चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५८ चरकसंहिता [ अ० २ लेकर दो आढक जल में पकावे । जब चतुर्थांश शेष रह जाय तब छानकर इसके द्वारा एक प्रस्थ दूध का पाक करे । जब सब रस उड़ जाये केवल मात्र दूध शेष रह जाये, तब इस दूध के साथ घी मिश्रित साठी के भात, शक्कर मिल- कर खावे यह योग अति वृष्य है ॥ १८-२० ॥ जीवकर्षभकौ मेदा जीवन्ती श्रावणीद्वयम् । खर्जूरं मधुकं द्राक्षा पिप्पली विश्वभेषजम् ॥ २१ ॥ शृङ्गाटकं विदारी च नवं सर्पिः पयो जलम् । सिद्धं घृतावशेषं तच्छर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ २२ ॥ षष्टिकान्नेन संयुक्तमुपयोज्यं यथाबलम् । वृष्यं बल्यं च वर्ण्यं च कण्ठ्यं बृहणमुत्तमम् ॥ २३ ॥ इति वृष्यघृतम् । वृष्यघृत—जीवक, ऋषभक, मेदा, जीवन्ती, श्रावणी और महाश्रावणी, खर्जूर, मुलहठी, द्राक्षा, पिप्पली, सोंठ सिंघाड़ा, विदारीकन्द मिलित ८ पल, ताजा घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, जल ६ प्रस्थ । यथाविधि घृतपाक करके छान लेना चाहिये । इसमें शर्करा और शहद ४-४ पल मिलाना चाहिये । इसका सांठी के चावलों के साथ मिलाकर बलानुसार खाना चाहिये । यह प्रयोग वृष्य, बलवर्धक, वर्ण्य कण्ठ के लिये हितकारी बृहण ( पुष्टिदायक ) है ॥ २१-२३ ॥ दध्नः शरं शरच्चन्द्रसंनिभं दोषवर्जितम् । शर्कराक्षौद्रमरिचैस्त्वगाक्षीर्या च बुद्धिमान् ॥ २४ ॥ युक्त्या युक्तं ससूक्ष्मैलं नवे कुम्भे शुचौ पटे । मार्जितं प्रक्षिपेच्छीते घृताढ्ये षष्टिकौदने ॥ २५ ॥ पिबेन्मात्रां रसालायास्त भुक्त्वा षष्टिकौदनम् । वर्णस्वरबलोपेतः पुमांस्तेन वृषायते ॥ २६ ॥ इति वृष्यो दधिशरप्रयोगः । दधिशर प्रयोग—शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल और दोषरहित दही की मलाई में खाण्ड मधु, मरिच वंशलोचन और छोटी इलायची डाल कर बुद्धिमान् वैद्य इनको मिट्टी के पात्र में मिला लेवे । फिर इनको शुद्ध बारीक वस्त्र पर डालकर धीरे २ मथ लेवे । इस प्रकार से छनी दही को घी-बहुल ठण्डे हुए साठी भात के साथ खाये । पीछे से मात्रा में रसाला पीनी चाहिये । इससे मनुष्य का वर्ण, स्वर और बल बढाता है तथा शुक्रकी वृद्धि होती है ॥२४-२६॥ चन्द्रांशुकल्पं पयसा घृताढ्यं षष्टिकौदनम् ।