चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ चरकसंहिता [ अ० ६ दो प्रकार की है, सशोधन और सशमनी। इनमे जिन पुरुषो की माता-पिता के द्वारा जन्म से प्रमेह होता है वे कृश होते है और जिन को अधिक खाने से वा स्निग्ध भोजन से होता है, वे बलवान् होते है। [ दो प्रकार के प्रमेह होते है (१) सहज, और (२) अपथ्य से उत्पन्न। माता-पिता के बीजदोष से उत्पन्न 'सहज' है, प्रतिकूल आहार से उत्पन्न 'अपथ्यज' होता है। प्रथम प्रकार का प्रमेही कृश, अल्पभोजी और प्यास बहुत अनुभव करता है। दूसरे प्रकार का प्रमेही स्थूल, बहुत खानेवाला, सेज पर पडे रहने वाला, आलसी होता है। [ सुश्रुत।]॥ १५॥ स्निग्धस्य योगा विविधाः प्रयोज्याः कल्पोपदिष्टा मलशोधनाय। ऊर्ध्वं तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ॥ १६॥ उपचार—(१) स्निग्ध रोगी के मल के सशावन के लिये कल्पस्थान ने वर्णित नाना प्रकार के यागा का प्रयाग करे। इसके लिये वमन और विरेचन का प्रयाग करे। वमन और विरेचन द्वारा मल निकल जाने पर प्रमेह मे सन्तर्पण ही कर। स्नेहन के लिये सरसा, अलसी, इगुदी आदि के तैल हो या प्रियग्वादि गण से सिद्ध घृत आदि से स्नेहन कर ॥ १६ ॥ गुल्मः क्षयो मेहनबस्तिशूलं मूत्रग्रहश्चाप्यपतर्पणेन । प्रमेहिणः स्युः परिबृंहणानि १ कार्याणि तस्य प्रसमीक्ष्य वह्निम् ॥१७॥ संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया सशमनी प्रयोज्या । मन्थाः कषाया यवचूर्णलेहाः प्रमेहशान्त्यै लघवश्च भक्ष्याः ॥ १८ ॥ ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषा रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः । यवौदनं रूक्षमथापि वाट्यं मद्यात्ससक्तूनपि चायपूपान् ॥ १६ ॥ मुद्गादियूषैरथ तिक्तशाकैः पुराणशाल्योदनमाददीत । दन्तीङ्गुदीतैलयुत प्रमेही तथाऽतसीसर्षपतैलयुक्तम् ॥ २० ॥ सषष्टिकं स्यात्तृणधान्यमन्न यवप्रधानस्तु भवेत्प्रमेही । यवस्य भक्ष्यान्विविधास्तथाऽद्यात्कफप्रमेही मधुसप्रयुक्तान् ॥२१॥ निशिस्थिताना त्रिफलाकषायैः स्युस्तर्पणाः क्षौद्रयुता यवानाम् । तान्सीधुयुक्तान्पिबेत्प्रमेही प्रायोगिकान्मेहवधार्थमेव ॥ २२॥ (२) प्रमेह-रोगी को अपतर्पण कराने से गुल्म, क्षय, मूत्रेन्द्रिय वा बस्ति मे शूल, मूत्रग्रह (मूत्र का कम आना) हो जाता है। इसके लिये रोगी की अग्नि देखकर बृंहण चिकित्सा करे। १ 'परितर्पणानि' इति च पाठ ।