भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २५६ शर्करामधुसंयुक्तं प्रयुञ्जानो वृषायते ॥ २७ ॥ इति वृष्यषष्टिकौदनप्रयोगः । षष्टिकौदन प्रयोग—चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल साठी के चावलों को प्रचुर घी, दूध, शर्करा और मधु के साथ मिलाकर खाने से अत्यधिक वृषता प्राप्त होती ॥ २७ ॥ तप्ते सर्पिषि नक्राण्डं ताम्रचूडाण्डमिश्रितम् । युक्तं षष्टिकचूर्णेन सर्पिषाऽभिनवेन च ॥ २८ ॥ पक्त्वा पूपलिकाः खाद्देद्वारुणीमण्डपो नरः । य इच्छेद्दश्ववद्रन्तुं प्रसेक्तुं गजवच्च यः ॥ २९ ॥ इति वृष्यपूपलिकाः । वृष्य-पूपलिका—नक्र का अण्डा, मुर्गी का अण्डा, साठी के चावलों का आटा, ताजा घी इनको मिला कर पूपलिकायें बनानी चाहिये । इनको खाकर ऊपर से वारुणी का मण्ड ( ऊपर का स्वच्छ भाग ) पीना चाहिये । इससे अश्व के समान रमण करने की शक्ति और हाथी के समान शुक्र क्षरण का सामर्थ्य होता है ॥ २९ ॥ भवन्ति चात्र—आसिक्तक्षीरिके पादे ये योगाः परिकीर्तिताः । अष्टावपत्यकामैस्ते प्रयोक्तव्याः पौरुषार्थिभिः ॥ ३० ॥ एतैः प्रयोगैर्विविधैर्वृषः पुमान् स्नेहोपपन्नो बलवर्णयुक्तः । हर्षान्वितो वाजिवदष्टवर्षो भवेत्समर्थश्च वराङ्गनासु ॥ ३१ ॥ यद्यच्च किञ्चिन्मनसः प्रियं स्याद्रम्या वनान्ताः पुलिनानि शैलाः । इष्टाः स्त्रियो भूषणगन्धमाल्य प्रिया वयस्याश्च तदत्र योग्यम् ॥३२॥ इस आसिक्त-क्षीरीय नामक पाद में आठ योग कहते हैं । ये सन्तान के इच्छुक तथा पौरुष की कामना करने वालों को सेवन करना चाहिये । इन योगों के प्रयोग करने से मनुष्य सुन्दर शरीर, स्निग्ध वदन, बल, वर्ण से युक्त, अश्व के समान हर्षयुक्त तथा स्त्रियों में अतिसमर्थ होता है । इन प्रयोगों के साथ साथ जो भी मन को प्रिय लगे, रम्य वन, नदियों के सुन्दर किनारे, सुन्दर पर्वत, सुन्दर स्त्रियों, आभूषणों की झकार, मनमोहक सुगन्ध इत्रों की महक, भीनी महक वाली मालाये, प्रिय मित्र ये सब वस्तुए वाजीकरण में सहायक होती हैं ॥३०-३२॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आसिक्तक्षीरीयो नाम वाजीकरणपादो द्वितीयः ।