चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] \hspace{150pt} चिकित्सितस्थानम् \hspace{150pt} ३७७ \hspace{100pt} क्षारोपमं कालमथापि नीलम् । हारिद्रमाञ्जिष्ठमथापि रक्तमेतान्प्रमेहान्षडुशन्ति पैत्तान् ॥ १० ॥ \hspace{20pt} पित्तजन्य छ प्रमेह—( १ ) क्षार के समान 'क्षारमेह', ( २ ) काले वर्ण का मूत्र 'कालमेह', ( ३ ) नीलेवर्ण का मूत्र 'नीलमेह', ( ४ ) हल्दी के समान वर्ण का मूत्र 'हारिद्रमेह', ( ५ ) मजीठ के वर्ण का 'माञ्जिष्ठमेह', ( ६ ) लालवर्ण का 'रक्तमेह', ये छ. पित्तजन्य प्रमेह है ॥ १० ॥ मज्जौजसा वा वसयाऽन्वित वा लसीकया वा सतन विबद्धम् । चतुर्विधं मूत्रयतीह वाताच्छ्लेषेषु धातुष्वपकर्षितेषु ॥ ११ ॥ वर्णं रस स्पर्शमथापि गन्ध यथास्वदोष भजते प्रमेहः । श्यावारुणो वातकृतः सशूलो मज्जादिसाद्गुण्यमुपैत्यसाध्यः ॥ १२ ॥ \hspace{20pt} चार प्रकार के वातिक प्रमेह—( १ ) मजामेह, ( २ ) ओजामेह, ( ३ ) वसामेह ओर ( ४ ) लसीकामेह ( जिसमे लसीका की तारे निकलती है ) ये चार प्रमेह आरम्भक धातुओ ( मज्जा, ओज आदि ) के क्षीण होने पर होते है । अथवा पित्त और कफ की अपेक्षाकृत न्यूनता होने से प्रमेह होते है । \hspace{20pt} प्रमेह मे अपने वात आदि दोषो के अनुसार वर्ण, रस, स्पर्श अथवा गन्ध होता है । असाध्य वातजन्य प्रमेह मे श्याव, अरुण, शूलयुक्त तथा मज्जा, वसा, लसीका या ओज के समान गुण होता है ॥११-१२॥ स्वेदोऽङ्गगन्धः शिथिलाङ्गता तु शय्यासनस्वप्नसुख रतिश्च । हृन्नेत्रजिह्वाश्रवणोपदेहा घनाङ्गता केशनखातिवृद्धिः ॥ १३ ॥ शीतप्रियत्व गलतालुशोषो माधुर्यमास्ये करपाददाहः । भविष्यतो मेहगदस्य रूपं मूत्रेऽभिधावन्ति पिपीलिकाश्च ॥ १४ ॥ \hspace{20pt} पूर्वरूप—पसीना, शरीर से गन्ध का आना, अगा मे शिथिलता, लेटने, बैठने और सोने मे प्रीति, हृदय, नेत्र, जीभ और कान मे मैल का आना, शरीर मे मोटापा, केश, नखो का अधिक बढना, शीत की चाह, गला और तालु का शुष्क होना, मुख मे मधुरता, हाथ और पाव के तलुवे मे जलन, मूत्र पर ( मधुरता से ) चिउटियो का आना, ये प्रमेह के पूर्वरूप है ॥ १३-१४ ॥ स्थूलः प्रमेही बलवानिहैंकः कृशस्तथैकः परिदुर्बलश्च । संबृंहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषबलाधिकस्य ॥ १५ ॥ \hspace{20pt} प्रमेह रोगी दो प्रकार के हैं। जैसे एक स्थूल और बलवान्, दूसरा कृश तथा दुर्बल शरीर का। इनमे से कृश व्यक्ति का बृं हण करना चाहिये और प्रबल दोष ओर अधिक बलवान् पुरुष मे सशोधन करना चाहिये । चिकित्सा