चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ चरकसंहिता [ अ० २ वाजीकरणमग्र्यं च क्षेत्रं स्त्री या प्रहर्षिणी ॥ ४ ॥ इष्टा ह्येकैकशोऽप्यर्थाः परं प्रीतिकराः स्मृताः । किं पुनः स्त्रीशरीरे ये सङ्घातेन व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥ सङ्घातो हीन्द्रियार्थानां स्त्रीषु नान्यत्र विद्यते । स्त्र्याश्रयो हीन्द्रियार्थो यः स प्रीतिजननोऽधिकम् ॥ ६ ॥ स्त्रीषु प्रीतिविशेषेण स्त्रीष्वपत्यं प्रतिष्ठितम् । धर्मार्थौ स्त्रीषु लक्ष्मीश्च स्त्रीषु लोकाः प्रतिष्ठिता ॥ ७ ॥ सुरूपा यौवनस्था या लक्षणैर्या विभूषिता । या वश्या शिक्षिता या च सा स्त्री वृष्यतमा मता ॥ ८ ॥ सब से प्रधान वाजीकरण— सब से श्रेष्ठ वाजीकरण 'क्षेत्र' है, और हर्ष को उत्पन्न करने वाली स्त्री 'क्षेत्र' है । [ स्त्री में बीज का वपन अर्थात् आधान होता है, इसलिये स्त्री को 'क्षेत्र' कहते हैं । ] एक एक भी मनचाहा ग्राह्य विषय रूप, रस, गन्ध आदि अत्यन्त प्रीति को उत्पन्न करता है । परन्तु ये सब रूप आदि विषय सम्मिलित होकर स्त्री के शरीर में उपस्थित होते हैं, तब फिर क्यों न उसमें प्रीति उत्पन्न हो, अवश्य होगी । स्त्रियों में आश्रित इन्द्रियों के विषय ही प्रीति को अधिक उत्पन्न करते हैं, अन्य स्थानों में आश्रित विषय इतनी प्रीति को उत्पन्न नहीं करते । मनुष्य की स्त्रियों में ही विशेषतः प्रीति अर्थात् ( स्नेह की मात्रा अति अधिक रहती है ) । सन्तान स्त्रियों में ही प्रति- ष्ठित है । धर्म, अर्थ और लक्ष्मी भी स्त्रियों में ही प्रतिष्ठित है । स्त्रियों में ही सब लोक प्रतिष्ठित हैं । जो स्त्री रूपवती, युवती, ( काम-शास्त्र में वर्णित ) उत्तम २ लक्षणों से सुभूषित, वश में रहनेवाली, ( कामशास्त्र में वर्णित ६४ कलाओं में ) शिक्षित, निपुण हो, वह स्त्री सबसे उत्तम वाजीकरण है ॥४-८॥ नानाभक्त्या तु लोकस्य दैवयोगाच्च योषिताम् । तं तं प्राप्य विवर्धन्ते नरं रूपादयो गुणाः ॥ ६ ॥ लोगों की भिन्न भिन्न रुचि होने के कारण और दैवयोग से स्त्रियों के रूप आदि गुण उस उस प्रकार की रुचि वाले पुरुष के मिलने से बढ़ते हैं । [स्त्रियों के गुणों के अनुकूल यदि पुरुष मिल जाये तब तो गुण बढ़ते हैं, अन्यथा घट जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं ] ॥ ६ ॥ वयोरूपवचोहावै १ र्या यस्य परमाङ्गना । प्रविशत्याशु हृदयं दैवाद्रा कर्मणोऽपि वा ॥ १० ॥ हृदयोत्सवरूपा या या समानमनोरमा २ । १. 'मृजाहावै' इति च पाठः । २. 'समानमनःशया' इति च पाठः ।