भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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२४६ चरकसंहिता [ अ० १ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰

बनता है। ज्ञान के कारण ही ब्रह्मत्व या आर्षत्व आता है। इसलिये वैद्य को त्रिज (द्विज) कहते हैं। उसका यह ती (दू) सरा जन्म होता है जो बुद्धिमान् मनुष्य अपनी दीर्घ आयु चाहे उसको चाहिये कि प्राणाचार्य वैद्य का न तो तिरस्कार करे, न उसकी निन्दा करे और न उसका कुछ बुरा ही करे। जो पुरुष वैद्य द्वारा चिकित्सा कराके धन आदि देने की प्रतिज्ञा करके अथवा न करके भी वैद्य का प्रत्युपकार नही करता, उसकी कहीं भी निष्कृति (कल्याण) नहीं। वैद्य का कर्त्तव्य है कि रोगियों को अपने पुत्र के समान समझे। सर्वो- त्तम धर्म की इच्छा रखते हुए इनको रोगों से बचावे ॥ ५१-५६ ॥ धर्मार्थं नार्थकामार्थमायुर्वेदो महर्षिभिः । प्रकाशितो धर्मपरैरिच्छद्भिः स्थानमक्षरम् ॥ ५७ ॥ नार्थार्थं नापि कामार्थमथ भूतदयां प्रति । वर्तते यश्चिकित्सायां स सर्वमतिवर्तते ॥ ५८ ॥ कुर्वते ये तु वृत्त्यर्थं चिकित्सापण्यविक्रयम् । ते हित्वा काञ्चनं राशिं पाशुराशिमुपासते ॥ ५६ ॥ धर्मपरायण महर्षियों ने अक्षय स्थान (मुक्ति, ब्रह्म-साक्षात्कार) की चाहना से धर्म के लिये आयुर्वेद का प्रकाश किया है। धन की इच्छा से आयुर्वेद का प्रकाश नहीं किया। जो वैद्य केवल प्राणिमात्र के दया भाव से चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त होता है, किसी धन की इच्छा (स्वार्थ) से प्रवृत्त नहीं होता, वह सब पुण्य कार्यों को अतिक्रमण कर जाता है। जो व्यक्ति पेट के लिये चिकित्सा को दुकानदारी बनाते हैं, वे लोग स्वर्ण की राशि को छोड़ कर (धर्म को छोड़ कर), धूल की ढेरी बाँधते हैं। (पाप की गठरी सिर पर धरते हैं) ॥ ५६ ॥ दारुणैः कृष्यमाणानां गदैर्वैवस्वतक्षयम् । छित्त्वा वैवस्वतान् पाशाञ्जीवितं च प्रयच्छति ॥ ६० ॥ धर्मार्थसदृशस्तम्य दाता नेहोपलभ्यते । न हि जीवितदानाद्धि दानमन्यद्विशिष्यते ॥ ६१ ॥ परो भूतदया धर्म इति मत्वा चिकित्सया । वर्तते यः स सिद्धार्थः सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ६२ ॥ कठिन पीड़ा देने वाले, रोगों से पीड़ित यमालय की ओर जाते हुए व्यक्तियों को यम के पास काट कर छुड़ाता है, उनको जीवन देता है, उसके समान धर्म-अर्थ का दाता इस संसार में और कोई नहीं है। क्योंकि जीवन-दान से बढ़कर और कोई दान संसार में नहीं है। प्राणियों पर दया करना उत्कृष्ट