भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

३७४ चरकसंहिता [ अ० ५ अनुवासन दे, अथवा तिक्त द्रव्यों से युक्त जीवनीय घृत से अनुवासन करावे ॥ १७४-१८३ ॥ तत्र श्लोकाः—स्नेहः स्वेदः सर्पिश्शूर्णानि बृंहणं गुडिकाः । वमनविरेकौ मोक्षः क्षतजस्य च वातगुल्मवताम् ॥ १८४ ॥ सर्पिः सतिक्तसिद्ध क्षीर प्रस्रंसनं निरूहाश्च । रक्तस्य चावसेचनमाश्वामनसमनयोगाः ॥ १८५ ॥ उपनाहनं सशस्त्र पक्वस्याभ्यन्तरप्रभिन्नस्य । संशोधनसंशमने पित्तप्रभवस्य गुल्मस्य ॥ १८३ ॥ स्नेहः स्वेदो भेदो लङ्घनमूल्लेखनं विरेकश्च । सर्पिर्बस्तिर्गुडिकाश्चूर्णमरिष्टाश्च सक्षाराः ॥ १८७ ॥ गुल्मस्यान्ते दाहः कफजस्याग्रेऽपनीतरक्तस्य । गुल्मस्य रौधिरस्य क्रियाक्रमः स्त्रीभवस्योक्तः ॥ १८८ ॥ पथ्यान्नपानसेवाहेतूनां वर्जनं यथास्वं च । नित्यं चाग्निसमाधिः स्निग्धस्य च सर्वकर्माणि ॥ १८९ ॥ हेतुर्लिङ्गं सिद्धिः क्रियाक्रमः साध्यतानुयोगाश्च । गुल्मचिकित्सितसंग्रह एतावानग्निवेशस्य ॥ १९० ॥ वात-गुल्म मे—स्नेह, स्वेद, घृत, चूर्ण, बृं हण गुटिकाये, वमन, विरेचन, रक्त-मोक्षण करे । पित्त गुल्म मे—तिक्त द्रव्यो से सिद्ध घृत, दूध, विरेचन, निरूह, रक्तमोक्षण, आश्वासन, सशमनीय योग, उपनाहन, पकने पर शस्त्र-क्रिया, अन्तः गुल्म के प्रभिन्न होने पर सशोवन और समशन चिकित्सा करे । कफ- गुल्म मे—स्नेहन, स्वेदन, भेदन, लघन, वमन, विरेचन, घृत, बस्तिया, गुटिका, चूर्ण, अरिष्ट-पान, क्षार-प्रयोग, रक्तभाक्षण और अन्त मे दाह करना यह चिकित्सा-क्रम है । स्त्रियो मे होने वाले रक्त-गुल्म का चिकित्सा-क्रम कह दिया है । पथ्यकारी खान-पान, रोग के अपने कारण का परित्याग, नित्य अग्नि की रक्षा, गुल्म-रागी को स्नेहन देकर पश्चात् सब कायो का करना, गुल्म का हेतु, लक्षण, चिकित्साविधि, साध्यासाध्यता और योग इतना गुल्म की चिकित्सा का सग्रह अग्निवेश ने बतलाया है ॥ १८४-१९० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने गुल्मचिकित्सित नाम पञ्चमोऽध्याय समाप्तः ॥ ५ ॥