चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४५ हवि ( आहुतिया, अन्न ) और धूम्रवर्ग के पशुओं की कल्पना किया करते थे १ । इन्द्र प्रातःसवन में ( यज्ञस्थान में ) अश्वियों के साथ सोमपान करते हैं । सौत्रामणि यज्ञ मे भगवान् अश्वियों के साथ प्रसन्न होते हैं । द्विज लोग प्रायः इन्द्र, अग्नि और अश्वियों की स्तुति करते हैं। वेद वाक्यों में अन्य देवताओं की ऐसी स्तुति नहीं की जाती, जैसी कि अश्वियों की है। जरारहित, मृत्युरहित, बुद्धिमान् और स्थिर देवगण भी अपने राजा इन्द्र के साथ बड़े प्रयत्न से चिकित्सक अश्वियों की पूजा करते हैं, तो फिर मृत्यु, रोग तथा बुढ़ापे से निश्चय रूप में पीड़ित होने वाले परन्तु सुख की चाह रखने वाले मनुष्य किस लिये अपनी पूर्ण शक्ति के साथ इनकी पूजा न करें। अवश्य वैद्यों की पूजा मनुष्यो को करनी चाहिये ।; ५० ॥ शीलवान्मतिमान् युक्तो द्विजातिः शास्त्रपारगः । प्राणिभिर्गुरुवत्पूज्यः प्राणाचार्यः स हि स्मृतः ॥ ५१ ॥ विद्यासमाप्तौ भिषजस्तृतीया२ जातिरुच्यते । अश्नुते वैद्यशब्दं हि न वैद्यः पूर्वजन्मना ॥ ५२ ॥ विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सत्त्वमार्षमथापि वा । ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद्वैद्यद्विजः३स्मृतः ॥ ५३ ॥ नाभिध्यायेन्न चाक्रोशेदहितं न समाचरेत् । प्राणाचार्यं बुधः कश्चिदिच्छन्नायुरनित्वरम् ॥ ५४ ॥ चिकित्सितस्तु संश्रुत्य यो वाऽसंश्रुत्य मानवः । नोपाकरोति वैद्याय नास्ति तस्येह निष्कृतिः ॥ ५५ ॥ भिषगप्यातुरान् सर्वान् स्वसुतानिव यत्नवान् । आबाधेभ्यो हि संरक्षेदिच्छन् धर्ममनुत्तमम् ॥ ५६ ॥ सुशील, बुद्धिमान्, द्विजाति आयुर्वेद शास्त्र में निष्ठा व्यक्ति को 'प्राणाचार्य' कहते हैं। इस व्यक्ति की पूजा लोगों को गुरु के समान करनी चाहिये । आयु- र्वेद की समाप्ति पर ही चिकित्सक की तीसरी (दूसरी) जाती होती है। पूर्वजन्म से कोई वैद्य नहीं होता, आयुर्वेद का ज्ञान गुरुमुख से पढ़ने पर 'वैद्य' कहाता है, विद्या की समाप्ति पर ही ब्राह्म सत्त्व या आर्ष सत्त्व ( मन ) १ 'मत्राणि' के स्थान पर 'शस्त्राणि' पाठ भी है। 'वषट्कार से युक्त मन्त्र ही 'शस्त्र' कहाते हैं। धूम्र के स्थान पर 'धूम' पाठ करने पर 'धूप' अगरबत्ती आदि का धूम लेना चाहिये। २. 'भिषजो द्वितीया' इति च पाठः । ३. 'वैद्यो द्विजः' इति च पाठः ।