च निःक्वाथ्य निशा सकल्काः । पिवेत्कषाय मधुसंप्रयुक्तं सर्वप्रमेहेषु समुद्धृतेषु ॥ ४० ॥ ( ६ ) फल त्रिकादि क्वाथ—त्रिफला, दारुहल्दी, विशाला ( इन्द्रायण ), मोथा इनका क्वाथ करके हल्दी के कल्क का प्रक्षेप मिला कर मधु के साथ प्रवृद्ध प्रमेहो मे पीवे ॥४०॥ लोध्रं शटी पुष्करमूलमेलां मूर्वा विडङ्गं त्रिफलां यवानीम् । चव्यं प्रियंगुं क्रमुक विशाला किराततिक्तं कटुरोहिणीं च ॥ ४१ ॥ भाङ्गीनतं चित्रकपिप्पलीना मूलं सकुष्ठातिविष सपाठम् । कलिङ्गकान्केशरमिन्द्रसाह्वा नख सपत्रं मरिचं सर्वं च ॥ ४२ ॥ द्रोणेऽम्भसः कर्षसमानि पक्त्वा पूते चतुर्थागजलावशेषे । रसेऽर्धभागं मधुनः प्रदाय पक्षं निधेयो घृतभाजनस्थः ॥ ४३ ॥ लोध्रासवोऽय कफपित्तमेहान् क्षिप्रं निहन्याद् द्विपलप्रयोगात् । पाण्ड्वामयार्शांस्यरुचि ग्रहण्या दोष किलासं विविधं च कुष्ठम् ॥४४॥ इति लोध्रासवः२ । १ यहा पर पाच योग है । सब के साथ मोथा मिलाना चाहिये । कई आचार्य ‘समुस्तैः’ के स्थान पर ‘समस्तै ’ पढते है । उनके लिये एक ही योग है । अष्टाग-सग्रह मे इसको एक ही योग पढा है । वहा पर चतुर्जातक का प्रयोग करने के लिये लिखा है । २ ‘मध्वासव’ इति च पाठः ।
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८३
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८३ ( ७ ) लोध्रासव—लोध्र, कचूर, पोहकरमूल, छोटी इलायची, मूर्वा मूल, बायविडंग, त्रिफला, अजवायन, चविका, फल प्रियंगु, क्रमुक (सुपारी या पट्टिका लोध्र), इन्द्रायण, चिरायता, कुटकी, भार्गी, तगर, चीतामूल, पिप्पलीमूल, कूठ, अतीस, पाठा, इन्द्रजा, नागकेसर, इन्द्रसाह्वा ( छोटी इन्द्रायण ), नखी, तेज- पत्र, कालीमिर्च, प्लव ( केवटी मोथा ) प्रत्येक वस्तु १ कर्ष लेकर दो द्रोण पानी में क्वाथ करे। चतुर्थांश ( ( २ आढक ) रहने पर छान ले। इसमें एक आढक मधु मिला कर घी से भावित पात्र में डाल कर पन्द्रह दिना तक सन्धान करके रख दे। मात्रा—दो पल है, यह लोध्रासव कफजन्य, पित्तजन्य प्रमेहो का, पाण्डुरोग, अर्श अरुचि, ग्रहणीरोग, किलास और नाना प्रकार के कुष्ठ का नष्ट करता हे ॥४१-४४॥ क्वाथः स एवाष्टपले च दन्त्या भल्लातकानां च चतुष्पलं स्यात् । सितोपला त्वष्टपला विशेषः क्षौद्रं च तावत्पृथगासवौ तौ ॥ ४५ ॥ ( ८) दन्त्यासव—पूर्वोक्त लोध्रासव के क्वाथ में दन्तीमूल के आठ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा ( १ आढक ) मिला कर रखे। यह दन्त्यासव है। ( ६ ) भल्लातकासव—लोध्रासवोक्त क्वाथ आधा द्रोण, विशुद्ध भिलावा का चूर्ण ४ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा डाल कर सन्धान करे। ये दोनो आसव कफजन्य और पित्तजन्य प्रमेहा को नष्ट करते है ॥ ४५ ॥ सारोदकं वाथ कुशोदकं वा मधूदकं वा त्रिफलारस वा। शीधु पिबेद्वा निगदं प्रमेही माध्वीकमग्र्यं चिरसंस्थितं वा ॥४६॥ ( १० ) षडगपानीय विधि से खैर की लकडी का सावित जल, कुशा मूल का जल ( क्वाथ ), शहद का शरबत, त्रिफला का क्वाथ या रस, दोष रहित शीधु ( जौ का मद्य ), या पुरातन श्रेष्ठ माध्वोक ( मधु या द्राक्षा आदि से बना मद्य ) पीवे ॥ ४६ ॥ मांसानि शूल्यानि मृगद्विजानां खादेद्यवानां विविधांश्च भक्ष्यान् । संशोधनाविष्टकषायलेहैः सन्तर्पणोत्थान् १ शमयेत्प्रमेहान् ॥४७॥ भृष्टान् यवान् भक्षयतः प्रयोगाच्छुष्कांश्च सक्तून्न भवन्ति मेहाः । श्वित्रं च कुष्ठं च कफ च कृच्छ्रं तथैव मुद्गामलकप्रयोगात् ॥४८॥ सन्तर्पणोत्थेषु गदेषु योगा मेदस्विना ये च मयोपदिष्टाः । विरूक्षणार्थं कफपित्तजेषु सिद्धाः प्रमेहेष्वपि ते प्रयोज्याः ॥४९॥ १ सतर्पणज्ञ इति च पाठः ।
३८४ चरकसंहिता [अ० ६ व्यायामयोगैर्विविधैः प्रगाढैरुद्वर्तनैः स्नानजलावसेकैः। सेव्यत्वगेलागुरुचन्दनाद्यैर्विलेपनैश्चाशु न सन्ति मेहाः ॥५०॥ क्लेदश्च मेदश्च कफश्च वृद्धः प्रमेहहेतुः१ प्रसमीक्ष्य तस्मात् । वैद्येन पूर्वं कफपित्तजेषु मेहेषु कार्याण्यपतर्पणानि ॥ ५१ ॥ या वातमेहान्प्रति पूर्वमुक्ता वातोल्बणाना विहिता क्रिया सा । वायुर्हि मेहेष्वतिकर्पिताना कुर्यात्यसाध्यान् प्रति नास्ति चिन्ता॥५२॥ येर्हेतुभिर्ये प्रभवन्ति मेहास्तेषु प्रमेहेषु न ते निषेव्याः । हेतोरसेवा विहिता यथैव जातस्य रोगस्य भवेच्चिकित्सा ॥ ५३ ॥ (१०) पशु-पक्षियो के शलाका पर भुने मास, जो से बने नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थ खावे । रुतर्पण से उत्पन्न प्रमेहो का सशोधन, अरिष्ट, कषाय, अवलेहो द्वारा शान्त करे । (११) भुने हुए जौ को, सूखे सत्तूओ का, मूग ओर आवलो के आहार को नित्य खाने से प्रमेह, श्वित्र, कुष्ठ, कफ रोग ओर मूत्रकृच्छू नही होते । (१२) सन्तर्पण से उत्पन्न रोगो मे तथा मेदस्वी पुरुषो के लिये विरूक्षण योग जो पहिले सन्तर्पणीय अध्याय मे तथा 'अष्टौ-निन्दिताय' अध्याय मे कहे है, उनका कफज ओर पित्तज प्रमेहो मे प्रयोग करे । (१३) नाना प्रकार की व्यायामों से, बलपूर्वक मर्दन से, स्नानजल के परिषेक से, खस, दालचीनी, इलायची, अगरु, चन्दन आदि के लेपन से प्रमेह नष्ट होते है। (१४) प्रवृद्ध क्लेद, मेद और कफ प्रमेह के कारण है, इसलिये वैद्य को चाहिये कि कफ-पि- त्तज प्रमेहो मे अपतर्पण करे । (१५) वात-प्रमेहो की जो चिकित्सा प्रथम कही है, वही चिकित्सा वाताल्बण प्रमेही की होनी चाहिये । क्योकि प्रमेहो मे अत्य- धिक कर्षण होने से वायु प्रकुपित हो जाती है, इसलिये ये वाताल्बण है। असाध्य वातजन्य प्रमेहो का चिकित्साविधि मे विचार करना व्यर्थ है । (१६) जिन जिन कारणों से प्रमेह उत्पन्न होता है, प्रमेही को चाहिये कि उनका सेवन न करे । जैसे—स्वस्थ पुरुषो मे रोगोत्पत्ति के कारणों को सेवन न करने का विधान है उसी प्रकार यहा भी कारणों को सेवन न करना ही चिकित्सा है ॥ ४७-५३ ॥ हारिद्रवर्णं रुधिरं च मूत्रं विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूपैः । यो मूत्रयेत्तं न वदेत्प्रमेहं रक्तस्य पित्तस्य हि स प्रकोपः ॥५४॥ १ 'नाशं प्रयाति' इति च पाठ ।
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४१५
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४१५ की स्मृति और बुद्धि को बढाने के लिये कुष्ठ-नाशन अध्याय मे संग्रह किया है ॥ १७७-१७६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने कुष्ठचिकित्सितं नाम सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः अथातो राजयक्ष्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'राजयक्ष्मा की चिकित्सा' का वर्णन करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ दिवौकसां कथयतामृषिभिर्वै श्रुता कथा । कामव्यसनसंयुक्ता पौराणी शशिनं प्रति ॥ ३ ॥ रोहिण्यामतिसक्तस्य शरीरं नानुरक्षतः । आजगामाल्पतामिन्दोर्देहः स्नेहपरिक्षयात् ॥ ४ ॥ दुहितॄणामसंभोगाच्छ्लेष्मांशं च प्रजापतेः । क्रोधो निःश्वासरूपेण मूर्तिमान् निःसृतो मुखात् ॥ ५ ॥ पजापतेर्हि दुहितॄरष्टाविंशतिमंशुमान् । भार्यार्थं प्रतिजग्राह न च सर्वास्र्ववर्तत ॥ ६ ॥ गुरुणा तमवध्यातं भार्यास्वसमवर्तिनम् । रजःपरीतसबलं¹ यक्ष्मा शशिनमाविशत् ॥ ७ ॥ सोऽभिभूतोऽतिबलिना² गुरुक्रोधेन निष्प्रभः । देवदेवर्षिसहितो जगाम शरणं गुरुम् ॥ ८ ॥ अथ चन्द्रमसः शुद्धां मतिं बुद्ध्वा प्रजापतिः । प्रसादं कृतवान्सोमस्ततोऽश्विभ्यां चिकित्सितः ॥ ६ ॥ स विमुक्तो ग्रहश्चन्द्रो विरराज विशेषतः । ओजसा वर्धितोऽश्विभ्यां शुद्धं सत्त्वमवाप च ॥ १० ॥ क्रोधो यक्ष्मा ज्वरो रोग एकोऽर्थो दुःखसंज्ञितः । यस्मात्स राज्ञः प्रागासीद्राजयक्ष्मा ततो मतः ॥ ११ ॥ १ 'रजोऽन्धमबल दोन' इति च । २ 'गुरुणा' इति च
४१६ चरकसंहिता [ अ० ८ स यक्ष्मा हुङ्कृतोऽश्विभ्यां मानुषं लोकमागतः । लब्ध्वा चतुर्विधं हेतुं समाविशति मानवान् ॥ १२ ॥ यक्ष्मा की उत्पत्ति का उपाख्यान—देवताओं के कहते हुए ऋषियो ने चन्द्रमा के काम व्यसन से सम्बन्धित पुराण मे वर्णित कथा को इस प्रकार सुना है— भगवान् प्रजापति की अट्ठाईस कन्याओ का विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ था । इन कन्याओ को भार्या रूप मे लेकर चन्द्रमा ने सबके साथ समानता का व्यवहार नही किया । शरीर पर ध्यान न रखते हुए उसने रोहिणी के साथ अति-आसक्ति का व्यवहार किया । इस आसक्ति से शरीर का स्नेह क्षीण होने के कारण चन्द्रमा का शरीर कृश हो गया । शेष स्त्रियो ने चन्द्रमा के इस अस- मान व्यवहार की बात दक्ष प्रजापति से कही । तब दक्ष प्रजापति के मुख से निःश्वास रूप मे मूर्त्तिमान् क्रोध उत्पन्न हुआ । भार्या रूप मे सबका ग्रहण करने पर समान व्यवहार न होने पर असमान व्यवहार करने वाला चन्द्रमा को गुरु ( प्रजापति ) ने शाप दिया । इसमे रजोगुण से युक्त निर्बल चन्द्रमा मे यक्ष्मा ने प्रवेश किया उसको यक्ष्मा हो गया१ । वह चन्द्रमा गुरु ( श्वशुर ) के अत्यन्त बलवान् क्रोध से तिरस्कृत होकर कान्तिरहित हो गया । तब देवा और देवर्षियो को साथ मे लेकर चन्द्रमा गुरु ( प्रजापति ) की शरण मे गया । इसके पश्चात् चन्द्रमा की बुद्धि शुद्ध हो गई जान कर गुरु प्रसन्न हो गये । इसके पीछे अश्विनी- १ (१) प्रजापति की अट्ठाईस कन्याये अट्ठाईस नक्षत्र ये है । (१) अश्विनी, (२) भरणी, (३) कृत्तिका, (४) रोहिणी, (५) मृगशिरा, (६) आर्द्रा, (७) पुनर्वसु, (८) पुष्या, (६) आश्लेषा, (१०) मघा, (११) पूर्वा फाल्गुनी, (१२) उत्तरा फाल्गुनी, (१३) हस्ता, (१४) चित्रा, (१५) स्वाति, (१६) विशाखा, (१७) अनुराधा, (१८) ज्येष्ठा, (१६) मूला, (२०) पूर्वाषाढा, (२१) उत्तराषाढ़ा, (२२) श्रवणा, (२३) धनिष्ठा, (२४) शतभिषा, (२५) पूर्वा भाद्रपदा, (२६) उत्तरा भाद्रपदा, (२७) रेवती और (२८) अभिजित् । (२) राजयक्ष्मा के लक्षण—स्नेह का परिक्षय, शरीर का कृश और निष्प्रभ (आज का ह्रास) होना, ये तीन लक्षण है जो कि सबसे प्रथम शरीर पर दिखाई देते है । क्षीण होते हुए चन्द्र मे ये तीनो लक्षण स्पष्ट होने से चन्द्र की कथा से ही राजयक्ष्मा को जोड दिया है । दिन रात्रि ये दो अश्वी है । वे ही क्षीण होते हुए चन्द्र के क्षय को दूर करके पुनः पुनः पूर्ण कर देते हैं । इस प्रकार यह अलकार से कथन है ।
अ० ८ ] २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७
अ० ८ ] २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७ कुमारो ने उसकी चिकित्सा की । इस प्रकार रोग से मुक्त चन्द्रमा विशेष रूप से शोभित होने लगा, उसका ओज बढने लगा और शुद्ध सत्त्व ( मन ) को प्राप्त हुआ । क्रोध, यक्ष्मा, ज्वर, रोग ये सब एक ही अर्थ को बतलाते है । यह रोग सबसे प्रथम नक्षत्रराज चन्द्रमा को हुआ, अतएव राजयक्ष्मा नाम से कहा जाता है। यह यक्ष्मा रोग अश्विनीकुमारो के हुकार से भयभीत होकर मनुष्य- लोक मे आगया । यह चार प्रकार के कारणो का प्राप्त करके मनुष्यो मे प्रवेश कर जाता है ॥ ८-१२ ॥ अयथाबलमारम्भ वेगसन्धारणं क्षयम् । यक्ष्मणः कारणं विद्याच्चतुथं विषमाशनम् ॥ १३ ॥ यक्ष्मा के चार कारण—( १ ) अपने बल वा शक्ति से अधिक कार्य करना, ( २ ) वेगो का रोकना, ( ३ ) धातुक्षय और ( ४ ) विषम भोजन, राजयक्ष्मा के ये चार कारण है ॥ १३ ॥ युद्धाध्ययनभाराध्वलङ्घनलवनादिभिः । पतनैरभिघातैर्वा साहसर्वा तथाऽपरः ॥ १४ ॥ अयथाबलमारम्भेर्जन्तोरुरसि विक्षते । वायुः प्रकुपितो दोषावुदीर्योभौ विधावति ॥ १५ ॥ स शिरःस्थः शिरःशूल करोति गलमाश्रितः । कण्ठोद्ध्वंस च कास च स्वरभेदमरोचकम् ॥ १६ ॥ पार्श्वशूलं च पार्श्वस्थो वर्चोभेदं गुदे स्थितः । जम्भा ज्वरं च सन्धिस्थ उरस्थश्चोरसो रुजम् ॥ १७॥ क्षोभनाच्चोरसो रक्तं कासमानः कफानुगम् । जर्जरेणोरसा कृच्छ्रमुरःशूली निरस्यति ॥ १८ ॥ इति साहसिको यक्ष्मा रूपैरेतैः प्रपद्यते । एकादशभिरात्मज्ञः सेवेतातो१ न साहसम् ॥ १९ ॥ ( १ ) शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न क्षय—खूब युद्ध करना, खूब अध्ययन ( पढना ), बहुत भार उठाना, बहुत मार्ग चलना, बहुत लङ्घन, बहुत लवन ( कूदना ), गिरना, चोट लगना, साहस तथा शक्ति से बाहर के अन्यान्य कार्य करने पर पुरुष की छाती मे क्षत हो जाता है। तब प्रकुपित वायु-पित्त और कफ दोनो दोषो को उदीर्ण करके इधर-उधर भागता है। शिर मे पहुच कर शिरःशूल उत्पन्न करता है, गले मे आश्रित होकर कण्ठोद्ध्वंस, १. 'भजेत्तस्मात्' इति वा पाठः ।
४१८ चरकसंहिता [ अ० ८ कास, स्वरभेद और अरुचि उत्पन्न करता है। पार्श्व मे स्थित पार्श्वशूल को गुदा मे स्थित होकर अतीसार को, सन्धियों मे स्थित वायु जम्भाई और ज्वर को, उरः मे स्थित वायु छाती मे दर्द को उत्पन्न करता है। उरः (फेफड़ों) मे छत होने से रोगी के खांसते समय कफ से मिला रक्त बाहर आता है। छाती के जर्जरित होने से कष्ट के साथ कफ निकलता है। साहसिक यक्ष्मा इन कारणो से उत्पन्न होता है, यह यक्ष्मा ग्यारह लक्षणो सहित होता है। इसलिये अपने सामर्थ्य को जानने वाला पुरुष कभी साहस नही करे ॥ १४-१६ ॥ ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् । वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः ॥ २० ॥ तदा वेगप्रतीघातात्कफपित्ते समीरयन् । ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव १ विकारान्कुरुतेऽनिलः ॥ २१ ॥ प्रतिश्यायं च कासं च स्वरभेदमरोचकम् । पार्श्वशूलं शिरःशूलं ज्वरमंसावमर्दनम् ॥ २२ ॥ अङ्गमर्दं मुहुश्छर्दि वर्चोभेदं त्रिलक्षणम् । रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मा यैरुच्यते महान् ॥ २३ ॥ (२) वेग-सन्धारण से उत्पन्न यक्ष्मा—लज्जा से, घृणा से वा भय के कारण जब मनुष्य वायु, मूत्र तथा मल के उपस्थित वेगो को रोकता है, तब वेगों के रुक जाने से प्रकुपित वायु कफ और पित्त को ऊपर, नीचे, तिरछे तीनों गतियों मे प्रेरित करके अनेक विकारो को उत्पन्न करता है। तब प्रतिश्याय, कास, स्वरभेद, अरोचक, पार्श्वशूल, शिरःशूल, ज्वर, कधो मे पीड़ा, अंगमर्द बार बार वमन, अतीसार ये नाना विकार तीनो लक्षणो से उत्पन्न होते हैं। राजयक्ष्मा के ये ग्यारह रूप है, जिनको देख कर राजयक्ष्मा महान् रोग कहा जाता है ॥ २०-२३ ॥ हर्षोत्कण्ठाभयत्रासक्रोधशोकातिकर्शनात् । व्यवायान्शनाभ्या च शुक्रमोजश्च हीयते ॥ २४ ॥ ततः स्नेहक्षयाद्वायुर्वृद्धो दोषानुदीरयन् ॥ प्रतिश्यायं ज्वरं कासमङ्गमर्दं शिरोरुजम् ॥ २५ ॥ श्वासं विड्भेदमरुचि पार्श्वशूलं स्वरक्षयम् । करोति चांससन्तापमेकादशमिमान् गदान् ॥ २६ ॥ १ 'तिर्यगधः कुर्याद्' इति च
४२० चरकसंहिता [ अ० ८ स्त्रीमद्यमांसप्रियता प्रियता चावगुण्ठने ॥ ३४ ॥ मक्षिकाघुणकेशानां तृणानां पतनानि च । प्रायोऽन्नपाने, केशानां नखानां चाभिवर्धनम् ॥ ३५ ॥ पतत्रिभिः पतङ्गैश्च श्वापदैश्चाभिधर्षणम् । स्वप्ने केशास्थिराशीनां भस्मनश्चाधिरोहणम् ॥ ३६ ॥ जलाशयानां शैलानां वनानां ज्योतिषामपि । शुष्यतां क्षीयमाणानां पततां यच्च दर्शनम् ॥ ३७ ॥ प्राग्रूपं बहुरूपस्य तज्ज्ञेयं राजयक्ष्मणः । राजयक्ष्मा का पूर्वरूप—प्रतिश्याय (जुकाम), दुर्बलता, दोषरहित पदाथो मे भी दोष का दीखना, शरीर मे बीभत्सता दीखना, घृणा होना, खाते हुए भी बल और मास का क्षीण होना, स्त्री-प्रियता (मैथुन की चाह), मद्यप्रियता, मासप्रियता, शर्मीलापन (लोगो से मिलने मे संकोच), खान पान मे मक्खियो, घुण, केश, तिनकों का गिरना, केश और नखो का जल्दी जल्दी बढ़ना,स्वप्न मे पक्षियो तथा व्याघ्र आदि हिंसक पशुओ से पराजित होना, बालो, अस्थिया ओर राख के ढेर पर चढ़ना, तालाबो का सूखते हुए, पर्वतो को तथा वनो को क्षीण होते हुए ओर ताराओ को गिरते हुए देखना, यह बहुत रूप वाले यक्ष्मा के पूर्वरूप है ॥ ३३-३७ ॥ रूपं तस्य यथोद्देशं परं शृणु सभेषजम् ॥ ३८ ॥ यथा स्वेनोष्मणा पाकं शारीरा यान्ति धातवः । स्रोतसा च यथास्वेन धातुः पुष्यति धातुना ॥ ३९ ॥ स्रोतसां संनिरोधाच्च रक्तादीनां च संक्षयात् । धातूष्मणां चापचयाद्राजयक्ष्मा प्रवर्तते ॥ ४० ॥ तस्मिन्काले पचत्यग्निर्यदन्नं कोष्ठमाश्रितम् । मलीभवति तत्प्रायः कल्पते किंचिदोजसे ॥ ४१ ॥ तस्मात्पुरीषं संरक्ष्यं विशेषाद्राजयक्ष्मिणः । सर्वधातुक्षयार्तस्य बल तस्य हि विड्बलम् ॥ ४२ ॥ रसः स्रोतःसु रुद्धेषु स्वस्थानस्थो विवर्धते । स ऊर्ध्वं कासवेगेन बहुरूपः प्रवर्तते ॥ ४३ ॥ जायन्ते व्याधयश्चातः षडेकादश वा पुनः । येषां सङ्घातयोगेन राजयक्ष्मेति कल्प्यते ॥ ४४ ॥ अब यक्ष्मा के रूप और औषध सुनो—शरीर मे अपनी गरमी से धातुओ का पाक ( पोषण ) होता है। धातु अपने अपने स्रोतो द्वारा जाकर धातु का
अ० ८ ] चिकित्तिसस्थानम् ४२१
अ० ८ ] चिकित्तिसस्थानम् ४२१ पोषण करता है, रस से रक्त का और रक्त से मास का पोषण होता है। स्रोतों के रुक जाने से, रक्त आदि धातुओं के क्षीण होने से और धातुओ की उष्णिमा के घट जाने से राजयक्ष्मा रोग उत्पन्न हो जाता है। इस अवस्था मे कोष्ठाग्नि आमाशय मे जिस अन्न का परिपाक करती है, उसका अधिक भाग मल बन जाता है। कुछ थोडा सा भाग ही ओज मे परिणत होता है। इसलिये राज- यक्ष्मा के रोगी मे मल की रक्षा करनी चाहिये। क्योकि मल के सिवाय अन्य सब धातु इसमे क्षीण हो जाते है अतः यक्ष्मा रोगी का बल ( शक्ति ) मल ही है¹ । अतः रोगी को अतिसार से बचाना चाहिये। स्रोतो के रुक जाने पर अपने स्थान मे ही रस का सचय अर्थात् वृद्धि होने लगती है, यह रस खासी के वेग के कारण ( आमाशय से ) ऊपर की ओर मुख नाक से अनेक रूपो मे प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात् छ. या ग्यारह रोग ( लक्षण यक्ष्मा के ) हो जाते है, जिनके एकत्र समूह को राजयक्ष्मा के नाम से कहते है ॥ ४०-४४ ॥ यक्ष्मा के लक्षण— कासोऽसतापो वैस्वर्य ज्वरः पार्श्वशिरोरुजौ । शोणितश्लेष्मणोश्छर्दिः श्वासः कोष्ठामयोऽरुचिः ॥ ४५ ॥ रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मणः षडिमानि वा । यक्ष्मा के ग्यारह रूप—कास, कन्धो मे ताप, ( पीडा ) स्वरभेद, ज्वर, पार्श्वशूल, शिरोवेदना, रक्तवमन, कफ का आना, श्वास, कोष्ठामय (अतिसार), अरुचि, ये यक्ष्मा के ग्यारह रूप है ॥ ४५-॥ कासो ज्वरः पार्श्वशूल स्वरवचोंगदोऽरुचिः ॥ ४६ ॥ छः रूप—कास, ज्वर, पार्श्वशूल, स्वरभेद, मलभेद और अरुचि ॥ ४६ ॥ सर्वैरधैस्त्रिभिर्वाऽपि लिङ्गैर्मासबलक्षये । युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ॥ ४७ ॥ १ आहार रस के जीर्ण होते समय पाचकाग्नि से प्रसाद और मल दो भाग बनते है। प्रसाद भाग भी स्थूल और सूक्ष्म दो भागो मे बट जाता है। सूक्ष्म भाग उसी धातु का पोषण करता है, और स्थूल भाग आगे पहुच जाता है, वहा पर अग्रिम धातु की गरमी से तीन भाग बनते है। इस प्रकार होते समय मज्जा से दो ही भाग बनते है, उसमे मलभाग नही होता। यक्ष्मा के रोगी मे मल भाग अधिक बनता है, प्रसाद भाग कम बनता है। ऐसा यत्न करना चाहिये कि शरीर इस मल मे से भी अधिक से अधिक प्रसाद-अश को ले सके, अतः मल की रक्षा करने को कहा है।