भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७१ फलप्रद अरिष्ट प्रयोगो का ग्रहणी तथा अर्शरोग की चिकित्सा मे कहेगे । जो चूर्ण ओर गुटिकाये वातगुल्म मे कही है, उनमे यवक्षार, हीग और अम्लवेतस की मात्रा को दुगुना करके (शेष चूर्ण को उसी परिमाण मे ) कफ-गुल्म मे प्रयोग करे । ग्रहणी राग मे जो क्षार कहे है, उनको कफ-गुल्म मे प्रयोग करे, ये क्षार निर्दोष ओर प्रशस्त है । जब किसी भी चिकित्सा से लाभ न हो तभी अन्त मे दाहकर्म करे ॥ १६१-१६३ ॥ प्रपुराणानि धान्यानि जाङ्गला मृगपक्षिणः ॥ १६४ ॥ कौलत्थो मुद्गयूपश्च पिप्पल्या नागरस्य च । शुष्कमूलकयूपश्च बिल्वस्य वरुणस्य च ॥ १६५ ॥ चिरबिल्वाङ्कुराणां च यवान्याश्चित्रकस्य च । बीजपूरकहिङ्ग्वम्लवेतसक्षारदाडिमैः ॥ १६६ ॥ तक्रेण तैलसर्पिर्भ्यां व्यञ्जनान्युपकल्पयेत् । पञ्चमूलीशृतं तोयं पुराणं वारुणीरसम् ॥ १६७ ॥ कफगुल्मी पिबेत्काले जीर्णं माध्वीकमेव वा । यवानीचूर्णितं तक्रं बिडेन लवणीकृतम् ॥ १६८ ॥ पिबेत्सद्दीपनं वातमूत्रवर्चोऽनुलोमनम् । आहार—तीन चार वर्ष पुराने धान्य, जागल पशु-पक्षिया का मास, कुलथी, मूग का यूप, पिप्पली का यूप, सोंठ का यूप, सूखी मूली का यूष, बेलगिरी, वरुण, करज के अकूर, अजवायन और चित्रक का यूष कफ-गुल्म मे उत्तम है। बिजौरा, हींग, अम्लवेतस, क्षार, अनारदाना, छाछ, तैल और घी इनके साथ व्यजन ( सूप शाक आदि ) बनावे । कफ-गुल्म रोगी को प्यास लगने पर स्वल्प पञ्चमूल से सिद्ध किया पानी या पुरातन वारुणी ( ताड़ वा खजूर का मद्य ) अथवा पुरातन माध्वीक ( मधु, महुवे, अगूर के रस से बना मद्य ) पीने के लिये दे । तक्र मे अजवायन का चूर्ण और बिड नमक मिलाकर पीवे । यह तक्र अग्निदीपक, वायु, मल, मूत्र का अनुलोमन करती है ॥ १६४-१६८ ॥ संचितः क्रमशो गुल्मो महावास्तुपरिग्रहः ॥ १६९ ॥ कृतमूलः सिरानद्धो यदा कूर्म इवोन्नतः । दौर्बल्यारुचिहृल्लासकासवम्यरतिज्वरैः ॥ १७० ॥ तृष्णातन्द्राप्रतिश्यायैर्यंयुज्यते न स सिध्यति । गृहीत्वा सज्वरश्वासं वम्यतीसारपीडितम् ॥ १७१ ॥ हृन्नाभिहस्तपादेषु शोफः कर्षति गुल्मिनम् ।