भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४६ समानसत्त्वा या वश्या या यस्य प्रीयते प्रियैः ॥ ११ ॥ या पाशभूता सर्वेषामिन्द्रियाणां परैर्गुणैः । यया वियुक्तो निस्त्रीकमरतिर्मन्यते जगत् ॥ १२ ॥ यस्या ऋते शरीरं ना धत्ते शून्यमिवेन्द्रियैः । शोकोद्वेगारतिभयैर्य्यां दृष्ट्वा नाभिभूयते ॥ १३ ॥ याति यां प्राप्य विस्रम्भं दृष्ट्वा हृष्यत्यतीव याम् । अपूर्वामिव यां याति नित्यं हर्षातिवेगतः ॥ १४ ॥ गत्वा गत्वाऽपि बहुशो या तृप्तिं नैव गच्छति । सा स्त्री वृष्यतमा तस्य नानाभावा हि मानवाः ॥ १५ ॥ जो स्त्री आयु, रूप, वाणी, हाव ( शृंगार आदि चेष्टा ) आदि के द्वारा या दैवयोग से अथवा अन्य कर्मों से मनुष्य के हृदय में उतर जाती है, जो हृदय में आनन्द का सञ्चार करती है, जिसकी कामचेष्टा मनुष्य के समान होती है, जिसका सत्त्व ( चित्त ) पुरुष के समान है, जो पुरुष के वश में रहती है, जो स्त्री पुरुष की प्रिय वस्तुओं से प्रसन्न होती है। जो स्त्री अपने उत्कृष्ट गुणों के कारण पुरुष की समस्त इन्द्रियों के लिये जाल रूप है ( जिसमे पुरुष फसा रहता है ), जिससे छूटकर रति रहित, बेचैन होकर पुरुष समस्त संसारको स्त्री से शून्य मानता है, जिस स्त्री के बिना पुरुष अपने शरीर को इन्द्रियों से रहित मानता है जिसको देखकर शोक, उद्वेग, बेचैनी, भय आदि सब भूल जाता है, जिसको देखते ही शान्ति अनुभव करता है, जिसके दर्शन से अत्यन्त खुशी अनुभव करने लगता है, जिस स्त्री के साथ नित्य प्रति अत्यन्त हर्ष (कामोद्वेग) के कारण नूतन स्त्री के रूप में सम्भोग करता और बार बार मैथुन करने पर भी तृप्त नहीं होता वह स्त्री उस पुरुष के लिये सबसे उत्तम वृष्य ( वाजी- करण रसायन ) है ॥ १०-१५ ॥ अतुल्यगोत्रां वृष्यां च प्रहृष्टां निरुपद्रवाम् । शुद्धस्नातां व्रजेन्नारोमपत्यार्थी निरामयः ॥ १६ ॥ सन्तान की चाह रखनेवाला पुरुष स्वय रोगरहित होकर अपने से भिन्न गोत्रवाली, वृष्यतम, हर्षयुक्त [ प्रसन्न मन ], रोग आदि उपद्रवों से रहित, रजोधर्म के पीछे स्नान कर शुद्ध हुई स्त्री के साथ सहवास करे ॥ १६ ॥ अच्छायश्चैकशाखश्च निष्फलश्च यथा द्रुमः । अनिष्टागन्धश्चैकश्च निरपत्यस्तथा नरः ॥ १७ ॥ चित्रदीपः सरः शुष्कमधातुर्धातुसन्निभः ।