चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४५
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४५ हवि ( आहुतिया, अन्न ) और धूम्रवर्ग के पशुओं की कल्पना किया करते थे १ । इन्द्र प्रातःसवन में ( यज्ञस्थान में ) अश्वियों के साथ सोमपान करते हैं । सौत्रामणि यज्ञ मे भगवान् अश्वियों के साथ प्रसन्न होते हैं । द्विज लोग प्रायः इन्द्र, अग्नि और अश्वियों की स्तुति करते हैं। वेद वाक्यों में अन्य देवताओं की ऐसी स्तुति नहीं की जाती, जैसी कि अश्वियों की है। जरारहित, मृत्युरहित, बुद्धिमान् और स्थिर देवगण भी अपने राजा इन्द्र के साथ बड़े प्रयत्न से चिकित्सक अश्वियों की पूजा करते हैं, तो फिर मृत्यु, रोग तथा बुढ़ापे से निश्चय रूप में पीड़ित होने वाले परन्तु सुख की चाह रखने वाले मनुष्य किस लिये अपनी पूर्ण शक्ति के साथ इनकी पूजा न करें। अवश्य वैद्यों की पूजा मनुष्यो को करनी चाहिये ।; ५० ॥ शीलवान्मतिमान् युक्तो द्विजातिः शास्त्रपारगः । प्राणिभिर्गुरुवत्पूज्यः प्राणाचार्यः स हि स्मृतः ॥ ५१ ॥ विद्यासमाप्तौ भिषजस्तृतीया२ जातिरुच्यते । अश्नुते वैद्यशब्दं हि न वैद्यः पूर्वजन्मना ॥ ५२ ॥ विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सत्त्वमार्षमथापि वा । ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद्वैद्यद्विजः३स्मृतः ॥ ५३ ॥ नाभिध्यायेन्न चाक्रोशेदहितं न समाचरेत् । प्राणाचार्यं बुधः कश्चिदिच्छन्नायुरनित्वरम् ॥ ५४ ॥ चिकित्सितस्तु संश्रुत्य यो वाऽसंश्रुत्य मानवः । नोपाकरोति वैद्याय नास्ति तस्येह निष्कृतिः ॥ ५५ ॥ भिषगप्यातुरान् सर्वान् स्वसुतानिव यत्नवान् । आबाधेभ्यो हि संरक्षेदिच्छन् धर्ममनुत्तमम् ॥ ५६ ॥ सुशील, बुद्धिमान्, द्विजाति आयुर्वेद शास्त्र में निष्ठा व्यक्ति को 'प्राणाचार्य' कहते हैं। इस व्यक्ति की पूजा लोगों को गुरु के समान करनी चाहिये । आयु- र्वेद की समाप्ति पर ही चिकित्सक की तीसरी (दूसरी) जाती होती है। पूर्वजन्म से कोई वैद्य नहीं होता, आयुर्वेद का ज्ञान गुरुमुख से पढ़ने पर 'वैद्य' कहाता है, विद्या की समाप्ति पर ही ब्राह्म सत्त्व या आर्ष सत्त्व ( मन ) १ 'मत्राणि' के स्थान पर 'शस्त्राणि' पाठ भी है। 'वषट्कार से युक्त मन्त्र ही 'शस्त्र' कहाते हैं। धूम्र के स्थान पर 'धूम' पाठ करने पर 'धूप' अगरबत्ती आदि का धूम लेना चाहिये। २. 'भिषजो द्वितीया' इति च पाठः । ३. 'वैद्यो द्विजः' इति च पाठः ।
२४६ चरकसंहिता [ अ० १ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
बनता है। ज्ञान के कारण ही ब्रह्मत्व या आर्षत्व आता है। इसलिये वैद्य को त्रिज (द्विज) कहते हैं। उसका यह ती (दू) सरा जन्म होता है जो बुद्धिमान् मनुष्य अपनी दीर्घ आयु चाहे उसको चाहिये कि प्राणाचार्य वैद्य का न तो तिरस्कार करे, न उसकी निन्दा करे और न उसका कुछ बुरा ही करे। जो पुरुष वैद्य द्वारा चिकित्सा कराके धन आदि देने की प्रतिज्ञा करके अथवा न करके भी वैद्य का प्रत्युपकार नही करता, उसकी कहीं भी निष्कृति (कल्याण) नहीं। वैद्य का कर्त्तव्य है कि रोगियों को अपने पुत्र के समान समझे। सर्वो- त्तम धर्म की इच्छा रखते हुए इनको रोगों से बचावे ॥ ५१-५६ ॥ धर्मार्थं नार्थकामार्थमायुर्वेदो महर्षिभिः । प्रकाशितो धर्मपरैरिच्छद्भिः स्थानमक्षरम् ॥ ५७ ॥ नार्थार्थं नापि कामार्थमथ भूतदयां प्रति । वर्तते यश्चिकित्सायां स सर्वमतिवर्तते ॥ ५८ ॥ कुर्वते ये तु वृत्त्यर्थं चिकित्सापण्यविक्रयम् । ते हित्वा काञ्चनं राशिं पाशुराशिमुपासते ॥ ५६ ॥ धर्मपरायण महर्षियों ने अक्षय स्थान (मुक्ति, ब्रह्म-साक्षात्कार) की चाहना से धर्म के लिये आयुर्वेद का प्रकाश किया है। धन की इच्छा से आयुर्वेद का प्रकाश नहीं किया। जो वैद्य केवल प्राणिमात्र के दया भाव से चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त होता है, किसी धन की इच्छा (स्वार्थ) से प्रवृत्त नहीं होता, वह सब पुण्य कार्यों को अतिक्रमण कर जाता है। जो व्यक्ति पेट के लिये चिकित्सा को दुकानदारी बनाते हैं, वे लोग स्वर्ण की राशि को छोड़ कर (धर्म को छोड़ कर), धूल की ढेरी बाँधते हैं। (पाप की गठरी सिर पर धरते हैं) ॥ ५६ ॥ दारुणैः कृष्यमाणानां गदैर्वैवस्वतक्षयम् । छित्त्वा वैवस्वतान् पाशाञ्जीवितं च प्रयच्छति ॥ ६० ॥ धर्मार्थसदृशस्तम्य दाता नेहोपलभ्यते । न हि जीवितदानाद्धि दानमन्यद्विशिष्यते ॥ ६१ ॥ परो भूतदया धर्म इति मत्वा चिकित्सया । वर्तते यः स सिद्धार्थः सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ६२ ॥ कठिन पीड़ा देने वाले, रोगों से पीड़ित यमालय की ओर जाते हुए व्यक्तियों को यम के पास काट कर छुड़ाता है, उनको जीवन देता है, उसके समान धर्म-अर्थ का दाता इस संसार में और कोई नहीं है। क्योंकि जीवन-दान से बढ़कर और कोई दान संसार में नहीं है। प्राणियों पर दया करना उत्कृष्ट
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७ धर्म है, ऐसा समझ कर चिकित्सा में जो प्रवृत्त होता है उसकी सब कामनायें पूर्ण होती हैं, उसको अत्यन्त सुख मिलता है ॥ ६०-६२ ॥ तत्र श्लोकः- आयुर्वेदसमुत्थानं दिव्यौषधिविधिः शुभः । अमृतालपान्तरगुणं सिद्धं रत्नरसायनम् ॥ ६३ ॥ सिद्धेभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो यदुवाचामरेश्वरः । आयुर्वेदसमुत्थाने तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ६४ ॥ आयुर्वेद की उत्पत्ति, दिव्य ओषधियों का हितकर विधान, अमृत से थोड़े कम गुण रखने वाले सिद्ध रसायन, जिन को देवराज इन्द्र ने सिद्ध, ब्रह्मचा- रियों को उपदेश किया था, वह सब भगवान् पुनर्वसु ने इस 'आयुर्वेद-समुत्थान' अध्याय में कह दिया ॥ ६३-६४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आयुर्वेद- समुत्थानीयो नाम रसायनपादश्चतुर्थः ॥ ४ ॥ समाप्तश्चायं प्रथमो रसायनाध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः ( प्रथमः पादः ) [ स्वस्थ पुरुष के ऊर्ज को बढ़ाने के लिये रसायन और वाजीकरण हैं । रसायन के पीछे वाजीकरण औषध प्रयोग करने चाहियें । तभी इनका प्रभाव उत्तम होता है । इसलिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । ] अथातः संप्रयोगशरमूलीयं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब आगे 'संप्रयोग-शरमूलीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ वाजीकरणमन्विच्छेत् पुरुषो नित्यमात्मवान् । तदायत्तौ हि धर्मार्थों प्रीतिश्च यश एव च ॥ ३ ॥ पुत्रस्याऽऽयतनं ह्येतद् गुणाश्चैते सुताश्रयाः । जितेन्द्रिय पुरुष प्रतिदिन वाजीकरण की इच्छा करे । इसके ऊपर ही धर्म, अर्थ, प्रीति और यश आश्रित हैं । यह वाजीकरण पुत्रोत्पत्ति का कारण है और धर्म, अर्थ, प्रीति, यश आदि समस्त गुण पुत्र के ऊपर आश्रित हैं ॥ ३ ॥
२४८ चरकसंहिता [ अ० २ वाजीकरणमग्र्यं च क्षेत्रं स्त्री या प्रहर्षिणी ॥ ४ ॥ इष्टा ह्येकैकशोऽप्यर्थाः परं प्रीतिकराः स्मृताः । किं पुनः स्त्रीशरीरे ये सङ्घातेन व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥ सङ्घातो हीन्द्रियार्थानां स्त्रीषु नान्यत्र विद्यते । स्त्र्याश्रयो हीन्द्रियार्थो यः स प्रीतिजननोऽधिकम् ॥ ६ ॥ स्त्रीषु प्रीतिविशेषेण स्त्रीष्वपत्यं प्रतिष्ठितम् । धर्मार्थौ स्त्रीषु लक्ष्मीश्च स्त्रीषु लोकाः प्रतिष्ठिता ॥ ७ ॥ सुरूपा यौवनस्था या लक्षणैर्या विभूषिता । या वश्या शिक्षिता या च सा स्त्री वृष्यतमा मता ॥ ८ ॥ सब से प्रधान वाजीकरण— सब से श्रेष्ठ वाजीकरण 'क्षेत्र' है, और हर्ष को उत्पन्न करने वाली स्त्री 'क्षेत्र' है । [ स्त्री में बीज का वपन अर्थात् आधान होता है, इसलिये स्त्री को 'क्षेत्र' कहते हैं । ] एक एक भी मनचाहा ग्राह्य विषय रूप, रस, गन्ध आदि अत्यन्त प्रीति को उत्पन्न करता है । परन्तु ये सब रूप आदि विषय सम्मिलित होकर स्त्री के शरीर में उपस्थित होते हैं, तब फिर क्यों न उसमें प्रीति उत्पन्न हो, अवश्य होगी । स्त्रियों में आश्रित इन्द्रियों के विषय ही प्रीति को अधिक उत्पन्न करते हैं, अन्य स्थानों में आश्रित विषय इतनी प्रीति को उत्पन्न नहीं करते । मनुष्य की स्त्रियों में ही विशेषतः प्रीति अर्थात् ( स्नेह की मात्रा अति अधिक रहती है ) । सन्तान स्त्रियों में ही प्रति- ष्ठित है । धर्म, अर्थ और लक्ष्मी भी स्त्रियों में ही प्रतिष्ठित है । स्त्रियों में ही सब लोक प्रतिष्ठित हैं । जो स्त्री रूपवती, युवती, ( काम-शास्त्र में वर्णित ) उत्तम २ लक्षणों से सुभूषित, वश में रहनेवाली, ( कामशास्त्र में वर्णित ६४ कलाओं में ) शिक्षित, निपुण हो, वह स्त्री सबसे उत्तम वाजीकरण है ॥४-८॥ नानाभक्त्या तु लोकस्य दैवयोगाच्च योषिताम् । तं तं प्राप्य विवर्धन्ते नरं रूपादयो गुणाः ॥ ६ ॥ लोगों की भिन्न भिन्न रुचि होने के कारण और दैवयोग से स्त्रियों के रूप आदि गुण उस उस प्रकार की रुचि वाले पुरुष के मिलने से बढ़ते हैं । [स्त्रियों के गुणों के अनुकूल यदि पुरुष मिल जाये तब तो गुण बढ़ते हैं, अन्यथा घट जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं ] ॥ ६ ॥ वयोरूपवचोहावै १ र्या यस्य परमाङ्गना । प्रविशत्याशु हृदयं दैवाद्रा कर्मणोऽपि वा ॥ १० ॥ हृदयोत्सवरूपा या या समानमनोरमा २ । १. 'मृजाहावै' इति च पाठः । २. 'समानमनःशया' इति च पाठः ।
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४६
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४६ समानसत्त्वा या वश्या या यस्य प्रीयते प्रियैः ॥ ११ ॥ या पाशभूता सर्वेषामिन्द्रियाणां परैर्गुणैः । यया वियुक्तो निस्त्रीकमरतिर्मन्यते जगत् ॥ १२ ॥ यस्या ऋते शरीरं ना धत्ते शून्यमिवेन्द्रियैः । शोकोद्वेगारतिभयैर्य्यां दृष्ट्वा नाभिभूयते ॥ १३ ॥ याति यां प्राप्य विस्रम्भं दृष्ट्वा हृष्यत्यतीव याम् । अपूर्वामिव यां याति नित्यं हर्षातिवेगतः ॥ १४ ॥ गत्वा गत्वाऽपि बहुशो या तृप्तिं नैव गच्छति । सा स्त्री वृष्यतमा तस्य नानाभावा हि मानवाः ॥ १५ ॥ जो स्त्री आयु, रूप, वाणी, हाव ( शृंगार आदि चेष्टा ) आदि के द्वारा या दैवयोग से अथवा अन्य कर्मों से मनुष्य के हृदय में उतर जाती है, जो हृदय में आनन्द का सञ्चार करती है, जिसकी कामचेष्टा मनुष्य के समान होती है, जिसका सत्त्व ( चित्त ) पुरुष के समान है, जो पुरुष के वश में रहती है, जो स्त्री पुरुष की प्रिय वस्तुओं से प्रसन्न होती है। जो स्त्री अपने उत्कृष्ट गुणों के कारण पुरुष की समस्त इन्द्रियों के लिये जाल रूप है ( जिसमे पुरुष फसा रहता है ), जिससे छूटकर रति रहित, बेचैन होकर पुरुष समस्त संसारको स्त्री से शून्य मानता है, जिस स्त्री के बिना पुरुष अपने शरीर को इन्द्रियों से रहित मानता है जिसको देखकर शोक, उद्वेग, बेचैनी, भय आदि सब भूल जाता है, जिसको देखते ही शान्ति अनुभव करता है, जिसके दर्शन से अत्यन्त खुशी अनुभव करने लगता है, जिस स्त्री के साथ नित्य प्रति अत्यन्त हर्ष (कामोद्वेग) के कारण नूतन स्त्री के रूप में सम्भोग करता और बार बार मैथुन करने पर भी तृप्त नहीं होता वह स्त्री उस पुरुष के लिये सबसे उत्तम वृष्य ( वाजी- करण रसायन ) है ॥ १०-१५ ॥ अतुल्यगोत्रां वृष्यां च प्रहृष्टां निरुपद्रवाम् । शुद्धस्नातां व्रजेन्नारोमपत्यार्थी निरामयः ॥ १६ ॥ सन्तान की चाह रखनेवाला पुरुष स्वय रोगरहित होकर अपने से भिन्न गोत्रवाली, वृष्यतम, हर्षयुक्त [ प्रसन्न मन ], रोग आदि उपद्रवों से रहित, रजोधर्म के पीछे स्नान कर शुद्ध हुई स्त्री के साथ सहवास करे ॥ १६ ॥ अच्छायश्चैकशाखश्च निष्फलश्च यथा द्रुमः । अनिष्टागन्धश्चैकश्च निरपत्यस्तथा नरः ॥ १७ ॥ चित्रदीपः सरः शुष्कमधातुर्धातुसन्निभः ।
२५० चरकसंहिता [ अ० २ निष्प्रजस्तृणपूलीति ज्ञातव्या पुरुषाकृतिः ॥ १८ ॥ अप्रतिष्ठश्च नग्नश्च शून्यश्चैकेन्द्रियश्च ना। मन्तव्यो निष्क्रियश्चैव यस्यापत्यं न विद्यते ॥ १६ ॥ अपत्यरहित पुरुष—जिस प्रकार अकेला वृक्ष छायारहित, एक शाखावाला, फलरहित तथा अनिष्ट गन्धवाला होता है, उसी प्रकार से पुत्ररहित मनुष्य भी अकेला है। जिस प्रकार चित्र मे बना दीपक हो जैसा सूखा हुआ तालाब हो, जैसे बिना धातु के, धातु के समान चमकने वाला पदार्थ हो, जैसे चाँदी के समान चमकने वाला सीप हो, इसी प्रकार पुत्ररहित मनुष्य है। उसे तिनकों वा घास की पूली से बना पुरुष के आकार का पुतला ही समझना चाहिये । जिस पुरुष के सन्तान नहीं होती उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं होती । वह नंगा, अकेला (निःसहाय), शून्य, एक ही इन्द्रियवाला और निष्क्रिय होता है ॥ १७-१६॥ बहुमूर्तिर्बहुमुखो बहुव्यूहो बहुक्रियः । बहुचक्षुर्बहुज्ञानो बह्वात्मा च बहुप्रज ॥ २० ॥ मङ्गल्योऽय प्रशस्तोऽयं धन्योऽय वीर्यवानयम् । बहुशाखोऽयमिति च स्तूयते ना बहुप्रजः ॥ २१ ॥ बहुत सन्तानवाला पुरुष—जिस पुरुष के बहुत सन्तान होती है, वह बहुत सी मूर्तियोंवाला, बहुत से मुखोंवाला, बहुत से व्यूह (सघात) वाला, बहुत सी क्रियाओंवाला, बहुत सी आँखोंवाला, बहुत ज्ञानवाला, बहुत से आत्माओंवाला होता है ! बहुत सन्तानवाले पुरुष की लोग स्तुति करते हैं कि वह मंगलमय है, धन्य है, वीर्यवान् है, बहुत शाखाओंवाला है ॥ २०-२१ ॥ प्रीतिर्बल सुख वृत्तिर्विस्तारो विपुल कुलम् । यशो लोकाः सुखोदर्कास्तुष्टिश्चापत्यसश्रिता ॥ २२ ॥ तस्मादपत्यमन्विच्छन् गुणांश्चापत्यसश्रितान् । वाजीकरणनित्यः स्यादिच्छन् कामसुखानि च ॥ २३ ॥ प्रीति, बल, सुख, वृत्ति, विस्तार, कुल का विस्तार, यश, सुख देनेवाले लोक, सन्तोष ये सब गुण सुतों पर आश्रित हैं। इसलिये सन्तान की चाह रखने वाला तथा सन्तान पर आश्रित गुणों की कामना करनेवाला पुरुष सदा बाजी- करण का सेवन करे और काम्य सुखों की भी इच्छा करे ॥ २२-२३ ॥ उपभोगसुखान् सिद्धान् वीर्योपत्यविवधनान् । वाजीकरणसंयोगान् प्रवक्ष्याम्यत उत्तरम् ॥ २४ ॥ इसके आगे उपभोग में सुख देने वाले, वीर्य और अपत्य को बढ़ाने वाले, सिद्ध, वाजीकरण प्रयोगों का उपदेश करूंगा ॥ २४ ॥
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २५१
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २५१
शरमूलेक्षुमूलानि काण्डेक्षुः सेक्षुवालिका ।
शतावरी पयस्या च विदारी कण्टकारिका ॥ २५ ॥
जीवन्ती जीवको मेदा वीरो चर्षभको बला ।
ऋद्धिर्गोक्षुरकं रास्ना सात्मगुप्ता पुनर्नवा ॥ २६ ॥
एषां त्रिपलिकान् भागान् माषाणामाढकं नवम् ।
विपाचयेज्जलद्रोणे चतुर्थागं च शेषयेत् ॥ २७ ॥
तत्र पेष्याणि मधुकं द्राक्षा फल्गूनि पिप्पली ।
आत्मगुप्ता मधूकानि खर्जूराणि शतावरी ॥ २८ ॥
विदार्याम्रलकक्षूणां रसस्य च पृथक् पृथक् ।
सर्पिषश्चाढकं दद्यात्क्षीरद्रोण च तद्विषक् ॥ २९ ॥
साधयेद् घृतशेष च सुपूतं योजयेत्पुनः ।
शर्करायास्तुगाक्षीर्योश्चूर्णैः प्रस्थोन्मितैः पृथक् ॥ ३० ॥
पलैश्चतुर्भिर्मागध्याः पलेन मरिचस्य च ।
त्वगेलाकेशराणां च चूर्णैरर्धपलोन्मितैः ॥ ३१ ॥
मधुनः कुडवाभ्या च द्वाभ्यां तत्कारयेद्भिषक् ।
पलिका गुलिकास्त्यानास्ता यथाग्नि प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
एष वृष्य. परो योगो बृहणो बलवर्धनः ।
अनेनाश्व इवोदीर्णो लिङ्गमर्पयते स्त्रियाम् ॥ ३३ ॥
इति बृहणीगुडिका ।
बृंहणी गुटिका—शरमूल ( सरकण्डे की जड़ ), गन्ने की जड़, काण्डेक्षु
( ईख का भेद ) की जड़, इक्षुबालिका नाम ईख¹ की जड़, शतावरी,
क्षीरविदारी, विदारी, कटेरी, जीवन्ती, जीवक, मेदा, वीरा ( काकोली या
शालपर्णी ), ऋषभक, बलामूल, ऋद्धि, गोखरू, रास्ना कौंच और पुनर्नवा
प्रत्येक ३ पल, नये उड़द १ आढक, इन को एक द्रोण जल मे ( परिभाषानुसार
दुगने जल में ५१ सेर १६ तोला ) क्वाथ करके चतुर्थांश रहने पर छान लेवे ।
कल्कार्थ द्रव्य—मुलहठी, मुनक्का, गूलर, पिप्पली, कौंच, महुआ, खजूर,
शतावरी मिलित सब आधा आढक, विदारीकन्द का स्वरस, आँवले का स्वरस,
गन्ने का रस और घी प्रत्येक दो दो आढक, दूध दो द्रोण, इनका घृत पाक
विधि से घृत सिद्ध करले । सिद्ध घी को छान कर इसमें शर्करा का चूर्ण १
प्रस्थ, वंशलोचन १ प्रस्थ, पिप्पली ४ पल, मरिच १ पल, दालचीनी, इलायची,
१ इस ईख में फूल आता है, जो कि कास के फूल की भाँति होता है ।
२५२ चरकसंहिता [ अ० २ नागकेशर मिश्रित आधा पल, शहद दो कुडव मिलावे । इससे एक एक पल की गुटिका बना कर अग्नि के बलानुसार खावे। यह प्रयोग अत्यन्त वीर्यवर्धक, पुष्टि- वर्धक, बलवर्धक है । इसके प्रयोग से अत्यन्त मैथुन शक्ति बढ़ जाती है। कोई २ [ आचार्य शहद १६ पल डालते हैं। एक कुडव = चार पल ] ॥ २५-३३ ॥ माषाणामात्मगुप्ताया बीजानामाढकं नवम् । जीवकर्षभकौ वीरां मेदामृद्धिंशतावरीम् ॥ ३४ ॥ मधुकं चाश्वगन्धां च साधयेत्कुडवोन्मिताम् । रसे तस्मिन् घृतप्रस्थं गव्यं दशगुण पयः ॥ ३५ ॥ विदारीणा रसप्रस्थ प्रस्थमिक्षुरसस्य च । दत्त्वा मृद्वग्निना साध्यं सिद्धं सर्पिर्निधापयेत् ॥ ३६ ॥ शर्करायास्तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्य च पृथक् पृथक् । भागांश्चतुष्पलांस्तत्र पिप्पल्याश्चावपेत्पलम् ॥ ३७ ॥ पलं पूर्वमतो लीढवा ततोऽन्नमुपयोजयेत् । य इच्छेदक्षय शुक्रं शेफसश्चोत्तम बलम् ॥ ३८ ॥ इति वाजीकरणं घृतम् । वाजीकरण घृत—नवीन उड़द १ आढक, कौंच के बीज १ आढक, जीवक, ऋषभक, वीरा (काकोली या शतावरी), मेदा, ऋद्धि, शतावरी, मुलहठी, अश्वगन्धा प्रत्येक एक कुडव इनको आठ गुणे जल में क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । गाय का घी एक प्रस्थ, दूध घी से दशगुना (दश प्रस्थ), विदारी का स्वरस १ प्रस्थ, गन्ने का रस १ प्रस्थ, मिला कर मृदु अग्नि पर घृत सिद्ध करना चाहिये । घी सिद्ध हो जाने पर खाड़, वंशलोचन और शहद प्रत्येक चार चार पल और पिप्पली एक पल मिलाना चाहिये । इस औषध को एक पल खाकर पीछे से अन्न का भोजन करना चाहिये । इससे शुक्र का अक्षय भण्डार तथा जननेन्द्रिय में उत्तम बल आता है ॥ ३४-३८ ॥ शर्करा माषविदलास्तुगाक्षीरी पयो घृतम् । गोधूमचूर्णषष्ठानि सर्पिष्युत्कारिकां पचेत् ॥ ३६ ॥ तां नातिपक्कां मृदितां कौक्कुटे मधुरे रसे । सुगन्धे प्रक्षिपेदुष्णे यथा सान्द्रीभवेद्रसः ॥ ४० ॥ एष पिण्डरसो वृष्यः पौष्टिको बलवर्धनः । अनेनाश्व इवोदीर्णो बली लिंगं समर्पयेत् ॥ ४१ ॥
पा० १ । चिकित्सितस्थानम् २५३ शिखितित्तिरिहंसानामेवं पिण्डरसो मतः । इति बीजीकरणपिण्डरसाः । वाजीकरण पिण्डरस—खाड, उड़द की दाल, वंशलोचन, दूध, घी ओर गेहू का आटा इनको उचित परिणाम में लेकर उत्कारिका बना कर घी में तल लेवे । इसको बहुत न पकाये । पीछे हाथों में मल कर मुर्गे के गरम मासरस में डाल देवे । इसमें शर्करा, इलायची, केशर आदि सुगन्ध भी डाल देवे, इससे रस गाढ़ा हो जायेगा । यह पिण्डरस शुक्रवधक, पौष्टिक और बलवर्धक है । इसके प्रयोग से पुरुष में घोड़े के समान मैथुन शक्ति आती है । इसी प्रकार से मोर, तीतर और हंसों के मास रस से भी पिण्ड रस बनते हैं । इनके गुण भी इसी प्रकार से हैं ॥ ३६-४१ ॥ घृतं माषान् सबस्ताण्डान् साधयेन्माहिषे रसे । भर्जयेत्त रस पूतं फलाम्लं नवसर्पिषि । ४२ ॥ ईषत्सलवण युक्त धान्यजीरकनागरैः । एष वृष्यश्च बल्यश्च बृंहणश्च रसोत्तमः ॥ ४३ ॥ इति वृष्यमाहिषरसः । घी, माष ( उड़द ) और बस्ताण्ड ( बकरे के अण्डकोषों ) को भैंस के मांस रस मे सिद्ध करना चाहिये । इस रस को छान कर नये घी में भूनना चाहिये । इसको अनार, आंवला आदि फलों के रस से खट्टा करना चाहिये । इसमें थोड़ा सा नमक, धनिया, जीरा और सोंठ भी मिला देनी चाहिये । यह रस वृष्यकारक, बलवर्धक और बृंहण है ॥ ४२-४३ ॥ चटकांस्तित्तिरिरसे तित्तिरीन् कौक्कुटे रसे । कुक्कुटान् बार्हिणरसे हांसे बार्हिणमेव च । ४४ ॥ नवसर्पिषि संतप्तान् फलाम्लान् कारयेद्रसान् । मधुरान्वा यथासात्म्यं गन्धाढ्यान् बलवर्धनान् ॥ ४५ ॥ इति वृष्यरसाः । वृष्य रस--चिड़ियों को तित्तिर के रस में, तीतरों को मुर्गे के रस में, मुर्गों को मोर के रस में, मोरों को हंसों के मास रस में सिद्ध करना चाहिये । इन चारों रसों को ताजे घी में भून कर अनार के रस से खट्टा करके अथवा मधुर रूप में सेवन करना चाहिये । सेवन करने के पूर्व इलायची, केशर आदि से सुगन्धित कर लेना आवश्यक है । यह रस बलवर्धक है ॥ ४४-४५ ॥ चटकमांसानां गत्वा योऽनुपिबेत्पयः ।
२५४ चरकसंहिता [ अ० २ न तस्य लिङ्गशैथिल्यं स्यान्न शुक्रक्षयो निशि ॥ ४६ ॥ इति वृष्यमांसम् । (१) जो पुरुष चटक के मास को भर पेट खाकर ऊपर से दूध पी लेता है, उसका बल (लिंग) शिथिल नहीं होता और रात भर वीर्य का क्षय नहीं होता, यह वीर्यस्तम्भक है ॥ ४६ ॥ माषयूषेण यो भुक्त्वा घृताढ्य षष्टिकौदनम् । पयः पिबति रात्रि स कृत्स्नां जागर्ति वेगवान् ॥ ४७ ॥ इति वृष्यमाषयोगः । (२) खूब घी वाले साठी के चावलों को उड़द के यूष के साथ खाकर जो ऊपर से दूध पी लेता है, वह काम-वेग से आतुर होकर सारी रात जागता रहता है ॥ ४७ ॥ न रात्रिषु स्वपिति ना निस्तब्धेन च शेफसा । तृप्तः कुक्कुटमांसाना भृष्टानां नक्ररेतसि ॥ ४८ ॥ इति वृष्यं भृष्टमासम् । (३) मुर्गे के मास को नक्र के रेत में भून कर खाने से पुरुष स्तब्धलिंग होकर सारी रात नहीं सोता । उसके सारी गत ध्वज-हर्ष करता है ॥ ४८ ॥ निःस्राव्य मत्स्याण्डरस भृष्टं सर्पिषि भक्षयेत् । हंसबर्हिणदक्षाणा चैवमण्डानि भक्षयेत् ॥ ४९ ॥ इति वृष्या अण्डरसाः । (४) मछली के अण्डों के रस को निकाल कर इसको घी में भून कर खावे । इसी प्रकार से हंस, मोर और मुर्गी के अण्डे का भी रस भून कर खावे ॥ ४९ ॥ भवतश्चात्र—स्रोतःसु शुद्धेष्वमले शरीरे वृष्य यदा ना मितमत्ति काले । वृषायते तेन परं मनुष्यस्तद् बृंहणं चैव बलप्रदं च ॥ ५० ॥ तस्मात्पुरा शोधनमेव कार्यं बलानुरूपं न हि वृष्ययोगाः । सिध्यन्ति देहे मलिने प्रयुक्ताः क्लिष्टे यथा वाससि रागयोगाः ॥५१॥ शुक्रवह आदि स्रोतों के शुद्ध होने पर, शरीर के निर्मल (धुला) होने पर, उचित समय पर उचित मात्रा में जो वृष्य वस्तुओं का सेवन करता है उसका वीर्य और पुंस्त्वशक्ति बढ़ जाती है । उसको यह बृंहण और बलवर्धक होता है । इसलिये वृष्य प्रयोग सेवन करने से पूर्व बलानुसार शरीर का वमन, विरेचन आदि से शोधन कर लेना चाहिये । जिस प्रकार मलिन वस्त्र पर रंग
नहीं चढ़ता उसी प्रकार मलिन शरीर में प्रयोग किये वृष्य योग अपना फल नहीं देते ॥५०-५१॥ तत्र श्लोकौ—वाजीकरणसामर्थ्यं क्षेत्रं स्त्री यस्य चैव या । ये दोषा निरपत्यानां गुणाः पुत्रवतां च ये ॥ ५२ ॥ दश पञ्च च संयोगा वीर्यापत्यविवर्धनाः । उक्तास्ते शरमूलीये पादे पुष्टिबलप्रदाः ॥५३॥ इति । वाजीकरण का सामर्थ्य, क्षेत्ररूप स्त्री, और किस पुरुष के लिये कैसी स्त्री उचित है, और अपत्यरहित पुरुषों के दोष, पुत्रवान् पिताओं के गुण, वीर्य और सन्तानवर्धक १५ प्रयोग इस शरमूलीय पादमें कह दिये हैं ॥५२-५३॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने सप्रयोग- शरमूलीयो नाम वाजीकरणपादः प्रथमः । (द्वितीयः पादः ) अथात आसिक्तक्षीरीयं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'आसिक्तक्षीरीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥ आसिक्तक्षीरमापूर्णमशुष्कं शुद्धषष्टिकम् । उदूखले समापोथ्य पीडयेत्क्षीरमर्द्दितम् ॥ ३ ॥ क्षुण्णं विमृदितं क्षीरे पीडयेत्सुसमाहितः । गृहीत्वा तं रसं पूतं गव्येन पयसा सह ॥ ४ ॥ बीजानामात्मगुप्ताया धान्यमाषरसेन च । बलाया शूर्पपर्ण्योश्च जीवन्त्या जीवकस्य च ॥ ५ ॥ ऋद्धयर्षभककाकोलीश्वदंष्ट्रामधुकस्य च । शतावर्या विदार्याश्च द्राक्षाखर्जूरयोरपि ॥ ६ ॥ संयुक्त मात्रया वैद्यः साधयेत्तत्र चावपेत् । तुगाक्षीर्याः समाषाणा शालीनां षष्टिकस्य च ॥ ७ ॥ गोधूमानां च चूर्णानि यैः स सान्द्रीभवेद्रसः । सान्द्रीभूतं च तं कुर्यात्प्रभूतमधुशर्करम् ॥ ८ ॥ गुडिका बदरैस्तुल्यास्ताश्च सर्पिषि भर्जयेत् । ता यथाग्नि प्रयुञ्जानः क्षीरमांसरसाशनः ।
२५६ चरकसंहिता [ अ० २ पश्यत्यपत्यं विपुलं वृद्धोऽप्यात्मजमक्षयम् ॥ ६ ॥ इत्यपत्यकरा षष्टिकादिगुडिका । षष्टिकादिगुटिका—शुद्ध साठी के कच्चे चावलों को दूध के अन्दर भिगोवे। जब ये फूल जायें और गीले हों तब इनको ऊखल में कूटे । जब दरकच हो जायें तब निचोड़ कर रस निकाल ले । बचे भाग को दूध के साथ फिर कूटे और फिर रस निकाल लेवे । इस प्रकार से सारा रस निकाल कर इसके रस के बराबर गाय का दूध तथा कौंच के बीजों का क्वाथ मिलाकर मन्द मन्द आच पर पकावे । अनन्तर जब यह क्वाथ शुष्क हो जाये तब उड़द के क्वाथ के साथ , पकावे । इसके खुश्क होने पर बला क्वाथ, मुद्गपर्णी और माषपर्णी क्वाथ, जीवन्ती क्वाथ, जीवक क्वाथ, ऋद्धि क्वाथ, काकोली क्वाथ, गान्धुर क्वाथ, मुल- हठी क्वाथ, शतावरी रस, विदारी रस, द्राक्षा रस, खजूर रस से पाक करे। अन्तिम पाक के समय वंशलोचन, उड़द का आटा, शालि चावलों का आटा और गेहूँ का आटा मिलावे जिससे वह कठोर हो जाये। इसमें मधु और शर्करा पर्याप्त मिलाकर मीठा कर लेवे। इसकी बेर के बराबर गोलिया बनाकर घी में तल लेवे । इनको अग्नि बल के समान खाकर पीछे से दूध और मास रस का भोजन करे । इससे वृद्ध भी पुरुष सन्तान और अक्षय वीर्य को पाता है ॥३-६॥ चटकानां सहंसाना दक्षाणां शिखिनां तथा । शिशुमारस्य नक्रस्य भिषक् शुक्राणि संहरेत् ॥ १० ॥ गव्यं सर्पिर्वराहस्य कुलिङ्गस्य वसामपि । षष्टिकाना च चूर्णानि चूर्णं गोधूमकस्य च ॥ ११ ॥ एभिः पूपलिकाः कार्याः शष्कुल्यो वर्तिकास्तथा । पूपा धानाश्च विविधा भक्ष्याश्चान्ये पृथग्विधाः१ ॥ १२ ॥ एषा प्रयोगाद्वृक्ष्याणां स्तब्धेनापूर्णरेतसा । शेफसा वाजिवायाति यावदिच्छेदृतु स्त्रियो नरः ॥ १३ ॥ इति वृष्यभक्ष्याः । वृष्यभक्ष्य—वैद्य को चाहिये कि चिड़िया, हंस, मुर्गे, मोर, शिशुमार, नक्र इनके वीर्य को, गाय का घी, सुअर और कुलिंग की वसा (चर्बी) को, साठी के चावलों का आटा, गेहूँ का आटा एकत्रित करके यथाविधि पूपलिकायें, १ श्री गगाधर कविराज ने ‘धान्य’ शब्द से धनिया लिया है, परन्तु लोक में प्रसिद्ध है कि धनिया शुक्र शक्ति को घटा कर नपुंसक बना देता है । इस- लिये वह नहीं लिया जाता।
पा० २ ] १७ चिकित्सितस्थानम् २५७
पा० २ ] १७ चिकित्सितस्थानम् २५७ शष्कुली, वर्तिका, पूप ( पूप ), धाना तथा अन्य नाना प्रकार क भक्ष्य बनाने चाहियें १ । इनके प्रयोग से, वीर्य से पूर्ण होकर अत्यन्त ध्वज हर्ष के साथ घोड़े के समान यथेच्छ स्त्रियों से मैथुन कर सकता है ॥१०-१३॥ आत्मगुप्ताफलं माषान् खर्जूराणि शतावरीम् । शृङ्गाटकानि मृद्वीकां साधयेत्प्रसृतोन्मिताम् ॥ १४ ॥ क्षीरप्रस्थ जलप्रस्थमेतत्प्रस्थावशेषितम् । शुद्धेन वाससा पूतं योजयेत्प्रसृतैस्त्रिभिः ॥ १५ ॥ शर्करायास्तुगाक्षीर्याः सर्पिषाऽभिनवस्य च । तत्पाययेत सक्षौद्रं षष्टिकात्रं च भोजयेत् ॥ १६ ॥ जरापरीतोऽप्यबलो योगेनानेन विन्दति । नरोऽपत्यं सुविपुलं युवेव च स हृष्यति ॥ १७ ॥ इत्यपत्यकरः स्वरसः । अपत्यकर स्वरस—कौंच के बीज, उड़द, खजूर, शतावर, सिंघाड़े, मुनक्का, इनमें से प्रत्येक एक २ प्रसृत ( २ पल ), दूध २ प्रस्थ, जल २ प्रस्थ, इनको धीरे धीरे पका कर दूध मात्र शेष रहने देना चाहिये। जल उड़ जाने पर इनको वस्त्र में छान लेवे । इसमें खांड, वंशलोचन और ताजा घी मिलित तीन प्रसृत ( ६ पल ) मिला देव । पीछे से मधु मिलाकर इसको पिलावे । पीछे साठी का चावल खिलावे । इस प्रयोग से बुढ़ापे से पीड़ित निर्बल व्यक्ति भी अनेक सन्तानों को प्राप्त करता है और युवाओं के समान ध्वज-हर्ष प्राप्त करता है ॥ १४-१७ ॥ खर्जूरीमस्तकं माषान् पयस्यां सशतावरीम् । खर्जूराणि मधूकानि मृद्वीकामजडाफलम् ॥ १८ ॥ पलान्मितानि मतिमान् साधयेत्सलिळाढके। तेन पादावशेषेण क्षीरप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १६ ॥ क्षीरशेषेण तेनाद्याद् घृताढ्यं षष्टिकौदनम् । सशर्करेण संयोग एष वृष्यः पर स्मृतः ॥ २० ॥ इति वृष्यक्षीरम् । वृष्यक्षीर योग—खजूर वृक्ष का मस्तक, उड़द, पयस्या ( क्षीर विदारी ), शतावर, खजूर, महुवा, मुनक्का और कौंच के बीज इनमें प्रत्येक एक एक पल १ शुक्र के अभाव में अण्डों का प्रयोग करना चाहिये । अण्डे न मिलें तो मास का प्रयोग हो सकता है ।
२५८ चरकसंहिता [ अ० २ लेकर दो आढक जल में पकावे । जब चतुर्थांश शेष रह जाय तब छानकर इसके द्वारा एक प्रस्थ दूध का पाक करे । जब सब रस उड़ जाये केवल मात्र दूध शेष रह जाये, तब इस दूध के साथ घी मिश्रित साठी के भात, शक्कर मिल- कर खावे यह योग अति वृष्य है ॥ १८-२० ॥ जीवकर्षभकौ मेदा जीवन्ती श्रावणीद्वयम् । खर्जूरं मधुकं द्राक्षा पिप्पली विश्वभेषजम् ॥ २१ ॥ शृङ्गाटकं विदारी च नवं सर्पिः पयो जलम् । सिद्धं घृतावशेषं तच्छर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ २२ ॥ षष्टिकान्नेन संयुक्तमुपयोज्यं यथाबलम् । वृष्यं बल्यं च वर्ण्यं च कण्ठ्यं बृहणमुत्तमम् ॥ २३ ॥ इति वृष्यघृतम् । वृष्यघृत—जीवक, ऋषभक, मेदा, जीवन्ती, श्रावणी और महाश्रावणी, खर्जूर, मुलहठी, द्राक्षा, पिप्पली, सोंठ सिंघाड़ा, विदारीकन्द मिलित ८ पल, ताजा घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, जल ६ प्रस्थ । यथाविधि घृतपाक करके छान लेना चाहिये । इसमें शर्करा और शहद ४-४ पल मिलाना चाहिये । इसका सांठी के चावलों के साथ मिलाकर बलानुसार खाना चाहिये । यह प्रयोग वृष्य, बलवर्धक, वर्ण्य कण्ठ के लिये हितकारी बृहण ( पुष्टिदायक ) है ॥ २१-२३ ॥ दध्नः शरं शरच्चन्द्रसंनिभं दोषवर्जितम् । शर्कराक्षौद्रमरिचैस्त्वगाक्षीर्या च बुद्धिमान् ॥ २४ ॥ युक्त्या युक्तं ससूक्ष्मैलं नवे कुम्भे शुचौ पटे । मार्जितं प्रक्षिपेच्छीते घृताढ्ये षष्टिकौदने ॥ २५ ॥ पिबेन्मात्रां रसालायास्त भुक्त्वा षष्टिकौदनम् । वर्णस्वरबलोपेतः पुमांस्तेन वृषायते ॥ २६ ॥ इति वृष्यो दधिशरप्रयोगः । दधिशर प्रयोग—शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल और दोषरहित दही की मलाई में खाण्ड मधु, मरिच वंशलोचन और छोटी इलायची डाल कर बुद्धिमान् वैद्य इनको मिट्टी के पात्र में मिला लेवे । फिर इनको शुद्ध बारीक वस्त्र पर डालकर धीरे २ मथ लेवे । इस प्रकार से छनी दही को घी-बहुल ठण्डे हुए साठी भात के साथ खाये । पीछे से मात्रा में रसाला पीनी चाहिये । इससे मनुष्य का वर्ण, स्वर और बल बढाता है तथा शुक्रकी वृद्धि होती है ॥२४-२६॥ चन्द्रांशुकल्पं पयसा घृताढ्यं षष्टिकौदनम् ।
पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २५६
पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २५६ शर्करामधुसंयुक्तं प्रयुञ्जानो वृषायते ॥ २७ ॥ इति वृष्यषष्टिकौदनप्रयोगः । षष्टिकौदन प्रयोग—चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल साठी के चावलों को प्रचुर घी, दूध, शर्करा और मधु के साथ मिलाकर खाने से अत्यधिक वृषता प्राप्त होती ॥ २७ ॥ तप्ते सर्पिषि नक्राण्डं ताम्रचूडाण्डमिश्रितम् । युक्तं षष्टिकचूर्णेन सर्पिषाऽभिनवेन च ॥ २८ ॥ पक्त्वा पूपलिकाः खाद्देद्वारुणीमण्डपो नरः । य इच्छेद्दश्ववद्रन्तुं प्रसेक्तुं गजवच्च यः ॥ २९ ॥ इति वृष्यपूपलिकाः । वृष्य-पूपलिका—नक्र का अण्डा, मुर्गी का अण्डा, साठी के चावलों का आटा, ताजा घी इनको मिला कर पूपलिकायें बनानी चाहिये । इनको खाकर ऊपर से वारुणी का मण्ड ( ऊपर का स्वच्छ भाग ) पीना चाहिये । इससे अश्व के समान रमण करने की शक्ति और हाथी के समान शुक्र क्षरण का सामर्थ्य होता है ॥ २९ ॥ भवन्ति चात्र—आसिक्तक्षीरिके पादे ये योगाः परिकीर्तिताः । अष्टावपत्यकामैस्ते प्रयोक्तव्याः पौरुषार्थिभिः ॥ ३० ॥ एतैः प्रयोगैर्विविधैर्वृषः पुमान् स्नेहोपपन्नो बलवर्णयुक्तः । हर्षान्वितो वाजिवदष्टवर्षो भवेत्समर्थश्च वराङ्गनासु ॥ ३१ ॥ यद्यच्च किञ्चिन्मनसः प्रियं स्याद्रम्या वनान्ताः पुलिनानि शैलाः । इष्टाः स्त्रियो भूषणगन्धमाल्य प्रिया वयस्याश्च तदत्र योग्यम् ॥३२॥ इस आसिक्त-क्षीरीय नामक पाद में आठ योग कहते हैं । ये सन्तान के इच्छुक तथा पौरुष की कामना करने वालों को सेवन करना चाहिये । इन योगों के प्रयोग करने से मनुष्य सुन्दर शरीर, स्निग्ध वदन, बल, वर्ण से युक्त, अश्व के समान हर्षयुक्त तथा स्त्रियों में अतिसमर्थ होता है । इन प्रयोगों के साथ साथ जो भी मन को प्रिय लगे, रम्य वन, नदियों के सुन्दर किनारे, सुन्दर पर्वत, सुन्दर स्त्रियों, आभूषणों की झकार, मनमोहक सुगन्ध इत्रों की महक, भीनी महक वाली मालाये, प्रिय मित्र ये सब वस्तुए वाजीकरण में सहायक होती हैं ॥३०-३२॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आसिक्तक्षीरीयो नाम वाजीकरणपादो द्वितीयः ।
२६० चरकसंहिता [ अ० २ ( तृतीयः पादः ) अथातो माषपर्णभृतीय वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'माषपर्णभृतीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ माषपर्णभृतां धेनुं गृष्टिं पुष्टां चतुःस्तनीम् । समानवर्णवत्सां च जीवद्वत्सां च बुद्धिमान् ॥ ३ ॥ रोहिणीमथवा कृष्णामूर्ध्वशृङ्गीमदारुणाम् । इक्ष्वादामर्जुनादां वा सान्द्रक्षीरा च धारयेत् ॥ ४ ॥ केवलं तु पयस्तस्याः शृतं वाऽशृतमेव वा । शर्कराक्षौद्रसर्पिर्भिर्युक्तं तद् वृष्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥ जो गाय उड़द के पत्तों पर पाली गई हो, प्रथम बार ही ब्याई हो, चार चार स्तनों वाली हो, जिसका कि बछड़ा जीता हो, बछड़े का रंग माता के समान हो, लाल या काले रग क हो, उन्नत ( खड़े ) सींग वाली हो, भयंकर या मारने वाला न हो, गन्ने के पत्ते या अर्जुन के पत्ते खाती हो, दूध गाढ़ा हो, बुद्धिमान् व्यक्ति को ऐसी गाय रखनी चाहिये । इस गाय का दूध ही अकेला चाहे धारोष्ण अवस्था में कच्चा ही अथवा गरम करके शर्करा, मधु तथा घी के साथ लेने से उत्तम वाजीकरण होता है। [ ये तीन योग हैं--उबला हुआ दूध, कच्चा दूध और घी आदि से मिला । गाय का भोजन भी तीन प्रकार का है । उड़द के पत्ते, गन्ने के पत्ते और अर्जुन के पत्त ] ॥३-५॥ शुक्रलैर्जीवनीयैश्च बृहणैर्बलवर्धनैः । क्षीरसर्जननैश्चैव पयः सिद्ध पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥ युक्तं गोधूमचूर्णेन सघृतक्षौद्रशर्करम् । पर्यायेण प्रयोक्तव्यमिच्छता शुक्रमक्षयम् ॥ ७ ॥ इति वृष्यक्षीरप्रयोगः। वृष्य क्षीर प्रयोग—सूत्रस्थान के चतुर्थ अध्याय में वर्णित शुक्रवर्धक, जीव- नीय, बृंहणीय, बल्य और स्तन्यवर्धक इन पाच गणों से पृथक् पृथक् दूध सिद्ध करे । जब दूध सिद्ध हो जाये तब इसमें गेहूँ का आटा मिला कर घी में भून ले । इसमें शर्करा भी मिला दे । ठण्डा होने पर शहद मिला कर पृथक् पृथक प्रयोग करे । प्रथम दिन शुक्रवर्धक गण से सिद्ध, दूसरे दिन जीवनीय गण से,
पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१ तीसरे दिन बृंहणीय गण से, चौथे दिन बल्य गण से और पांचवें दिन स्तन्य- वर्धक गण से दूध १ को सिद्ध करे । इससे शुक्र की वृद्धि होती है ॥ ६-७ ॥ मेदां पयस्यां जीवन्ती विदारीं कण्टकारिकाम् । श्वदंष्ट्रां क्षीरिकां माषान् गोधूमान् शालिषष्टिकान् ॥ ८ ॥ पयस्यधौदके पक्त्वा कार्षिकानाढकोन्मिते । विवर्जयेत्पय शेषं तत्पूतं क्षौद्रसर्पिषा ॥ ६ ॥ युक्तं सशर्करं पीत्वा वृद्धः साप्ततिकोऽपि वा । विपुलं लभतेऽपत्यं युवेव च स हृष्यति ॥ १० ॥ इत्यपत्यकरक्षीरयोगः । अपत्यकर क्षीर योग—मेदा, जीवन्ती, क्षीरविदारी, विदारी, कटेरी, गोखरू, उड़द, क्षीरिका (दूधी, खिरनी फल या प्लक्ष), गेहूँ, शालिधान्य, साठी के चावल प्रत्येक १ कर्ष, पानी मिला दूध दो आढक मिला कर क्वाथ करले । चतुर्थांश शेष रहने पर छान ले । मेदा आदि को फेंक दे । इस छने क्वाथ में खाण्ड, घी और ठण्डा होने पर मधु मिला कर पान करे । इसको पीस कर सत्तर साल का वृद्ध भी युवा के समान प्रबल शक्ति प्राप्ति करता है और बहुत सन्तान वाला होता है ॥ ८-१० ॥ मण्डलैर्जातरूपस्य तस्या एव पयः शृतम् । अपत्यजननं सिद्ध सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ ११ ॥ इत्यपत्यजननक्षीरयोगः । माषपर्ण-भृत वाले वृष्य-क्षीर प्रयोग में वर्णित गाय के दूध में सुवर्ण के वर्क गला कर पकावे । जब दूध गाढ़ा हो जाये तब इसमें घी, शक्कर तथा ठण्ढा होने पर शहद मिला कर पीवे । यह दूध सन्तानजनक है ॥ ११ ॥ त्रिंशत्सुपिष्टाः पिप्पल्यः प्रकुञ्चे तैलसर्पिषोः । भृष्ट्वा सशर्कराक्षौद्रा क्षीरधारावदोहिता ॥ १२ ॥ पीत्वा यथावल चोर्ध्वं षष्टिकं क्षीरसर्पिषा । भुक्त्वा न रात्रिमस्तब्ध लिङ्ग पश्यति ना क्षरत् ॥ १३ ॥ इति वृष्यक्षीरयोग । अपत्य-जनन क्षीरयोग—खूब बारीक पिसी तीस पिप्पलियो को एक पल तैल और घी में भून कर शर्करा और मधु में मिला कर दूध दोहने के पात्र मे डाल १ दूध पाक करन का नियम-द्रव्य से आठ गुणा दूध और दूध से चौगुना जल मिला कर पकावे । पकाते २ जब केवल दूध मात्र शेष रह जाय तब उता- रले, यह दूध पाक की रीति है ।
२६२ चरकसंहिता [ अ० २ दे । इसमें पीने योग्य दूध दोह कर पीवे । पीछे से साठी का भात दूध और घी के साथ खावे । इसके सेवन से रात्रि में पुरुष की इन्द्रिय शिथिल नहीं होती और वीर्य का क्षय भी नहीं होता ॥ १२-१३ ॥ श्वदंष्ट्राया विदार्याश्च रसे क्षीरचतुर्गुणे । घृताढ्यः साधितो वृष्यो माषषष्टिकपायसः ॥ १४ ॥ इति वृष्यपायसप्रयोगः । वृष्य-पायस योग—गाय के दूध से चार गुणा गोखरू और विदारीकन्द का रस पृथक् २ लेकर दूध पाक करे । इस दूध में घी में भुने हुए उड़द तथा साठी के चावलों को मिलाकर खीर पकावे । यह अतिशय वृष्य है ॥ १४ ॥ फलाना जीवनीयाना स्निग्धाना रुचिकारिणाम् । कुडवश्चूर्णिताना स्यात्स्वयंगुप्ताफलस्य च ॥ १५ ॥ कुडवश्चैव माषाणा द्वौ द्वौ च तिलमुद्गयोः । गोधूमशालिचूर्णाना कुडवः कुडवो भवेत् ॥ १६ ॥ सर्पिष. कुडवश्चैकस्तत्सर्वं क्षीरसंयुतम् । पक्त्वा पूपलिकाः खादेद्बह्वयः स्युर्यस्य योषितः ॥ १७ ॥ इति वृष्यपूपलिकाः । वृष्य पूपलिका—जीवनदायक, स्निग्ध एव रुचिकर फलों का चूर्ण १ कुडव, कौंच के बीज १ कुडव, माष १ कुडव, तिल २ कुडव, मूंग दो कुडव, गेहूँ का आटा १ कुडव, शालिधान्य का आटा १ कुडव, घी एक कुडव, इनको घी में गूंथकर, घी में भूनकर पूपलिकायें बना लेवे । जिसके घर में बहुत सी स्त्रिया हों वह इनका सेवन करे । [ फलों में द्राक्षा, खजूर, बादाम, नारियल, पिस्ता, आम, मीठा अनार लेने चाहिये ] ॥ १५-१७ ॥ घृतं शतावरीगर्भ क्षीर दशगुणे पचेत् । शर्करापिप्पलीक्षौद्रयुक्त तद्वृष्यमुत्तमम् ॥ १८ ॥ इति वृष्य शतावरीघृतम् । शतावरी घृत—शतावरो के कल्क ( ८ पल ) से दूध ( २० प्रस्थ ) में घी ( २ प्रस्थ ) सिद्ध करे । इसको शर्करा पिप्पली और मधु के साथ प्रयोग करे । यह अत्यन्त वृष्य है । [ अष्टाग संग्रह में शतावरी कल्क के साथ २ शतावरी रस का प्रयोग लिखा है ] ॥ १८ ॥ कर्षं मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमाक्षिकम् । प्रयुङ्क्ते यः पयश्चानु नित्यवेगः स ना भवेत् ॥ १९ ॥ इति वृष्यमधुकयोगः ।
पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६३
वृष्य मधुक योग—मुलहठी का चूर्ण १ कर्ष, घी और शहद पृथक् २ एक
कर्ष मिलाकर चाटे, पीछे से दूध पी ले । इस प्रयोग से पुरुष का नित्य वेग
रहता है ॥ १६ ॥
घृतक्षीराशनो निर्भीर्निर्व्याधिर्नित्यगो युवा ।
सङ्कल्पप्रवणो नित्यं नरः स्त्रीषु वृषायते ॥ २० ॥
जो व्यक्ति प्रतिदिन घी और दूध का पर्याप्त मात्रा में सेवन करता है, भय
और रोग रहित, नित्य प्रति व्यवाय करनेवाला, सदा रमण की इच्छा रखता
हुआ युवा पुरुष सदा मैथुन करने में समर्थ रहता है ॥ २० ॥
कृतैककृत्याः सिद्धार्था ये चान्योन्यानुवर्तिनः ।
कलासु कुशलास्तुल्याः सत्त्वेन वयसा च ये ॥ २१ ॥
कुलमाहात्म्यदाक्षिण्यशीलशौचसमन्विताः ।
ये कामनित्या ये हृष्टा ये विशोका गतव्यथाः ॥ २२ ॥
ये तुल्यशीला ये भक्ता ये प्रिया ये प्रियंवदाः ।
तैर्नरः सह विश्रब्ध सुवयस्यैर्वृषायते ॥ २३ ॥
एक ही काम करनेवाले, सिद्ध साध्य ( अथवा जिनके मतलब परस्पर
निकलते हैं ), जो एक दूसरे के पीछे चलते हैं एक दूसरे का कहा मानते हैं,
गीत, वादित्र आदि कलाओं मे कुशल, मन और आयु में समान, उत्तम कुल,
बड़प्पन, दाक्षिण्य ( चतुराई ), शील, पवित्रता से युक्त, सदा कामुक, प्रसन्न
चित्त, शोक और पीड़ा से रहित, समान स्वभाव के, परस्पर विश्वासी, प्रिय
( इच्छुक ), मधुर भाषी हों, ऐसे विश्वासपात्र मित्रों के साथ रहने से पुरुष
वीर्य सम्पन्न होता है ॥ २१-२३ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनस्नानगन्धमाल्यविभूषणैः ।
गृहशय्यासनसुखैर्वासोभिरहतः प्रियैः ॥ २४ ॥
विहङ्गानां रुतैरिष्टैः स्त्रीणा चाभरणस्वनैः ।
संवाहनवरस्त्रीणामिष्टाना च वृषायते ॥ २५ ॥
अभ्यंग ( मालिश ), उबटन, स्नान, गन्ध, माला, आभूषण, आराम-
वाला घर, कोमल शय्या, सुन्दर आसन, प्रिय नवीन वस्त्र, पक्षियों का कलरव
और वाञ्छित स्त्रियों से, आभूषणों की झकार से, सुन्दर स्त्रियों द्वारा संवाहन
अर्थात् मुठिया भर कर दबाने से पुरुष में वृषता आती है ॥ २४-२५ ॥
मत्तद्विरेफाचरिताः सपद्माः सलिलाशयाः ।
जात्युत्पलसुगन्धीनि शीतगर्भंगृहाणि च ॥ २६ ॥
२६४ चरकसंहिता [ अ० २ नद्यः फेनोत्तरीयाश्च गिरयो नीलसानवः। उन्नतिर्नीलमेघानां रम्यचन्द्रोदया निशाः ॥ २७ ॥ वायवः सुखसंस्पर्शाः कुमुदाकरगन्धिनः। रतिभोगक्षमा रात्र्यः संकोचागुरुवल्लभाः ॥ २८ ॥ सुखाः सहायाः परपुष्टघुष्टाः फुल्ला वनान्ता विशदान्नपानाः। गान्धर्वशब्दाश्च सुगन्धयोगाः सत्त्वं विशालं निरुपद्रवं च ॥ २९ ॥ सिद्धार्थता चाभिनयाश्च कामः स्त्री चायुधं सर्वमिहात्मजस्य। वयो नवं जातमदश्च कालो हर्षस्य योनिः परमा नराणाम् ॥ ३० ॥ मत्त भ्रमरों से गुञ्जित और कमलों से भरा तालाब, चमेली और कमल की महक से सुगन्धित शीतल गर्भगृह, तरंगों की टक्करों से उत्पन्न झाग से भरी नदिया, हरी-भरी चोटी वाले पर्वत, नीलवर्ण के मेघों का आकाश मे मडराना, सुन्दर चादनी रातें, कुमुदों की महक से तर, स्पर्श में सुखदायक वायु, रतिभोग के लायक रात्रियों ( बादलों का घिरा होना ), [ यहा पर सब ऋतुओं की दृष्टि से वर्णन किया है। ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर और वसन्त सबका ही वर्णन है । ] सकोच ( केशर ) और अगर का लेप लगाये कामिनिया, सुख- दायक, सहायक, खिले हुए और कोयल की कुहू से गुजित वन, विशद (निर्मल) अन्नपान, गाना-बजाना ( राग-रागिणिया ), भीनी-भीनी सुगन्ध, शोक चिन्ता से रहित उदार और उपद्रव रहित मन, कार्य की सफलता, नूतन उठा हुआ काम और स्त्रियाँ ये कामदेव के अस्त्र हैं । नई उठती हुई जवानी, मस्त करने वाला वसन्त का समय जिसमें मद उत्पन्न होता है, ये सब वस्तुएँ पुरुषों मे हर्ष को उत्पन्न करने वाली हैं । इन भावों से काम उद्दीप्त होता है ॥२६-३०॥ तत्र श्लोकः-प्रहर्षयोनयो योगा व्याख्याता दश पञ्च च। माषपर्णभृतीयेऽस्मिन् पादे शुक्रबलप्रदाः ॥ ३१ ॥ उपसंहार—इस माषपर्णीय वाजीकरण तृतीय पाद में प्रहर्ष के कारण तथा शुक्र और बल को बढ़ाने वाले पन्द्रह प्रयोग कहे हैं ॥३१॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने माषपर्णभृतीयो नाम वाजीकरणपादस्तृतीयः । ( चतुर्थः पादः ) अथातः पुमाञ्जातबलादिकं चतुर्थं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥१॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥