भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७५ षष्ठोऽध्यायः अथातः प्रमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब प्रमेह की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥१-२॥ निर्मोहमानानुशयो निराशः पुनर्वसुर्ज्ञानतपोविशालः । कालेऽग्निवेशाय सहेतुलिङ्गानुवाच मेहान् शमनं च तेषाम् ॥ ३ ॥ आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि । नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ ४ ॥ निर्मोह, निरभिमानी, तृणारहित, आकाक्षारहित, महाज्ञानी, महातपस्वी पुनर्वसु ने उचित समय पर अग्निवेश का प्रमेह, उसके कारण, लक्षण और चिकित्सा का उपदेश दिया । कफ-प्रमेह का निदान—सुख का जीवन बिताना ( चलना फिरना नही ), आराम तलबी मे लेटे रहना, दही, ग्राम्य, औदक ( जलचर ) जन्तु और आनूप ( जल-प्रधान ) देश के पशु-पक्षिया का मास-रस, दूध, नूतन खान-पान ( नवीन अनाज ओर नूतन मद्य ), गुड से बने पदार्थों का अति सेवन तथा अन्य कफकारक पदार्थ कफ-प्रमेह को उत्पन्न करते है ॥३-४॥ मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतं प्रदूष्य । करोति मेहान्समुदीर्णमुष्णैस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ ५ ॥ क्षीणेपु दोषेष्ववकृष्य बस्तौ धातून्प्रमेहाननिलः करोति । दोषो हि बस्ति समुपत्य मूत्रं संदूष्य मेहाञ्जनयेद्यथास्वम् ॥ ६ ॥ सम्प्राप्ति—( १ ) दूषित कफ-मेद, मास और शारीरिक क्लेद को दूषित करके वस्ति मे पहुच कर प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( २ ) उष्ण द्रव्यों से प्रवृद्ध और कुपित पित्त मेद आदि को दूषित करके पैत्तिक प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( ३ ) कफ-पित्त दोषो के क्षीण होने पर वायु, मज्जा, वसा, ओज ओर लसीका को बस्ति मे लाकर प्रमेह को उत्पन्न करता है । ( ४ ) दूषित दाष बस्ति मे पहुच कर मूत्र को दूषित बनाकर अपने अपने लक्षणो वाले प्रमेहों को उत्पन्न करते है ॥ ५-६ ॥