भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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३७६ चरकसंहिता [अ० ६

साध्याः कफोत्था दश, पित्तजाः षट् याप्या, न साध्याः पवनाच्चतुष्काः ।
समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ७ ॥
कफः सपित्तः पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः ।
मज्जारसौजः पिशितं च दूष्यं प्रमेहिणा विंशतिरेव मेहाः ॥ ८ ॥
(१) सम क्रिया होने से कफजन्य दस प्रमेह साध्य है, (२) विषम
क्रिया होने से पित्तजन्य छः प्रमेह याप्य है और (३) महात्यय अर्थात् बहुत
आपत्तिकारक होने से वातजन्य चार प्रमेह असाध्य है ।
(१) समक्रिय—जो ओषधिया दूष्य, मेद, मज्जा, लसीका आदि को शान्त
करते है, वे ही ओषधिया कफ को भी शान्त करती है, इसलिये इनकी क्रिया
समान है। (२) विषमक्रिय—जो ओषधिया कटु, तिक्त आदि मेद, मज्जा
को कम करती है, वे पित्त को बढाती है, और जो मधुर आदि रस पित्त को
शान्त करते है, वे इनको बढाते है, इसलिये विषम क्रिया है। (३)
महात्यय—मज्जा, ओज, लसीका आदि महान् धातुओ का इसमे क्षय होता है ।
स्निग्ध चिकित्सा जो वायु को शमन करती है, इनको बढाती है। रूक्ष चिकित्सा
वायु को बढाती है। इसलिये ये असाध्य है¹।
प्रमेह मे कफ, पित्त और वायु ये तीन दोष है, मेद, रक्त, शुक्र, आप्य
(जलीय भाग) वसा, लसीका, मज्जा, रस, ओज और मास ये दूष्य हे ।
प्रमेहियो के बीस प्रकार के ही प्रमेह होते है ॥ ७–८ ॥
जलोपमं चेक्षुरसोपमं वा घनं घनं चोपरि विप्रसन्नम् ।
शुक्लं सशुक्रं शिशिरं शनैर्वा लालेव वा बालुकया युतं वा ॥ ९ ॥
विद्यात्प्रमेहान्कफजान्दशैतान्
दस प्रकार के कफजन्य प्रमेह—(१) जिसमे मूत्र जल के समान हो
(उदक-मेह), २–गन्ने के रस के समान हो (इक्षुमेह), ३–मूत्र घना हो
(सान्द्रमेह), ४–जिसमे मूत्र नीचे घना और ऊपर स्वच्छ हो (सान्द्रप्रसाद
प्रमेह), ५–मूत्र श्वेत हो (शुक्लमेह), ६–शुक्रमिश्रित मूत्र हो (शुक्रमेह),
७–मूत्र शीतल हो (शीतमेह), ८–मूत्र का वेग धीमा हो (शनैर्मेह), ९–मूत्र
लार के समान हो (लालामेह), १०–मूत्र बालुका के कणों से युक्त हो
(सिकतामेह), इन दस प्रमेहो को कफ से उत्पन्न हुआ जाने ॥ ६-॥
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१ प्रमेह मे दोष ओर दूष्य की समानता का होना ही सुखसाध्यता का
लक्षण है। ज्वर मे ऋतु और दोष की समानता, प्रमेह मे दोष और दूष्य की
समता तथा रक्तगुल्म मे पुरातनता ये सुखसाध्यता के चिह्न कहे जाते है ।