चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५२ चरकसंहिता [ अ० २ नागकेशर मिश्रित आधा पल, शहद दो कुडव मिलावे । इससे एक एक पल की गुटिका बना कर अग्नि के बलानुसार खावे। यह प्रयोग अत्यन्त वीर्यवर्धक, पुष्टि- वर्धक, बलवर्धक है । इसके प्रयोग से अत्यन्त मैथुन शक्ति बढ़ जाती है। कोई २ [ आचार्य शहद १६ पल डालते हैं। एक कुडव = चार पल ] ॥ २५-३३ ॥ माषाणामात्मगुप्ताया बीजानामाढकं नवम् । जीवकर्षभकौ वीरां मेदामृद्धिंशतावरीम् ॥ ३४ ॥ मधुकं चाश्वगन्धां च साधयेत्कुडवोन्मिताम् । रसे तस्मिन् घृतप्रस्थं गव्यं दशगुण पयः ॥ ३५ ॥ विदारीणा रसप्रस्थ प्रस्थमिक्षुरसस्य च । दत्त्वा मृद्वग्निना साध्यं सिद्धं सर्पिर्निधापयेत् ॥ ३६ ॥ शर्करायास्तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्य च पृथक् पृथक् । भागांश्चतुष्पलांस्तत्र पिप्पल्याश्चावपेत्पलम् ॥ ३७ ॥ पलं पूर्वमतो लीढवा ततोऽन्नमुपयोजयेत् । य इच्छेदक्षय शुक्रं शेफसश्चोत्तम बलम् ॥ ३८ ॥ इति वाजीकरणं घृतम् । वाजीकरण घृत—नवीन उड़द १ आढक, कौंच के बीज १ आढक, जीवक, ऋषभक, वीरा (काकोली या शतावरी), मेदा, ऋद्धि, शतावरी, मुलहठी, अश्वगन्धा प्रत्येक एक कुडव इनको आठ गुणे जल में क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । गाय का घी एक प्रस्थ, दूध घी से दशगुना (दश प्रस्थ), विदारी का स्वरस १ प्रस्थ, गन्ने का रस १ प्रस्थ, मिला कर मृदु अग्नि पर घृत सिद्ध करना चाहिये । घी सिद्ध हो जाने पर खाड़, वंशलोचन और शहद प्रत्येक चार चार पल और पिप्पली एक पल मिलाना चाहिये । इस औषध को एक पल खाकर पीछे से अन्न का भोजन करना चाहिये । इससे शुक्र का अक्षय भण्डार तथा जननेन्द्रिय में उत्तम बल आता है ॥ ३४-३८ ॥ शर्करा माषविदलास्तुगाक्षीरी पयो घृतम् । गोधूमचूर्णषष्ठानि सर्पिष्युत्कारिकां पचेत् ॥ ३६ ॥ तां नातिपक्कां मृदितां कौक्कुटे मधुरे रसे । सुगन्धे प्रक्षिपेदुष्णे यथा सान्द्रीभवेद्रसः ॥ ४० ॥ एष पिण्डरसो वृष्यः पौष्टिको बलवर्धनः । अनेनाश्व इवोदीर्णो बली लिंगं समर्पयेत् ॥ ४१ ॥