चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २५१
शरमूलेक्षुमूलानि काण्डेक्षुः सेक्षुवालिका ।
शतावरी पयस्या च विदारी कण्टकारिका ॥ २५ ॥
जीवन्ती जीवको मेदा वीरो चर्षभको बला ।
ऋद्धिर्गोक्षुरकं रास्ना सात्मगुप्ता पुनर्नवा ॥ २६ ॥
एषां त्रिपलिकान् भागान् माषाणामाढकं नवम् ।
विपाचयेज्जलद्रोणे चतुर्थागं च शेषयेत् ॥ २७ ॥
तत्र पेष्याणि मधुकं द्राक्षा फल्गूनि पिप्पली ।
आत्मगुप्ता मधूकानि खर्जूराणि शतावरी ॥ २८ ॥
विदार्याम्रलकक्षूणां रसस्य च पृथक् पृथक् ।
सर्पिषश्चाढकं दद्यात्क्षीरद्रोण च तद्विषक् ॥ २९ ॥
साधयेद् घृतशेष च सुपूतं योजयेत्पुनः ।
शर्करायास्तुगाक्षीर्योश्चूर्णैः प्रस्थोन्मितैः पृथक् ॥ ३० ॥
पलैश्चतुर्भिर्मागध्याः पलेन मरिचस्य च ।
त्वगेलाकेशराणां च चूर्णैरर्धपलोन्मितैः ॥ ३१ ॥
मधुनः कुडवाभ्या च द्वाभ्यां तत्कारयेद्भिषक् ।
पलिका गुलिकास्त्यानास्ता यथाग्नि प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
एष वृष्य. परो योगो बृहणो बलवर्धनः ।
अनेनाश्व इवोदीर्णो लिङ्गमर्पयते स्त्रियाम् ॥ ३३ ॥
इति बृहणीगुडिका ।
बृंहणी गुटिका—शरमूल ( सरकण्डे की जड़ ), गन्ने की जड़, काण्डेक्षु
( ईख का भेद ) की जड़, इक्षुबालिका नाम ईख¹ की जड़, शतावरी,
क्षीरविदारी, विदारी, कटेरी, जीवन्ती, जीवक, मेदा, वीरा ( काकोली या
शालपर्णी ), ऋषभक, बलामूल, ऋद्धि, गोखरू, रास्ना कौंच और पुनर्नवा
प्रत्येक ३ पल, नये उड़द १ आढक, इन को एक द्रोण जल मे ( परिभाषानुसार
दुगने जल में ५१ सेर १६ तोला ) क्वाथ करके चतुर्थांश रहने पर छान लेवे ।
कल्कार्थ द्रव्य—मुलहठी, मुनक्का, गूलर, पिप्पली, कौंच, महुआ, खजूर,
शतावरी मिलित सब आधा आढक, विदारीकन्द का स्वरस, आँवले का स्वरस,
गन्ने का रस और घी प्रत्येक दो दो आढक, दूध दो द्रोण, इनका घृत पाक
विधि से घृत सिद्ध करले । सिद्ध घी को छान कर इसमें शर्करा का चूर्ण १
प्रस्थ, वंशलोचन १ प्रस्थ, पिप्पली ४ पल, मरिच १ पल, दालचीनी, इलायची,
१ इस ईख में फूल आता है, जो कि कास के फूल की भाँति होता है ।