चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 385, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३७० चरकसंहिता [ अ० ५ क्षिपेच्चूर्णपलं चैकं त्वगेलापत्रकेशरात् । ततो लेहपलं लीढ्वा जग्ध्वा चैकां हरीतकीम् ॥ १५८ ॥ सुखं विरिच्यते स्निग्धो दोषप्रस्थमनामयः । गुल्मं श्वयथुमर्शांसि पाण्डुरोगमरोचकम् ॥ १५६ ॥ हृद्रोगं ग्रहणीदोषं कामलां विषमज्वरम् । कुष्ठं प्लीहानमानाहमेषा हन्त्युपयोजिता ॥ १६० ॥ निरत्ययः क्रमश्चास्या द्रवो मांसरसौदनः । इति दन्तीहरीतकी । (८) दन्ती-हरीतकी—२५ हरडो को एक पोटली मे ढीला बाघकर, दन्तीमूल २५ पल लेकर दो द्रोण पानी मे पकावे । जब अष्टमाश (४ प्रस्थ) शेष रह जाय तब छान लेवे इसमे २५ पल गुड मिलाकर छान ले । इसमे अब हरड़ो को छोड़ दे फिर हरड़ो को निकाल कर गुठली निकाल दे । इन हरडो को ४ पल तिल तैल मे भून कर गुड मिश्रित क्वाथ मे मिला दे। इसमे निशोथ का चूर्ण ४ पल, पिप्पली और सोठ एक पल मिलाकर मन्द २ आच पर पकावे । जब लेह तय्यार हो जाय तब नीचे उतार कर तैल के समान शहद (४ पल), दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेसर का मिलित चूर्ण १ पल मिलावे । इसमे से एक पल अवलेह चाट कर और एक हरड को खाने से सुखपूर्वक विरेचन होता है । नीरोग और स्निग्ध पुरुष मे एक प्रस्थ दोष बाहर आता है । गुल्म, सूजन, अर्श, पाण्डुरोग, अरुचि, हृदयरोग, ग्रहणी- रोग, कामल', विषम ज्वर, कुष्ठ, प्लीहा, आनाह इससे नष्ट होते है । इसका सेवन निर्दोष है । इसका पथ्य मास रस और भात है । मास रस इतना हो जिससे भात पतला बन जाये । [ यहा पर प्रस्थ १३।। पल का समझे । वमन, विरेचन और शोणित-मोक्षण मे १३३ पल का एक प्रस्थ बतलाया गया है ] ॥ १५४-१६० ॥ सिद्धाः सिद्धिषु वक्ष्यन्ते निरूहाः कफगुल्मिनाम् ॥ १६१ ॥ अरिष्टयोगाः सिद्धाश्च ग्रहण्यार्शश्चिकित्सिते । यच्चूर्णं गुटिका याश्च विहिता वातगुल्मिनाम् ॥ १६२ ॥ द्विगुणक्षारहिङ्ग्वम्लवेतसास्ताः कफे मताः । य एव ग्रहणीदोषे क्षारास्ते कफगुल्मिनाम् ॥ १६३ ॥ सिद्धा निरत्ययाः शस्ता दाहस्त्वन्ते प्रशस्यते । कफ गुल्म मे प्रयोग करने योग्य निरूह बस्तियो का सिद्धि-स्थान मे कहेगे ।