भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

२४४ चरकसंहिता [ अ० १ चिकित्सितस्तु १शीतांशूर्गृहीतो राजयक्ष्मणा । सोमाभिपतितश्चन्द्रः कृतस्ताभ्यां पुनः सुखी ॥ ४३ ॥ भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः । वीतवर्णस्वरोपेतः कृतस्ताभ्यां पुनर्युवा ॥ ४४ ॥ एतैश्चान्यैश्च बहुभि कर्मभिर्भिषगुत्तमौ । बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां महात्मनाम् ॥ ४५ ॥ ग्रहाः स्तोत्राणि मन्त्राणि तथाऽन्यानि२ हवींषि च । धूमाश्च पशवस्ताभ्यां प्रकल्प्यन्ते द्विजातिभिः ॥ ४६ ॥ प्रातश्च सवने सोमं शक्रोऽश्विभ्या सहाश्नुते । सौत्रामण्यां च भगवानश्विभ्यां सह मोदते ॥ ४७ ॥ इन्द्राग्नी चाश्विनौ चैव स्तूयन्ते प्रायशो द्विज । स्तूयन्ते वेदवाक्येषु न तथाऽन्या हि देवताः ॥ ४८ ॥ अमरैरजरैस्तावद्विबुधैः साधिपैर्ध्रुवैः । पूज्येते प्रयतरेवमश्विनौ भिषजाविति ॥ ४९ ॥ मृत्युव्याधिजरावश्यैर्दुःखप्रायैः सुखार्थिभिः । कि पुनर्भिषजो मर्त्यैः पूज्याः स्युर्नातिशक्तितः ॥ ५० ॥ अश्वियो के कार्य—देवों के चिकित्सक अश्वियों को यज्ञवाहक कहा जाता है । जब तक इनको भाग नहीं मिलता तब तक कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता३ । प्राचीन काल मे दक्ष (यज्ञ) का शिर कट गया था, इन्होने ही फिर से उसको जोड़ा था । पूषा के दात टूट गये थे, भग की आँखें नष्ट हो गई थीं, इन्द्र को भुजस्तम्भ होगया था इन अश्वियों ने ही सब की चिकित्सा की थी । चन्द्रमा को जब यक्ष्मा रोग हो गया था, तब इन्होने ही चिकित्सा की थी । चन्द्रमा का जब सोम (वीर्य) नष्ट हो गया था, तब इन्होने ही इसको स्वस्थ किया था । भृगुवंश में उत्पन्न च्यवन ऋषि अत्यन्त कामी होने से शीघ्र वृद्ध हो गये थे, उनके वर्ण, स्वर नष्ट हो गये थे, इन अश्वियों ने पुनः उनको युवा कर दिया था । इन उपरोक्त कार्यों से तथा अन्य कार्यों के कारण चिकित्सा मे श्रेष्ठ दोनों अश्विगौ इन्द्र आदि महात्माओं के अत्यन्त पूजापात्र हो गये थे । द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) लोग अश्वियों के लिये ग्रह (सोम पान के पात्र), स्तोत्र, मंत्र, अन्य १. 'चिकित्सितः शशी ताभ्या' इति च पाठः । २. 'तथा नाना' इति च पाठः । ३. अश्वियों के यज्ञ-भाग की कथा के लिये महाभारत में च्यवन ऋषि की कथा देखिये ।