चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३७२ चरकसंहिता [ अ० ५ असाध्यता—जो गुल्म धीरे-धीरे बढ़ कर बड़े भारी स्थान को घेर लेता है, जिसने जड़ पकड़ ली हो, सिराओ से व्याप्त, कछुुए के समान ऊपर को उठा हुआ, दुर्बलता, अरुचि, जी मचलाना, कास, वमन, बेचैनी, ज्वर, प्यास, तन्द्रा, प्रतिश्याय से युक्त होता है, वह गुल्म असाध्य हे । ज्वर, श्वास, वमन और अतीसार से पीड़ित गुल्म रोगी के हृदय, नाभि ओर हाथ पाव मे शोथ हो जाय ता रोगी की मृत्यु हा जाती है। यह शोथ उसका पीडित करता है ॥ १६६-१७१ ॥ रोधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे ॥ १७२ ॥ स्निग्धस्विन्नशरीराय दद्यात्स्नेहविरेचनम् । रक्त-गुल्म की चिकित्सा—( १ ) गर्भकाल अथोत् दस मास व्यतीत हो जाने पर गर्भवती के शरीर का स्नेहन और स्वेदन करके [ घृत आदि को ] स्निग्ध विरेचन दे । जैसे—एरण्ड तैल ॥ १७२ ॥ पलाशक्षारपात्रे१ द्वे द्वे पात्रे तैलसर्पिषोः ॥ १७३ ॥ गुल्मशैथिल्यजननीं पक्त्वा मात्रां प्रयोजयेत् । ( २ ) पलाश-क्षार यमक—तिल तैल २ पात्र ( २ आढक ), घी २ पात्र, पलाश क्षारादक [ ढाक की भस्म को ६ गुने पानी मे २१ वार परिस्रुत करके तय्यार किया क्षारादक ] चार आढक लेकर स्नेह पाक करे । जब झाग उठ जाये और आकृति फटे दूध के समान हो जाये तब स्नेहपाक समझे । इस यमक की मात्रा रागिणी का पिलावे इससे गुल्म शिथिल हो जाता है । [ मात्रा ३ मासा ] ॥ १७३- ॥ प्रभिद्येत न यद्येवं दद्याद्योनिविशोधनम् ॥ १७४ ॥ क्षारेण युक्तं पललं सुधाक्षीरेण वा पुनः । आभ्यां वा भावितन्दद्याद्योनौ कटुकमत्स्यकान् ॥ १७५ ॥ वराहमत्स्यपित्ताभ्यां लक्तकान् वा सुभावितान् । अधोहरैश्चोर्ध्वहरैर्भावितान् वा समाक्षिकैः२ ॥ १७६ ॥ किण्वं वा सगुडक्षारं दद्याद्योनिविशोधनम् । रक्तपित्तहरं क्षारं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १७७ ॥ लशुनं मदिरा तीक्ष्णा मत्स्यांश्चास्यै प्रदापयेत् । बस्ति सक्षीरगोमूत्रं सक्षारं दाशमूलिकम् ॥ १७८ ॥ १ 'पादे' इति च पाठ. । २ 'समाक्षिकान्' इत च पाठ ॥