भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 271

पा० २ ] १७ चिकित्सितस्थानम् २५७ शष्कुली, वर्तिका, पूप ( पूप ), धाना तथा अन्य नाना प्रकार क भक्ष्य बनाने चाहियें १ । इनके प्रयोग से, वीर्य से पूर्ण होकर अत्यन्त ध्वज हर्ष के साथ घोड़े के समान यथेच्छ स्त्रियों से मैथुन कर सकता है ॥१०-१३॥ आत्मगुप्ताफलं माषान् खर्जूराणि शतावरीम् । शृङ्गाटकानि मृद्वीकां साधयेत्प्रसृतोन्मिताम् ॥ १४ ॥ क्षीरप्रस्थ जलप्रस्थमेतत्प्रस्थावशेषितम् । शुद्धेन वाससा पूतं योजयेत्प्रसृतैस्त्रिभिः ॥ १५ ॥ शर्करायास्तुगाक्षीर्याः सर्पिषाऽभिनवस्य च । तत्पाययेत सक्षौद्रं षष्टिकात्रं च भोजयेत् ॥ १६ ॥ जरापरीतोऽप्यबलो योगेनानेन विन्दति । नरोऽपत्यं सुविपुलं युवेव च स हृष्यति ॥ १७ ॥ इत्यपत्यकरः स्वरसः । अपत्यकर स्वरस—कौंच के बीज, उड़द, खजूर, शतावर, सिंघाड़े, मुनक्का, इनमें से प्रत्येक एक २ प्रसृत ( २ पल ), दूध २ प्रस्थ, जल २ प्रस्थ, इनको धीरे धीरे पका कर दूध मात्र शेष रहने देना चाहिये। जल उड़ जाने पर इनको वस्त्र में छान लेवे । इसमें खांड, वंशलोचन और ताजा घी मिलित तीन प्रसृत ( ६ पल ) मिला देव । पीछे से मधु मिलाकर इसको पिलावे । पीछे साठी का चावल खिलावे । इस प्रयोग से बुढ़ापे से पीड़ित निर्बल व्यक्ति भी अनेक सन्तानों को प्राप्त करता है और युवाओं के समान ध्वज-हर्ष प्राप्त करता है ॥ १४-१७ ॥ खर्जूरीमस्तकं माषान् पयस्यां सशतावरीम् । खर्जूराणि मधूकानि मृद्वीकामजडाफलम् ॥ १८ ॥ पलान्मितानि मतिमान् साधयेत्सलिळाढके। तेन पादावशेषेण क्षीरप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १६ ॥ क्षीरशेषेण तेनाद्याद् घृताढ्यं षष्टिकौदनम् । सशर्करेण संयोग एष वृष्यः पर स्मृतः ॥ २० ॥ इति वृष्यक्षीरम् । वृष्यक्षीर योग—खजूर वृक्ष का मस्तक, उड़द, पयस्या ( क्षीर विदारी ), शतावर, खजूर, महुवा, मुनक्का और कौंच के बीज इनमें प्रत्येक एक एक पल १ शुक्र के अभाव में अण्डों का प्रयोग करना चाहिये । अण्डे न मिलें तो मास का प्रयोग हो सकता है ।