चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १३ ] ३५ चिकित्सितस्थानम् ५४५
अ० १३ ] ३५ चिकित्सितस्थानम् ५४५ श्यामाकं कोरदूषं वा पयसाऽलवणं नरः¹ ॥ १६१ ॥ संवत्सरेणैव जयेत् प्राप्तं चैव जलोदरम् । प्रयोगाणां च सर्वेषामनुक्षीरं प्रयोजयेत् ॥ १६२ ॥ पानी के निकल जाने पर रोगी को लङ्घन कराके स्नेह और लवण से रहित पेया पिलानी चाहिये । इसके पीछे छः मास तक केवल दूध पर ही निर्वाह करे। तीन मास तक दूध के साथ पेया पीना चाहिये । शेष तीन मासो मे श्यामाक, कोदो आदि लघु अन्न दूध के साथ, थोडे नमक के साथ खाये । इस प्रकार से एक साल की चिकित्सा से जलोदर की चिकित्सा करनी चाहिये² ॥१६०-१६२॥ दोषानुबन्धरक्षार्थं बलस्थैर्यार्थमेव च प्रयोगापचिताङ्गानां हितं ह्युदरिणां पयः । सर्वधातुक्षयार्तानां देवानाममृतं यथा ॥ १६३ ॥ दोष-अनुबन्ध की निवृत्ति और बल तथा धातुओ की स्थिरता के लिये सब प्रयोगो के पीछे दूध पीना चाहिये । क्योंकि विरेचनादि प्रयोगों से क्षीण अंगों वाले और सब धातुओं का क्षय होने से उदर-रोगी के लिये दूध अमृत के समान हितकारी है ॥ १६३ ॥ तत्र श्लोकौ—हेतुं प्राग्रूपमष्टानां लिङ्गं व्याससमासतः । उपद्रवान् गरीयस्त्वं साध्यासाध्यत्वमेव च ॥ १६४ ॥ जाताजाताम्बुलिङ्गानि चिकित्सा चोक्तवानृषिः । समासव्यासनिर्देशैरुदराणां चिकित्सिते ॥ १६५ ॥ उपसहार—आठो प्रकार के उदर रोगा के विस्तार और सक्षेप मे कारणों, पूर्वरूपो, लक्षणो और उपद्रवो तथा प्राधान्य-अप्राधान्य, साध्यासाध्य, जातोदक और अजातोदक के लक्षण और चिकित्सा का भगवान् आत्रेय ने इस उदररोग- चिकित्सा-अध्याय मे कह दिया ॥ १६४-१६५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने उदर- चिकित्सितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ १. 'कोरदूष्यं वा क्षीरेण लघुभोजन' इति च पाठः । २. सुश्रुत मे— २. निःस्रुते च दोषे गाढतरमाविककौशेयकचर्मणामन्यतमेन परिवेष्टयेदुदरम्। तथा नाध्मापयति वायु । षण्मासांश्च पयसा भोजयेत् जांगलरसेन वा । तत्र त्रीन् मासान् अर्द्धोदकेन पयसा फलाम्लेन जांगलरसेन वा । अवशिष्टमासत्रयमन्नं लघु हितं वा सेवेत । एव संवत्सरेणागदो भवति ॥ सु० चि० १४ ॥
५४६ चरकसंहिता [ अ० १४ चतुर्दशोऽध्यायः। अथार्शश्चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे अर्शारोग चिकित्सा की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है¹ ॥ १-२ ॥ आसीनं मुनिमव्यग्रं कृतजप्यं कृतक्षणम् । पृष्टवानर्शसां मुक्तिमग्निवेशः पुनर्वसुम् ॥ ३ ॥ प्रकोपह्तुसंस्थानं स्थानं लिङ्गचिकित्सितम् । साध्यासाध्यविभागं च तस्मै तन्मुनिरब्रवीत् ॥ ४ ॥ मन्त्र आदि जप करके स्वस्थ रूप मे बैठे हुए भगवान् आत्रेय से अवसर देखकर अग्निवेश ने अर्श-रोग से छूटने का उपाय पूछा । आत्रेय मुनि ने अग्निवेश को अर्श रोग के प्रकोपके कारण, आकृति, उत्पत्ति, स्थान, लक्षण, चिकित्सा और साध्य-असाध्य भेदो का उपदेश किया ॥३-४॥ इह खल्वग्निवेश ! द्विविधान्यर्शांसि सहजानि कानिचित् कानि- चिज्जातस्योत्तरकालजानि । तत्र बीजं गुदवलिबीजोपतप्तमायतनमर्शसा सहजानाम् । तत्र द्विविधौ बीजावुपतप्तौ हेतुर्मातापित्रोरपचारः, पूर्वकृतं च कर्म, तथाऽन्येषामपि सहजाना विकाराणाम् । तत्र सहजानि सह- जातानि शरीरेण, अर्शांसीत्यधिमांसविकाराः ॥ ५ ॥ हे अग्निवेश ! अर्श-रोग दो प्रकार के होते है । कई अर्श सहज अर्थात् गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न होते है, और कई अर्श उत्पत्ति काल के पीछे उत्पन्न हो जाते हैं । इनमे गुदवलि के आरम्भक बीजभाग के उपतप्त ( दूषित ) होने से सहज अर्श उत्पन्न होते है । शुक्र और आर्त्तव के उपतप्त ( दूषित होने से ) अर्श होते है । शुक्र-आर्त्तव रूपी बीज के उपतप्त ( दूषित ) होने के दो कारण हैं । एक—माता पिता का अनुचित आहार-विहार और दूसरा-पूर्वकृत कर्म । १ कुछ लोगों की धारणा है कि यहा से आरम्भ करके अन्त तक के भाग को आचार्य दृढबल ने पूरा किया है । जैसा कि कहा जाता है— 'अखण्डार्थं दृढबलो जातः पञ्चनदे पुरे । कृत्वा बहुभ्यः शास्त्रेभ्यो विशेषाच्च बलोच्चयम् । सप्तदशौषधाध्यायसिद्धकल्पैरपूरयत् ॥'
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४७
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४७ इसी प्रकार से अन्य सहज रोगो के भी ये ही दो कारण है। इनमे गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न सहज-अर्श अधिमास के ही विकार हैं। इनको अधिमास विकार ही समझना चाहिये । [ किसी स्थान पर अधिक मास का उठ आना 'अधिमास' विकार कहाता है, यह भी एक प्रकार का रोग है ] ॥५॥ सर्वेषां चार्शसां क्षेत्रं—गुदस्यार्धपञ्चमाङ्गुलेऽवकाशे त्रिभागान्त- रास्तिस्रो गुदवलयः, क्षेत्रमिति देशः। स्थान—दानो प्रकार के अशों का स्थान गुदा के मुख से लेकर साढे पाच अगुल गुदाभाग है। इस गुदा भाग के तीन विभाग है। इसमे तीन वलिया (चक्र) है। (१) प्रवाहिणी, (२) विसर्जनी और (३) सवरणी १। ये तीनो वलिया दोनो प्रकार के अर्श रोगो का उत्पत्ति स्थान है। [ ये वली या चक्र डेढ २ अगुल चौड़ी ओर एक अगुल उभार की चार अगुल भर हाती हैं ।] केचित्तु भूयांसमेव देशमुपदिशन्त्यर्शसां शिश्ममपत्यपथं गलमुख- नासिकाकर्णाक्षिवर्त्मानि त्वक् च। कई आचार्य इससे भी अधिक स्थानों को अर्श का स्थान मानते है। जैसे—अपत्य-पथ (योनिमार्ग) लिग (इन्द्रिय), गला, तालु, मुख, नाक, कान, आख इनके मार्ग और त्वचा इन स्थानो मे भी अर्शरोग होता है। तदस्रत्यधिमांसदेशतया, गुदवलिजाना त्वर्शासीति संज्ञा तन्त्रेऽस्मिन् । सर्वेषा चार्शसामधिष्ठानं मेदो मांसं त्वक् च ॥ ६ ॥ ये सब स्थान अधिमास के रोग है, इस शास्त्र मे गुदा की वलियो मे उत्पन्न अशो की ही 'अर्श' सज्ञा है। सब प्रकार के अर्श-रोगो का आश्रय-स्थान मेद मास और त्वचा है ॥ ६॥ तत्र सहजान्यर्शांसि कानिचिदणूनि कानिचिन्महान्ति कानिचिद्दी- र्घाणि कानिचिद् ह्रस्वानि कानिचिद् वृत्तानि कानिचिद्विषमविस्तृतानि कानिचिदन्तःकुटिलानि कानिचिद् बहिःकुटिलानि कानिचिज्जटिलानि कानिचिदन्तर्मुखानि यथास्वं दोषानुबन्धवर्णानि ॥ ७ ॥ सहज अर्श—कोई तो अति सूक्ष्म, कोई बड़े, कोई लम्बे, कोई छोटे, कोई गोल, कोई विषम रूप मे, फैले, कोई अन्दर से टेढे, कोई बाहर से टेढे, कोई जटिल (गुथे हुए), कोई अन्दर की ओर मुख किये हुए तथा दोषानुसार वर्ण वाले होते है ॥ ७ ॥ १ सुश्रुत मे कहा है—तत्र स्थूलान्त्रप्रतिविद्धमर्धपंचामुल गुदमाहुः। तस्मि- न्वलयस्तिस्रः, अध्यर्धांगुलसम्मितः । प्रवाहिणी, विसर्जनी, संवरणी चेति । चतुरंगुलमिताः सर्वास्तिर्यगेकागुलोच्छ्रिताः। सु० नि० २।
५४८ चरकसंहिता [ अ० १४ तैरुपहतो जन्मप्रभृति भवत्यतिकृशो विवर्णः क्षामो दीनः प्रचुरवि- बद्ध-वात-मूत्र-पुरीषः शार्करी चाश्मरी वा तथाऽनियत-वि बद्ध-मुक्त-पक्वा- मश्रुष्कभिन्नवर्चा अन्तगान्तरा श्वेत-पाण्डु-हरित-पीत-रक्तारुण-तनु-सान्द्र- पिच्छिल-कुणप-गन्धाम-पुरीषोपवेशी नाभि-बस्ति-वङ्क्षणोद्देशे प्रचुरपरि- कतिकान्वितः सशूलगुदप्रवाहिकः परिहर्ष-प्रमोह-प्रसक्त-विष्टम्भान्त्र-कूजो- दावर्त्त-हृदयेन्द्रियोपलेपः प्रचुरविवद्धतिक्ताम्लोद्गारः सुदुर्बलो सुदुर्बला- ग्निरल्पशुक्रः क्रोधनो दुःखोपचारशीलः काश-श्वास-तमक-तृष्णा-हृल्लास- च्छर्दिररोचकाविपाक-पीनस-क्षवथु-पर्वांतरतैर्मिरिकः शिरःशूली क्षाम- भिन्न-सन्न-सक्त-जर्जर-स्वरः कर्णरोगी सशूल-पाणि-पाद-वदनाक्षि-कूटः सज्वरः साङ्गमर्दः सर्वपर्वास्थिशूली चान्तरान्तरा पार्श्व-कुक्षि-बस्ति- हृदय-पृष्ठ-त्रिक-ग्रहोपतप्तः प्रध्यानपरः परमालसश्चेति । जन्मप्रभृत्यस्य गुदजेरावृतो मार्गोपरोधाद्वायुरपानः प्रत्यारोहन्समानव्यानप्राणोदानान् पित्तश्लेष्माणो च प्रकोपयति, ते प्रकुपिताः पञ्च वाताः पित्तश्लेष्माणौ चार्संसमभिद्रवन्त एतान् विकारानुपजनयन्तीत्युक्तानि सहजा- न्यर्शांसि ॥ ८ ॥ लक्षण—अर्शरोग के कारण रोगी जन्म से ही अति कृश, विवर्ण ( कान्ति- रहित ), क्षीण, दीन होता हं । वायु, मूत्र और मल की अधिकता ओर रुकावट रहती है । अश्मरी ( पथरी ) तथा मूत्र मे शर्करा ( रेत ) रोग की शिकायत होती है । अनिश्चित रूप मे बधा, ढीला, कच्चा, पका, शुष्क या पतला मल आता है । बीच-बीच मे कभी कभी श्वेत, पीला, हरा, धूसर वर्ण, लाल, अरुण, पतला, गाढ़ा, चिकना, शव के समान गन्धयुक्त, कच्चा मल त्याग करता है । नाभि, बस्ति और वक्षण ( कोख ) प्रदेश मे काटने के समान वेदना होती है । गुदा मे शूल, प्रवाहिका, परिहर्ष ( रोमांच ) प्रमोह रहता है । निरन्तर विष्टम्भ ( अवरोध, वायु का ), आटोप ( वेदनायुक्त गुड़गुड़ शब्द ), आंतो मे कूजन, उदावर्त्त, हृदय और इन्द्रियों का उपलेप ( कार्यों मे असमर्थता ) रहती है । उद्गार ( डकार ) बहुत, विबद्ध, तिक्त और अम्ल आता है । निर्बल, मन्दाग्नि, अल्पशुक्र, क्रोधी, निरन्तर दुःखी, कास, श्वास, तमक श्वास, प्यास, जी- मचलाना, वमन, अरुचि, अविपाक, पीनस, छीक इन रोगों से युक्त, तिमिर नामक नेत्ररोग से पीड़ित, शिरःशूलयुक्त हाता है । इसका स्वर निर्बल फटा तथा जर्जरित रहता है । कर्ण रोग होते है । हाथ, पाव, मुख और आखों के गोलकों पर सूजन होती है । ज्वर, अंगों का टूटना, पर्व अस्थियो मे शूल रहता है । बीच-बीच मे पार्श्वशूल, कुक्षिशूल, बस्तिशूल, हृदयशूल, पृष्ठशूल,
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४६
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४६ त्रिकशूल या इनका जकड़ाव हो जाता है। रोगी निरन्तर चिन्ताशील और अत्यन्त आलसी होता है । जन्मकाल से ही लेकर गुदा-मार्ग के बन्द होने के कारण अपानवायु ऊपर की ओर आकर समान वायु, प्राण वायु, व्यान वायु, उदान वायु तथा पित्त ओर कफ को प्रकुपित कर देती है। ये पाचो वायुए तथा पित्त और कफ कुपित होकर अर्श-रोगी मे वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य रोगो को उत्पन्न करने है । इस प्रकार से सहज अर्शों का वर्णन किया जा चुका है ॥ ८ ॥ अत ऊर्ध्वं जातस्योत्तरकालजानि व्याख्यास्यामः ॥ ६ ॥ इसके आगे बालक की उत्पत्ति के पीछे होने वाले अर्श रोग की व्याख्या करते है ॥ ॥ ६ ॥ गुरु-मधुर-शीताभिष्यन्दि-विदाहि-विरुद्धाजीर्ण-प्रमिताशनासात्म्य- भोजनाद् गव्य-मात्स्य-कुक्कुट-वाराह-माहिषाजाविक-पिशित-भक्षणात् कृश-शुष्क-पूतिमास-पैष्टिक-परमान्न-क्षीर-मन्दक-दधि-तिल-गुड-विकृति- सेवनाच्च माप-यूषेशु-रस-पिण्याक-पिण्डालुक-शुष्क-शाक-शुक्त-लशुन-- किलाट-पिण्डक-बिस-मृणाल-शालूक-क्रौञ्चादन-कशेरुक-शृङ्गाटक-तरुण- विरूढ-नवधान्याममूलकोपयोगाद् गुरु-फल-शाक-राग-हरितक-मर्दक- वसा-शिरस्पंद-पर्युषित-पूति-शीत -संकीर्णान्नाभ्यवहरणान्मन्दक्रा तिकक्रान्त- मद्य-पानाद् व्यापन्न-गुरु-सलिल-पानादतिस्नेह-पानादसंशोधनाद्वस्तिकर्म- विभ्रमादव्यवायाद्दिवास्वप्नात्सुखशयनासनोपसेवनाच्चोपहताग्नेर्मलोपच- यो भवत्यतिमात्रम् । गुरु, मधुर, शीतल, अभिष्यन्दी, विदाही, विरुद्ध, अजीर्ण, प्रमिताशन, ( एक रस के भोजन से ), असात्म्य भोजन के कारण, गाय, मत्स्य, कुक्कुट, वराह (शूकर ), महिष ( भैसा ), बकरी, भेड इन पशुओ के मास के भक्षण से, कृश और शुष्क प्राणी का मास खाने से, सडे, दुर्गन्धयुक्त मास से, पिष्ठी से बने अन्न का, परमान्न को, दूध, दही, दधिमण्ड, तिल, गुड से बने पदाथौ के सेवन से, उडद, गन्न के रस, पिण्याक ( खल ), पिण्डालु ( कचालु ), शुष्क शाक, शुक्त, लहसुन, किलाट ( फटा हुआ दूध ), तक्रपिण्डक ( तक्र कूर्चिका अथवा तक्र का घना भाग ), बिस, मृणाल, शालूक ( कन्द ), क्रोञ्चा- दन, कसेरू, सिंघाडा, तरुण ( कच्चे ), अविरूढ ( अंकुरित ), नव ( नये ) शूक-धान्य, शमी-धान्यो के सेवन से, कच्ची मूली के खाने से, गुरु फल, गुरु- शाक के खाने से, राग ( रायता षाडव ), हरित ( आर्द्रक आदि ), करमर्द, वसा, शिरस्पद, पर्युषित (बासी), पूति (दुर्गन्धयुक्त), शीतल, सकीर्ण
५५० चरकसंहिता [ अ० १४ (नाना द्रव्य से मिलकर बना मिश्र-प्रकृतिक), अन्न के प्रयोग करने से, मन्दक दधि, अतिक्रान्त (व्यापन्न, दूषित) मद्य के पान करने से, दूषित और भारी पानी के पीने से, अति स्नेहपान से, शरीर शुद्धि न करने से, बस्तिकर्म के मिथ्यायोग से, मैथुन के सर्वथा अभाव से, दिन मे सोने से, सुखकारक शय्या, आसन और स्थान के सेवन से, मन्द अग्निवाले पुरुष मे मल की वृद्धि अति मात्रा मे होती है ॥ तथोत्कटुक-विषम-कठिनासन-सेवनादुद्भ्रान्तयानोष्ट्रयानादतिव्य- वायाद्बस्तिनेत्रासम्यक्प्रणिधानाद् गुदक्षणनादभीक्ष्णं शीताम्बुसंस्पर्शा- च्चेलोष्टतृणादि घर्षणात्प्रततातिनिर्बहणाद् वातमूत्रपुरीषवेगोदीरणात्स- मुद्तीर्णवेगविनिग्रहात्स्त्रीणा चाऽऽमगर्भभ्रंशाद् गर्भोत्पीडनाद् बहुविषम- प्रसूतिभिश्च प्रकुपितो वायुरपानस्तं मलमुपचितमधोगममासाद्य गुद- वलिष्वाधत्ते, ततस्तास्वर्शांसि प्रादुर्भवन्ति ॥ १० ॥ इसी प्रकार से उत्कट आसन, विषम या कठिन आसन के सेवन से, विक्षो- भकारक पान से, ऊँट की सवारी से, अतिमैथुन से, बस्ति-नेत्र के मिथ्यायोग से, गुदा मे क्षत होने से, ठण्डे पानी के स्पर्श से, वस्त्र, ढेला, तिनके आदि से घसड़ लगने पर, निरन्तर वेगपूर्वक प्रवाहण से, अनुपस्थित वायु, मूत्र, मल को जोर से प्रवाहण करने से, उपस्थित मल मूत्र के वेगो को रोकने से, स्त्रियो मे आम-गर्भ के गिरने से, प्रवृद्ध गर्भ द्वारा उत्पीडन होने से, विषम प्रसूति (अकाल- प्रसव) से, प्रकुपित अपानवायु अधोगत मल (दोष) को गुदवलियो मे एक त्रत कर देते है। इससे गुदवलियो मे अर्श उत्पन्न हो जाते है ॥१०॥ सर्षप-मसूर-माष-मुद्ग-कुष्ठक-यव-कलाय-पिण्डि-टिण्टिकेर-खर्जूर-कर्क- न्धु-काकणन्तिका-बिम्बी-बदर-करीरोदुम्बर-जाम्बव-गोस्तनाङ्गुष्ठ-कशेरु- क-शृङ्गाटक-शृङ्गी-दक्ष-शिखि-शुकतुण्ड-जिह्वा-पद्ममुकुल-कर्णिका-संस्था- नानि सामान्याद्वातपित्तकफप्रबलानि ॥११॥ उत्पत्ति के पीछे उत्पन्न होने वाले वात, पित्त और कफजन्य तथा द्वन्द्वज अर्श सामान्यरूप से—सरसो, मसूर, उड़द, मोठ, जौ, मटर, पिण्ड (पिण्डा- कार), टिण्टिकेर (टेटु), केवुक, तिन्दुक, काकणन्तिका (काकदन्तिका, रत्ती), कर्कन्धु (बेर), कदर (श्वेत खदिर), बिम्बी फल, करीर, गूलर, खजूर, जामुन, गाय के स्तन, अगूठा, कशेरू, सिंघाड़ा, कुक्कुट, मोर, तोते की चोच के समान तथा जीभ की भाति, कमल के डोडे के समान और कर्णिका (पद्मकर्णिका) के समान आकार के अर्श होते है ॥११॥
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५५१
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५५१ तेषामयं विशेषः- शुष्क-म्लान-कठिन-परुष-रूक्ष-श्यावानि तीक्ष्णा- ग्राणि वक्राणि स्फुटितमुखानि विषमविस्तृतानि शूलाक्षेप-तोद-स्फुरण- चिमिचिमासंहर्षणापरीतानि स्निग्धोष्णोपशमानि प्रवाहिकाध्मान-शिश्न- वृषण-बस्ति-वङ्क्षण-हृद्ग्रहाङ्गमर्द-हृदय-द्रव-प्रबलानि प्रतत-विबद्ध-वात- मूत्र-वर्चासि कठिन-वर्चस्यूरु-कटी-पृष्ठ-त्रिक-पार्श्व-कुक्षि-बस्ति-शूल-शिरो- ऽभिताप-क्षवथूद्गार-प्रतिश्याय-कासोदावर्तायास-शोष-शोथ-मूर्च्छारो- चक-मुखवैरस्य-तैमिर्य-कण्डू-नासा-कर्ण-शङ्ख-शूल-स्वरोपघात-कराणि श्यावारुण-परुष-नख-नयन-वदन-त्वङ्-मूत्र-पुरीषस्य वातोल्बणान्यर्शां- सीति विद्यात् ॥१२॥ इन वातादिजन्य अर्शो की विशेषता यह है—जो अर्श शुष्क, म्लान ( मुरझाये ), कठिन, परुष ( कर्कश ), रूक्ष, श्याव वर्ण के हो, आगे से तीक्ष्ण, टेढे, फटे ( विदीर्ण ) मुख वाले, विषम रूप मे फैले हो, जिनमे शूल, आक्षेप, भेदन, स्फुरण, चिमिचिमायन ( सरसो या राई के लेप के समान वेदना ) और सहर्ष ( खाज ) होती हो, स्निग्ध ओर उष्ण उपचार से शान्त हो जाये, प्रवा- हिका, आध्मान, शिश्नग्रह ( रोगी लिग का खींचे, या पकड़े ), वृषण-ग्रह, बस्ति- ग्रह, वक्षण-ग्रह, हृदय-ग्रह ( इनका जकड़ जाना या इनमे वेदना होना ), अगों का टूटना, हृदय का जल्दी-जल्दी चलना, वायु, मल, मूत्र का सदा अवरोध रहना, जाघ, कटि, पीठ, पार्श्व, कुक्षि तथा बस्ति मे शूल रहना, शिरोवेदना, छीक आना, उद्गार-प्रवृत्ति, प्रतिश्याय, कास, उदावर्त्त, आयाम ( वात रोग ) शोष, शोथ, मूर्च्छा, अरुचि, मुख की विरसता, तैमिर्य ( तिमिर नामक नेत्र रोग ), नासिका मे खाज, कर्णशूल, शखशूल, स्वरभेद, त्वचा, नख, आखे, मुख, मल और मूत्र का श्याव या अरुण ( नीला या लाल ) वर्ण, इनमे कठोरता का होना वात प्रधान अर्शो के लक्षण है ॥१२॥ भवतश्चात्र—कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च। प्रमिताल्पाशनं तीक्ष्णमद्यमैथुनसेवनम् ॥ १३ ॥ लङ्घनं देशकालौ च शीतौ व्यायामकर्म च । शोको वातातपस्पर्शो हेतुर्वातार्शसामिति ॥ १४ ॥ वातजन्य-अर्श के कारण—कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, लघु और शीतल प्रमित ( एक ही रस का सेवन ) और अल्प भोजन करने से, तीक्ष्ण मद्य से, मैथुन से, उपवास से, शीत देश मे वास वा शीत काल से, व्यायाम से, शोक से, वायु, धूप के स्पर्श से वातजन्य-अर्श उत्पन्न होते है ॥१३-१४॥
५५२ चरकसंहिता [ अ० १४ तत्र यानि मृदु-शिथिल-सुकुमाराणि स्पर्शासहानि रक्त-पीत-नील- कृष्णानि स्वेदोपक्लेदबहुलानि विस्रगन्धीनि तनु-पीत-रक्त-स्रावीणि दाह- कण्डू-शूल-निस्तोद-पाकवन्ति शिशिरोपशयानि संभिन्नपीतहरितवर्चांसि पीत-विस्रगन्ध-प्रचुर-विण्मूत्राणि पिपासाज्वरतमकसंमोहभोजनद्वेषकरा- णि पीत-नख-नयन-त्वङ्-मूत्र-पुरीषस्य पित्तोल्बणान्यर्शांसीति विद्यात् १५॥ पित्तप्रधान-अर्शों के लक्षण—जो अर्श कोमल, शिथिल, सुकुमार, स्पर्श को न सहन करने वाले, लाल, पीले, नीले, काले जिनमें पसीना और क्लिन्नता बहुत रहती हो, जिनसे सड़ी, आम गन्ध आती हो, पतला, पीला रक्त जिनसे बहता हो, रक्तस्राव होता हो, जिनमें जलन, कण्डू ( खाज ), शूल, तोद, वेदना तथा पाक हो, जो शीत क्रिया से शान्त हो जाये, जिनमें पतला ( भिन्न ), पीला, हरा मल आता हो, जिनमें मल मूत्र पीले वर्ण तथा बुरी गन्ध का और मात्रा मे बहुत हो, रोगी को प्यास, ज्वर, तमक, श्वास, संमोह ( मूर्च्छा ) तथा भोजन से द्वेष रहता हो, नख, आखे, त्वचा, मल, मूत्र पीले हों तो पित्तप्रधान-अर्शों को समझना चाहिये ॥ १५ ॥ भवतश्चात्र—कट्वम्ललवणक्षारव्यायामाग्न्यातपप्रभाः । देशकालावशिशिरौ क्रोधो मद्यमसूयनम् ॥ १६ ॥ विदाहि तीक्ष्णमुष्णं च सर्वपानान्नभेषजम् । पित्तोल्बणानां विज्ञेयः प्रकोपे हेतुरर्शसाम् ॥ १७ ॥ कारण—कटु, अम्ल, लवण, क्षार, व्यायाम, अग्नि, धूप, और प्रभा ( ज्योति ), उष्ण देश, उष्ण काल, क्रोध का आना, मद्य, असूया (परनिन्दा), विदाही, तीक्ष्ण और उष्ण प्रकृति का सब खानपान, पित्तप्रधान-अर्शो का प्रकोपक कारण है ॥ १६-१७-॥ तत्र यानि प्रमाणवन्त्युपचितानि श्लक्ष्णानि स्पर्शासहानि श्वेतपाण्डु- पिच्छिलानि स्तब्धानि गुरूणि स्तिमितानि सुप्तसुप्तानि स्थिरश्वयथूनि कण्डूबहुलानि प्रतत-पिञ्जर-श्वेत-रक्त-पिच्छलास्रावीणि गुरु-पिच्छिल-श्वेत- मूत्र-पुरीषाणि रूक्षोष्णोपशयानि प्रवाहिकातिमात्रोत्थानवड्क्षणाहव- न्ति परिकर्तिका-हल्लास-निष्ठिविका-कासारोचक-प्रतिश्याय-गौरव-च्छर्दि- मूत्र-कृच्छ्र-शोष-शोथ-पाण्डु-रोग-शीत-ज्वराश्मरी-शर्करा-हृदयेन्द्रियास्यो- पलेपास्यमाधुर्य-प्रमेह-कराणि दीर्घकालानुपशयान्यतिमात्रमग्नि-मार्दव- क्लैब्य-कराण्याम-विकार-प्रबलानि गुरूणि च शुक्ल-नख-नयन-वदन-त्वङ्- मूत्र-पुरीषस्य श्लेष्मोल्बणार्शांसीति विद्यात् ॥ १८ ॥
अ० १४ । चिकित्सितस्थानम् ५५३
अ० १४ । चिकित्सितस्थानम् ५५३ कफप्रधान-अर्शों के लक्षण—जो अर्श बहुत बडे प्रमाण के ( बढे हुए ), चिकने, स्पर्श को सहने वाले, स्निग्ध, श्वेत, पाण्डु और चिक्कन ( पिच्छिल ), स्तब्ध ( जड़ी भूत ), भारी, स्तिमित ( गीले वस्त्र से ढपे हुए के समान ), अति सुप्त ( स्पर्श ज्ञान से रहित ), स्थिर, शाथयुक्त जिनमे बहुत खाज हो, जिनमे स्राव मात्रा मे अधिक तथा निरन्तर आये, स्राव, धूमर, श्वेत, लाल, शुक्र, पिच्छा ( सीम्बल के गाद के समान ) जैसा हो, मल और मूत्र, भारी, पिच्छिल और श्वेतवर्ण हो, रुक्ष और उष्णक्रिया से जिनमे शान्ति होती हो, प्रवाहिका बार-बार उठ कर बैठना ( थोडा मल बाहर आये ), वक्षणो मे आनाह हो, परिकर्त्तिका, जी मचलाना, निष्ठीवन ( थूक का आना ), कास, अरुचि, प्रतिश्याय, भारीपन, छर्दि, मूत्रकृच्छ्र, शोष, शोथ, पाण्डुरोग, शीत ज्वर, अश्मरी, शर्करा, हृदय-उपलेप, इन्द्रिय उपलेप ( कफाधिकता ), मुख मे मधुर रस, प्रमेह-रोग का होना, दीर्घ काल तक रहने वाली अग्नि की अति- मन्दता, क्लीबता को करने वाले, आमजन्य प्रा उठ रोगो को पैदा करने वाले, नख, नयन, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का वर्ण श्वेत होता है, इन अर्शों को कफप्रधान-अर्श समझना चाहिये ॥ १८ ॥ भवन्ति चात्र-मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च । अव्यायामो दिवास्वप्नः शय्यासनसुखे रतिः ॥ १६ ॥ प्राग्वातसेवा शीतो च देशकालावचिन्तनम् । श्लैष्मिकाणां समुद्दिष्टमेतत्कारणमर्शसाम् ॥ २० ॥ कारण—मधुर, स्निग्ध, शीतल, लवण, अम्ल, गुरु भोजनो के सेवन से, व्यायाम न करने से, दिन मे सोने से, शय्या-सुख, आसन-सुख की प्रवृत्ति, जोर की सीधी वायु का सेवन, शीतल देश, शीतल काल, चिन्ता न करना ये कफजन्य अर्शरोग के कारण है ॥ १६-२० ॥ हेतुलक्षणसंसर्गाद्विद्याद् द्वन्द्वोल्बणानि च । सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणां सहजैर्लक्षणं समम्१ ॥ २१ ॥ उपरोक्त दो कारण ओर लक्षणो के मिलने से द्वन्द्वज-अर्श ( वात, पित्तो- ल्बण, वात, श्लेष्मोल्बण, पित्तश्लेष्मोल्बण ) उत्पन्न होते है । तीनों दोषो के मिलने से सन्निपातजन्य अर्श-रोग उत्पन्न होते है, इसके लक्षण सहज ( गर्भ शरीर के साथ उत्पन्न ) अर्श के समान होते है ॥ २१ ॥ १ 'लक्षणैः समम्' इति वा पाठः ।
५५४ चरकसंहिता [ अ० १४ विष्टम्भोऽन्नस्य दौर्बल्यं कुक्षेराटोप एव च । कार्श्यमुद्गारबाहुल्यं सक्थिसादोऽल्पविट्कता ॥ २२ ॥ ग्रहणीदोषपाण्ड्वर्तेराशङ्का चोदरस्य च । पूर्वरूपाणि निर्दिष्टान्यर्शसामभिवृद्धये ॥ २३ ॥ पूर्वरूप—अन्न का विष्टम्भ, दुर्बलता, कुक्षि मे वेदनायुक्त गुड़-गुड़ शब्द, शरीर मे कृशता, डकार का अधिक आना, टागो मे दर्द, मल का थोड़ा आना, ग्रहणी-रोग या पाण्डु-रोग की शका ( सम्भावना ), अथवा उदररोग की आशका होना ये अर्शरोग की उत्पत्ति के पूर्वरूप है ॥ २२-२३ ॥ अशांसि खलु जायन्ते नासन्निपतितैस्त्रिभिः । दोषैर्दोषविशेषान्तु विशेषः कल्प्यतेऽर्शसाम् ॥ २४ ॥ अर्श-रोग तीनो दोषो क सन्निपात से ही उत्पन्न होते है । सब अर्श त्रिदोष- जन्य ही है । किन्तु दोष विशेष की प्रधानता से ही इनको वातजन्य, पित्तजन्य या कफजन्य कहा जाता है ॥ २४ ॥ पञ्चात्मा मारुतः पित्तं कफो गुदवलित्रयम् । सर्वे एव प्रकुप्यन्ति गुदजाना समुद्भवे ॥ २५ ॥ तस्मादर्शासि दुःखानि बहुव्याधिकराणि च । सर्वदेहोपतापानि प्रायः कृच्छ्रतमानि च ॥ २६ ॥ प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान पाच प्रकार की वायु, पित्त, कफ और गुदा की तीनों वलिया अर्श-रोग की उत्पत्ति मे कुपित हो जाती हैं । इसी कारण से अर्श-रोग अतिदु ख देने वाला, नाना रोगो को उत्पन्न करने वाला, सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने के साथ-साथ अतिकृच्छ्रसाध्य होता है ॥ २५-२६ ॥ हस्ते पादे मुखे नाभ्या गुदे वृषणयोस्तथा । शोथो हृत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ २७ ॥ हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुग्ज्वरः । तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ २८ ॥ सहजानि त्रिदोषाणि यानि चाभ्यन्तरा वलिम् । जायन्तेऽशांसि संश्रित्य तान्यासाध्यानि निर्दिशेत् ॥ २९ ॥ असाध्यता—जिस व्यक्ति के हाथ, पाव, मुख, नाभि, गुदा, अण्डकोश मे शोथ हो जाये, रोगी को हृदयशूल, पार्श्वशूल हो वह अर्श-रोगी असाध्य है । हृदयशूल, पार्श्वशूल, मूर्च्छा, वमन, अगों मे दर्द, ज्वर, तृष्णा और गुदा का
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५५ पाक ये अर्श रोगी को मार देते हैं, इन लक्षणों वाला रोगी असाध्य है । जो अर्श सहज (गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न हुए), सन्निपातजन्य तथा भीतर की वलि मे आश्रित होते है, वे सब असाध्य होते है ॥ २७-२६ ॥ शेषत्वादायुषस्तानि चतुष्पादसमन्विते । याप्यन्ते दीप्तकायाग्नेः प्रत्याख्येयान्यतोऽन्यथा ॥ ३० ॥ द्वन्द्वजानि द्वितीयायां वलो यान्याश्रितानि च । कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सराणि च ॥ ३१ ॥ असाध्य दो प्रकार के हैं, याप्य और प्रत्याख्येय । यदि रोगी की आयु शेष हो, भिषक्, औषध, रोगी ओर उपचारक ये चारो पाद मिल जाये, रोगी की अग्नि प्रदीप्त हो तो सहज आदि अर्श याप्य है और यदि आयु शेष न हो, चारो पाद न मिले तथा अग्नि मन्द हो तो, 'प्रत्याख्येय' असाध्य हैं ॥३०-३१॥ बाह्याया तु वलौ जातान्येकदोषोल्बणानि च। अर्शांसि सुखसाध्यानि न विरोत्पतितानि च ॥ ३२ ॥ साध्य भी दो प्रकार के है। सुखसाध्य और कष्टसाध्य । जो अर्श द्वन्द्वज तथा दूसरी वलि मे आश्रित हो ओर एक साल पुराने हो जाते है, वे कष्टसाध्य हैं। जो अर्श बाह्य-वलि मे उत्पन्न हो, जिनमे एक दोष की प्रबलता हा और नूतन ही उत्पन्न हुए हो तो वे सुखसाध्य होते है ॥ ३२ ॥ तेषां प्रशमने यत्नमाशु कुर्याद्विचक्षणः । तान्याशु हि गुदं बद्ध्वा कुर्युर्बद्धगुदोदरम् ॥ ३३ ॥ इन अर्शो की शान्ति के लिये वैद्य को शीघ्र ही यत्न करना चाहिये । क्योकि ये अर्श गुदा को रोक कर शीघ्र ही बद्धगुदोदर-रोग को उत्पन्न कर देते है ॥ ३३ ॥ तत्राऽऽहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम् । दाहं क्षारेण चाप्येके'दाहमेके तथाऽग्निना ॥ ३४ ॥ अस्त्येतद् भूरितन्त्रेण धीमता दृष्टकर्मणा । क्रियते त्रिविधं कर्म भ्रंशस्तस्य सुदारुणः ॥ ३५ ॥ पुंस्त्वोपघातः श्वयथुर्गुदे वेगविनिग्रहः । आध्मानं दारुणं शूलं व्यथा रक्तातिवर्तनम् ॥ ३६ ॥ पुनर्विरोहो रूढानां छेदो भ्रंशो गुदस्य च । करणं वा भवेच्छिद्रं शस्त्रक्षाराग्निविभ्रमात् ॥ ३७ ॥ चिकित्सा—अर्श की शान्ति के लिये एक वैद्य का कथन है कि शस्त्र से
५५६ चरकसंहिता [ अ० १४ काटना अर्श मे हितकारी है। दूसरे का कथन है कि क्षार से जलाना चाहिये ओर तीसरे का कथन है कि अग्नि से जलाना चाहिये । ये सब बातें सत्य हैं, परन्तु बहुत शास्त्र-ज्ञान से सम्पन्न, शस्त्र-कर्म के अनुभवी, बुद्धिमान् वैद्य ही ये कार्य कर सकते हैं और यदि कदाचित् इन कर्मो मे चूक हो जाये तो अति भयानक फल होता है । जैसे— शस्त्र, क्षार और अग्नि के अयुक्त प्रयोग से—पुरुषत्व का नाश, गुदा मे शोथ, मल का अवरोध, आध्मान ( अफारा ), तीव्र शूल, पीड़ा, अति रक्त स्राव, शस्त्र, क्षार, अग्नि से कट जाने पर भी पुनः उत्पत्ति, भर जाने पर क्लेद, गुद भ्रश अथवा शीघ्र मृत्यु हो जाती है ॥ ३४-३७ ॥ यत्तु कर्म सुखोपायमल्पभ्रंशमदारुणम् । तदर्शासां प्रवक्ष्यामि समूलानां निवृत्तये ॥ ३८ ॥ इसलिये जो कर्म सुखपूर्वक हो सकता है, जिसमे थोड़ी सी भूल होने पर भी भयानक फल नही होता, अर्श रोग का मूल नाश करने के लिये इस प्रकार के कर्म का उपदेश करता हू ॥ ३८ ॥ वातश्लेष्मोल्बणान्याहुः शुष्काण्यर्शासि तद्विदः । प्रस्रावीणि तथाऽऽर्द्राणि रक्तपित्तोल्बणानि च ॥ ३६ ॥ तत्र शुष्कार्र्शासा पूर्व प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् । अर्श-रोग को जानने वालो का कहना है कि वातप्रधान या कफप्रधान अर्श शुष्क होते है। पित्तप्रधान या रक्तप्रधान अर्श स्रावयुक्त और आर्द्र होते हैं। [सुश्रुत ने रक्तजन्य अर्श को माना है, चरकमे पित्तजन्य अर्श मे ही इसका अन्त- र्भाव किया है ]। इसलिये प्रथम शुष्क अर्शो की चिकित्सा को कहता हूँ ॥३६॥ स्तब्धानि स्वेदयेत्पूर्व शोफशूलान्वितानि च ॥ ४० ॥ चित्रकक्षारबिल्वानां तैलेनाभ्यज्य स्वेदयेत् १ । यवमाषपुलाकानां कुलत्थानां च पोट्टलैः ॥ ४१ ॥ गोखराश्वशकृत्पिण्डैस्तिलकल्कैस्तुपेस्तथा । (१) इसके लिये बुद्धिमान् वैद्य का चाहिये कि शोथ और शूल से युक्त कठोर अर्शों को प्रथम चित्रक क्षार, बिल्व के कल्क से साधित तेल से चिकने करके, जौ, माष, कुलत्थि, पुलाक (जिनसे चावल नही निकाले ऐसे धान्यो ) की पोटलियो से, गाय, घोड़ा, गधा इनके लीद के पिण्डा से, तिल कल्क से और तुष से और वच, सौफ इनके कल्क को पिण्डाकार करके, स्नेह से युक्त करके मन्द २ गरम स्वेद देना चाहिये ॥ ४०-४२- ॥ १. 'बुद्धिमान्' इति वा पाठः ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५७
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५७ वचाशताह्वापिण्डैर्वा सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः ॥ ४२ ॥ सक्तूनां पिण्डिकाभिर्वा स्निग्धाना तैलसर्पिषा । शुष्कमूलकपिण्डैर्वा पिण्डैर्वा कार्ष्णगन्धिकैः ॥ ४३ ॥ रास्नापिण्डैः सुखोष्णैर्वा न्स्नेहैर्हपुषेपरपि । इष्टकस्य खराह्वायाः शाकैर्गृञ्जनकन्य च ॥ ४४ ॥ अभ्यज्य कुष्ठतलेन स्वेदयेत्पोट्टलीकृतः । वृषाकैरण्डबिल्वाना पत्रोत्काथैश्च सेचयेत् ॥ ४५ ॥ ( २ ) तैल और घी यमक से स्निग्ध सत्तूआ की पिण्डकाओ ( पोटलियो से ), सूखी मूली के कल्क मे बनी पोटली से शोभाजन की छाल से बनी पोटली से, रास्ना के पिण्ड से, हउबेर के पिण्ड से मीठा मोटा-गरम सेक करना चाहिये । प्रथम कूठ के तैल से मालिश करके इष्टक ( एरण्ड ) के, खराहा (अजवायन, यवानी ) के या गृञ्जनक के शाक की पाटला बना कर मीठा-मीठा गरम सेक करना चाहिये । इसी प्रकार बासा, आक, एरण्ड, बिल्व इनके पत्तो को पका करके उस जल से परिशेक करना चाहिये ॥४२-४५॥ मूलकत्रिफलार्काणा वेणूना वरुणस्य च । अग्निमन्थस्य शिग्रोश्च पत्रान्यश्मन्तकस्य च ॥ ४६ ॥ जलेनौत्क्वाथ्य शूलार्त स्वभ्यक्तमवगाहयेत् । कोलोत्क्वाथेऽथवा कोष्णे सौवीरकतुषोदके ॥ ४७ ॥ बिल्वोत्क्वाथेऽथवा तक्रे दधिमण्डाम्लकाञ्जिके । गोमूत्रे वा सुखोष्णे तं शूलार्तमुपवेशयेत् ॥ ४८ ॥ ( ३ ) अर्श-रोगी को यदि शूल हो तो प्रथम भली प्रकार से तैल की मालिश कराके फिर त्रिफला, मूली, बास, वरुण ( वरना ), अग्निमन्थ, सहजन और अश्मन्तक के पत्तों का कल्क करक जल मे उबालना चाहिये । रोगी को इस क्वाथ मे अवगाहन ( बैठाना ) कराना चा हये । इसी प्रकार शुष्क बेर के क्वाथ मे या कवोष्ण सौवीरक काजी मे या तुषादक मे, बिल्व के क्वाथ मे छाछ मे, दधि-मस्तु मे, खट्टी काजी मे, गोमूत्र मे, (कसी एक वस्तु मे) अव- गहन कराना चाहिये । इन वस्तुओ का सुहाता गरम रखना चाहिये ॥४६-४८॥ कृष्णसर्पवराहोष्ट्रजलौकावृषदंशजाम् । वसामभ्यञ्जन दद्याद् धूपनं चार्शसां हितम् ॥ ४६ ॥ नृकेशाः सर्पनिर्मोको वृषदंशस्य चर्म च । अर्कमूलं शमीपत्रमर्शोभ्यो धूपनं हितम् ॥ ५० ॥
५५८ चरकसंहिता [अ० १४ तुम्बुरूणि विडङ्गानि देवदार्वक्षता घृतम् । बृहती चाश्वगन्धा च पिप्पल्यः सुरसा घृतम् ॥ ५१ ॥ वराहवृषद्विट् चैव धूपनं शक्तवो घृतम् । कुञ्जरस्य पुरीषं च घृतं सर्जरसो रसः ॥ ५२ ॥ (४) धूपन—काला साप, सुअर, ऊट, जोंक, वृषदंश (बिल्ली) इनकी वसा से अर्शों को स्निग्ध करके धूपन देना चाहिये¹ । (१) धूपन के लिये पुरुषो के बाल, साप की केचुली, बिल्ली की त्वचा, आक की जड़, शमी (खेजडा) वृक्ष के पत्ते हितकारी है। इन वस्तुओ को घी के साथ बरतना चाहिये² । (२) तुम्बरू, बायविडग, देवदारु, अक्षत और घी इनका धूपन देना चाहिये । (३) बड़ी कटेरी का फल, असगन्ध, पिप्पली, तुलसी और घी इनका धूपन देना चाहिये । (४) सुअर की विष्ठा, बिल्ली की विष्ठा, सत्तू और घी इनका धूप देना चाहिये । (५) हाथी की विष्ठा, घी और राल इनका धूप देना चाहिये । धूपन के लिये पाच याग है ॥४६-५२॥ हरिद्राचूर्णसंयुक्तं सुधाक्षीरं प्रलेपनम् । गोपित्तपिष्टाः पिप्पल्यः सहरिद्राः प्रलेपनम् ॥ ५३ ॥ शिरीषबीजं कुष्ठं च पिप्पल्यः सैन्धवं गुडः । अर्कक्षीरं सुधाक्षीरं त्रिफला च प्रलेपनम् ॥ ५४ ॥ पिप्पल्यश्चित्रकः श्यामा किण्वं मदनतण्डुलाः । प्रलेपः कुक्कुटशकृद्धरिद्रागुडसंयुतः ॥ ५५ ॥ निकुम्भः सामृतासङ्गः पारावतशकृद्गुडः । प्रलेपः स्याद् गजास्थीनि निम्बो भल्लातकानि च ॥ ५६ ॥ प्रलेपः स्यादलर्केण वासन्तकवसायुतः । शूलश्वयथुहृद्युक्तश्शुलुकीवसायाऽथवा ॥ ५७ ॥ आर्कं पयः सुधाकाण्ड कटुकालाबुपल्लवाः । करञ्जो बस्तमूत्रं च लेपनं श्रेष्ठमर्शसाम् ॥ ५८॥ (५) आठ प्रलेप—(१) हल्दी के चूर्ण को थोर के दूध मे मिला कर १ कहीं २ पर 'जलौका' के स्थान पर 'जतुका' पाठ है जिससे मकड़ी लेना । वाग्भट मे 'जलौका' पाठ है । यथा—'कृष्णाहिबिडालोष्ट्रजलौकाशूकर- वसाभिर्वा अभ्यज्य।' २ वाग्भट मे यह योग इस प्रकार से पढ़ा है—'धूपयेच्च सघृतशमीपत्रार्क- मूलमानुषकेशाहिनिर्मोकबिडालचर्मभिः इससे घी लेना चाहिये ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५६ अर्श पर लेप करना चाहिये । ( २ ) पिप्पली और हल्दी को गाय के पित्त मे पीस कर लेप करना चाहिये । ( ३ ) सिरस के बीज, कूठ, पिप्पली, सैन्धा नमक गुड़ और त्रिफला समान भाग लेकर इनको आक के दूध और थोर के दूध मे मिला कर लेप करना चाहिये । ( ४ ) पिप्पली, चीता, निशोथ, किण्व ( सुरा- बीज ), मैनफल के बीज, मुर्गे की विष्ठा, हल्दी इनको गुड़ मे मिला कर लेप करना चाहिये । ( ५ ) दन्ती, निशोथ, अमृतासङ्ग ( तुत्थ ), कबूतर की विष्ठा, गुड़, हाथी की अस्थिया ( इनकी भस्म ), निमोली और भिलावा सब को पीस कर लेप करना चाहिये । ( ६ ) आल ( हरिताल ) को वासन्तक ( ऊट ) की वसा मे मिला कर सुहाता हुआ गरम लेप करना चाहिये । ( ७ ) चुलुकी ( शिशुमार ) की वसा के साथ मिला कर हरिताल का लेप करने से शूल ओर सूजन मिटती है । ( ८ ) आक के पत्ते, थोर का दण्डा, कडुवी तुम्बी के पत्त करज इनको बकरी के मूत्र मे पीस कर लेप करना चाहिये ॥ ५३-५८ ॥ अभ्यङ्गाद्याः प्रदेहान्ता य एते परिकीर्तिताः । स्तम्भश्वयथुकण्डूर्त्तिशमनास्तेऽशेषा मताः ॥ ५६ ॥ प्रदेहान्तैरुपक्रान्तान्यर्शांसि प्रस्रवन्ति हि । संचितं दुष्टरुधिरं ततः संपद्यते सुखम् ॥ ६० ॥ अभ्यङ्ग से लेकर प्रदेह तक जितने भी योग कहे है, ये सब स्तम्भता, सूजन कण्डू को शान्त करते है, इसलिये अर्श-रोगियो के लिये हितकारी है । क्योकि प्रदेह तक वर्णित चिकित्सा द्वारा अर्शों मे संचित दुष्ट रक्त बहने लग जाता है, इसलिये रोगी को आराम मिलता है ॥ ५६-६० ॥ शीतोष्णस्निग्धरूक्षैर्हि न व्याधिरुपशाम्यति । रक्ते दुष्टे भिषक् तस्माद्रक्तमेवावसेचयेत् ॥ ६१ ॥ रक्त के दूषित होने पर शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्षकिया से अर्श रोग शान्त नहीं होता । इसलिये रक्त का निःसारण ही करना चाहिये १ । इसके लिये रक्त और पित्त के प्रकोप कारण समान है, पित्त प्रकोप से ही रक्त का प्रकोप समझना चाहिये ॥ ६१ ॥ जलौकाभिस्तथा शस्त्रैः सूचीभिर्वा पुनः पुनः । आवर्तमानं रुधिरं रक्ताशौभ्यः प्रवाहयेत् ॥ ६२ ॥ १ सुश्रुत ने रक्तज अर्श को भी माना है यथा— ‘षडर्शांसि भवन्ति वात-पित्त-कफ-शोणित-सन्निपातैः, सहजानि च ।’
५६० चरकसंहिता [ अ० १४ ( ६ ) जोक द्वारा, शस्त्र द्वारा अथवा सूई द्वारा बार बार रक्त को जो कि रक्त अभ्यगादि क्रिया से नहा निकलता निकालना चाहिये ॥ ६२ ॥ गुदश्वयथुशूलात्ते मन्दाग्नि पाययेत्तु तम् । त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं पाठा हिङ्गु शचीत्रकम् ॥ ६३ ॥ सौवर्चलं पुष्कराख्यमजाजीं विल्वपेशिकाम् । बिडं यवानी हपुषा विडङ्गं संव्यचं वचाम् ॥ ६४ ॥ तिन्तिडीकं च मण्डेन मद्येनोष्णोदकेन च । तथाऽर्शोग्रहणीदोषशूलानोहादिगुच्यते ॥ ६५ ॥ ( ७ ) जिस अर्श रोगी का गुदा मे शोथ, गुदा मे शूल, मन्दाग्नि हो उसको सोठ, मरिच, पिप्पली, पिप्पलीमूल, पाठा, हींग, नीता, संचल पुष्करमूल, जीरा, बिल्व की गिरी, बिड् नमक, अजवाइन, हपुवेर, बायविडग, सैन्धा नमक, वच और इमली इन अठारह वस्तुओ का समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को मण्ड ( दधि वस्तु ), मद्य या गरम पानी के साथ देना चाहिये । इससे अर्श, ग्रहणीरोग, शूल, आनाह शान्त होते है ॥६३-६५॥ कुर्याद्वा पाचनं तस्य यदुक्तं ह्यतिसारिके । सगुदामभया वाऽथ प्राशयेत्तोऽन्नभक्तीकीम् ॥ ६६ ॥ पाययेत् त्रिवृच्चूर्णं त्रिफलाया रसेन वा । हृते गुदाश्रये दोषे गच्छन्त्यर्शासि संक्षयम् ॥ ६७ ॥ ( ८ ) जिन पाचनों को अतिसार-चिकित्सा मे कहगे उनको पिलाना चाहिये । भोजन से पूर्व हरड को गुड़ के समान भाग मे खाना चाहिये । अथवा त्रिफला क्वाथ के साथ निशाथ का चूर्ण देना चाहिये । गुदाश्रित दोष के नष्ट होने पर अर्श स्वय नष्ट हो जाते ह ॥ ६६-६७ ॥ गोमूत्राध्युषिता दद्यात्सगुडा वा हरीतकीम् । हरीतकी तक्रयुता त्रिफला वा प्रयोजयेत् ॥ ६८ ॥ सनागरं चित्रकं वा शीधुयुक्तं प्रयोजयेत् । दापयेच्चव्ययुक्तं१ वा सीधु साजाजिचित्रकम् ॥ ६९ ॥ सुरा वा हपुषापाठा२युक्ता सौवर्चलायुताम् । दधित्थं बिल्वसंयुक्तं युक्तं वा चव्यचित्रकम् ॥ ७० ॥ भल्लातकयुतं वाऽथ प्रदद्यात्तत्र तर्पणम् । १. 'चव्य वा शीधुसंयुक्तमजाजीदीप्यक पिबेत्' इति । २. 'हपुषा पाठा युक्ता' इति च पाठः ।
अ० १४ ] ३६ चिकित्सितस्थानम् ५६१
अ० १४ ] ३६ चिकित्सितस्थानम् ५६१
बिल्वनागरयुक्तं वा यवान्या चित्रकेण च ॥ ७१ ॥ चित्रकं हपुषा हिङ्गु दद्याद्वा तक्रसंयुतम् । पञ्चकोलयुतं वाऽपि तक्रमस्मै प्रदापयेत् ॥ ७२ ॥ ( ६ ) दशयोग—( १ ) गोमूत्र मे रखी हुई हरड को गुड़ के साथ देना चाहिये । ( २ ) तक्र के साथ हरड का अथवा तक्र के साथ त्रिफला का प्रयोग करना चाहिये । (३) सोंठ ओर चीते के चूर्ण को सीधु के साथ पीना चाहिये । (४) जीरा, चीता ओर चव्य के साथ सीधु देना चाहिये । (५) पाठा और हऊ- बेर को संचल नमक के साथ देना चाहिये । (६) दवित्थ (कैथ) को बेलगिरी के साथ अथवा कैथ को चव्य और चित्रक के चूर्ण के साथ देना चाहिये । (७) भिलावे के चूर्ण को सक्तु मन्थ में मिलाकर तक्र के साथ देना चाहिये । (८) बेलगिरी, चीता, सोंठ और अजवायन के साथ तक्र तर्पण देना चाहिये । (६) चीता, हऊबेर, हींग इनको तक्र के साथ देना चाहिये । (१०) पंचकोल (पिप्ली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक ओर सोंठ) को तक्र के साथ देना चाहिये ॥ ६८-७२ ॥ हपुषा कुञ्चिका धान्यमजाजी कारवी शटीम् । पिप्पली पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् ॥ ७३ ॥ यवानी चाजमोदा च चूर्णितं तक्रसंयुतम् । मन्दाम्लकटुकं विद्वान् स्थापयेद् घृतभाजने ॥ ७४ ॥ व्यक्ताम्लकटुकं जातं तक्रारिष्ट मुखप्रियम् । प्रपिबेन्मात्रया कालेष्वन्नस्य तृषितस्त्रिषु ॥ ७५ ॥ दीपन रोचनं वर्ण्य कफवातानुलोमनम् । गुदश्वयथुकण्ड्वर्तिनाशनं बलवर्धनम् ॥ ७६ ॥ इति तक्रारिष्टः । ( १० ) तक्रारिष्ट—हऊबेर, कुञ्चिका ( काला जीरा ), धनिया, अजाजी ( जीरा ), कारवी ( क्षुद्र जीरा ), कचूर, पिप्पली, पिप्पलीमूल, चीता, गज- पिप्पली, अजवायन, अजमोद इन बारह वस्तुओं को परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण का मन्द, अम्ल और कटु-रस तक्र मे मिला कर घी से भावित घड़े मे रख देना चाहिये । इसमे जब अम्लता और कटुरस स्पष्ट दीखने लगे, तब मुख को प्रिय, ऐसा यह तक्रारिष्ट पीना चाहिये । यह अरिष्ट मुखप्रिय, अग्निप्रदीपक, अन्न मे रुचिकारक, वर्ण्य, कफ और वायु का अनुलोमक, गुदा मे शोथ, कण्डू, पीडा का नाशक, बलवर्धक है । इस
५६२ चरकसंहिता [ अ० १४ तक्रारिष्ट को रोगी प्यास लगने पर तथा अन्न के तीनों समय मे आदि, मध्य और अन्त मे अग्निबल के अनुसार पीये ॥ ७३-७६ ॥ त्वचं चित्रकमूलस्य पिष्ट्वा कुम्भं प्रलेपयेत् । तक्रं वा दधि वा तत्र जातमर्शोहरं पिवेत् ॥ ७७ ॥ (११) चित्रकमूल की छाल को पीस कर घडे मे लेप कर देना चाहिये । इसमे जमाई दही या तक्र का उपयोग करने से अर्शरोग मिट जाता है ॥७७॥ वातश्लेष्मार्शसा तक्रात्परं नास्तीह भेषजम् । तत्प्रयोज्यं यथादोषं सस्नेहं रूक्षमेव वा ॥ ७८ ॥ सप्ताहं वा दशाहं वा पक्षं मासमथापि वा । (१२) वातकफजन्य अर्शरोग के लिये तक्र से उत्तम कोई भी औषध नहीं है । दोषानुसार तक्र को स्नेहयुक्त या रूक्ष बरतना चाहिये । वातजन्य अर्श मे स्नेहयुक्त और कफजन्य मे रूक्ष बरतना चाहिये ॥ ७८- ॥ बलकालविशेषज्ञो भिषक्तक्रं प्रयोजयेत् ॥ ७९ ॥ अत्यर्थं मृदुकायाग्नेस्तक्रमेवावचारयेत् । सायं वा लाजशक्तूना दद्यात्तक्रावलेहिकाम् ॥ ८० ॥ जीर्णे तक्रे प्रदद्याद्वा तक्रपेया ससैन्धवाम् ॥ ८१ ॥ तक्रानुपान सस्नेहं तक्रौदनमतः परम् । यूषैर्मांसरसैर्वाऽपि भोजयेत्तक्रसंयुतैः ॥ ८२ ॥ बल और काल को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि अत्यन्त मृदु कायाग्नि वाले रोगी के बल को देख कर सात दिन, बारह दिन, पन्द्रह दिन अथवा एक मास तक रूक्ष या स्नेहयुक्त अन्न के साथ या अन्न के बिना तक्र का ही उपयोग करे १ । सायकाल तक्र मे लाजा-सत्तुओ का अवलेह बना कर देना चाहिये । तक्र के जीर्ण होने पर तक्र से बनाई पेया में सैन्धा नमक मिला कर देना चाहिये । पेया के पीछे थोड़े तक्र मे सिद्ध चावला को थोड़े से स्नेह के साथ देना चाहिये। तक्र मे मिला कर मूग आदि के यूष, मास रस आदि तक्र के अनु- पान से देने चाहिये । इसके उपरान्त तक्र मे सिद्ध यूष या मास रस का भोजन देना चाहिये । इस प्रकार एक मास तक तक्र का प्रयोग करना चाहिये॥७९-८२॥ कालक्रमज्ञः सहसा न च तक्रं निवारयेत् । तक्रप्रयोगो मासान्तः क्रमेणोपरमो हितः ॥ ८३ ॥ १. अष्टागसग्रह मे पाठ इस प्रकार से है—तक्रमेव वातिमन्दवह्नि० सप्ता- 'हार्थमास मासपि वा कालापेक्षया रूक्षं सस्नेहमम्ल वा सान्नमनन्नं वा शील- येत् ॥ अ० स० चि० १० ॥
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६३
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६३ अपकर्षो यथोत्कर्षो न त्वन्नादपकृष्यते । शक्त्यागमनरक्षार्थं दार्ढ्यार्थमनलस्य च ॥ ८४ ॥ काल-क्रम को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि एक मास तक तक्र का प्रयोग करने पर सहसा तक्र को बन्द न करदे, अपितु धीरे-धीरे कम करते हुए एक मास मे जाकर तक्र छुडवाये । जिस क्रम से अपकर्ष होता है, उसी प्रकार से अपकर्ष करना चाहिये । इस घटाव मे अन्न की कमी नही करनी चाहिये । तक्रमे जितनी कमी हो, उतनी ही अन्नमे वृद्धि करनी चाहिये । जिससे रोगी मे शक्ति का सञ्चार हो और अग्नि दृढ हो जाये, तथा शरीर मे बल और वर्ण ( कान्ति ) की वृद्धि होवे, यह क्रम है ॥ ८३-८४ ॥ बलोपचयवर्णार्थमेप निर्दिश्यते क्रमः । रूक्षमर्धोद्धृतस्नेह यतश्चानुद्धृत घृतम् ॥ ८५ ॥ तक्रं दोषाग्निबलवित् त्रिविधं तत्प्रयोजयेत् । दोष, अग्नि और बल को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि रूक्ष ( जिसमे से सम्पूर्ण मक्खन निकाल लिया ), अर्द्धोद्धृत ( आवा मक्खन निकाला हो ), अनुद्धृत ( जिस मे से मक्खन बिलकुल न निकाला गया हो ) ऐसे तीन प्रकार के तक्रों का प्रयोग करे । कफजन्य, मन्दतम अग्नि मे तथा अधम बल मे रूक्ष तक्र, पित्त-जन्य, मन्दतर अग्नि के मध्यम बल मे अर्द्धोद्धृत तक्र, वातजन्य, मन्द अग्नि मे और उत्तम बल मे अनुद्धृत तक्र बरतना चाहिये ॥ ८५- ॥ हतानि न विरोहन्ति तक्रेण गुदजानि तु ॥ ८६ ॥ भूमावपि निषिक्तं तद्दहेत्तक्रं तृणोलुपम् । किं पुनर्दीप्तकायाग्नेः शुष्काण्यार्शासि देहिनः ॥ ८७ ॥ तक्र के कारण मरे हुए अर्श पुनः हरे नही होते । भूमि पर गिरा हुआ भी तक्र तिनका को जला देता है । दीप्ताग्नि वाले पुरुष मे शुष्क अर्शों को जलादे, इसमे क्या सन्देह है ॥ ८६-८७ ॥ स्रोतःसु तक्रशुद्धेषु रसः सम्यगुपैति यः । तेन पुष्टिर्बलं वर्णः प्रहर्षश्चोपजायते ॥ ८८ ॥ वातश्लेष्मविकाराणा शतं चापि निवर्तते । नास्ति तक्रात्पर किचिदौषधं कफवातजे ॥ ८९ ॥ तक्र द्वारा स्रोतों के शुद्ध होने पर अन्न-रस धातुओं में भली प्रकार से पहुचता है । इससे पोषण, बल, वर्ण, आनन्द ( प्रसन्नता ) मिलती है। वात-
५६४ चरकसंहिता [ अ० १४ जन्य अस्सी रोग तथा कफजन्य बीस रोग इस प्रकार से एक सौ रोग तक्र से नष्ट होते है । वातजन्य और कफजन्य रोगो के लिये तक्र से उत्तम और कोई औषध नही है ॥ ८८-८६ ॥ पिप्पली पिप्पलीमूल चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् । शृङ्गवेरमजाजी च कारवी वान्यतुम्बरुम् ॥ ६० ॥ बिल्वं कर्कटकं पाठा पिष्ट्वा पेया विपाचयेत् । फलाम्ला यमकैर्भृष्टा ता दद्याद् गुदजापहाम् ॥ ६१ ॥ एतैरेव खडान् कुर्यादेतैश्चैव पचेज्जलम् । ( १३ ) पिप्पली, पिप्पलीमूल, चित्रक, गजपिप्पली, आर्द्रक, जीरा, क्षुद्र- जीरा ( काली जीरी ), धनिया, तुम्बरू ( धनिये का भेद ), बेलगिरी, कर्कटक ( ककोड़ा ), पाठा इनको पीस कर इनसे पेया बनानी चाहिये । इस पेया को अनार-रस आदि फलों से खट्टी करके तथा तेल आर घी यमक स्नेह से स्निग्ध बना कर पीना चाहिये, ये अर्श-रोग नाशक हैं। इन्ही वस्तुओं से खड ( यूष- भेद ) बनाने चाहिये, इनसे ही जल पकाना चाहिये और इन वस्तुओ से घृत सिद्ध करना चाहिये ॥ ६०-६१ ॥ एतैश्चैव घृतं साध्यमर्शसां विनिवृत्तये ॥ ६२ ॥ शटीपलाशसिद्धां वा पिप्पल्या नागरेण वा । दद्याद्यवागूं तक्राम्लां मरिचैरवचूर्णिताम् ॥ ६३ ॥ शुष्कमूलकयूषं वा यूषं कौलत्थमेव वा । दधित्थबिल्वयूषं वा सकुलत्थमकूष्ठकम् ॥ ६४ ॥ ( १४ ) अर्श-रोग की निवृत्ति के लिये कचूर, ढाक, पिप्पली, सोंठ से सिद्ध यवागू को तक्रसे खट्टी बना कर इसमे मरिच का चूर्ण डाल कर देना चाहिये । सूखी मूली का यूष अथवा कुलत्थो के यूष का या कैथ और बेलगिरी के यूष को अथवा कुलत्थी और मोठ के यूष को देना चाहिये ॥ ६२-६४ ॥ छागलं वा रसं दद्याद्युषैरेतैर्विमिश्रितम् । लावादीना फलाम्लं वा सतक्रं ग्राहिभिर्युतम् ॥ ६५ ॥ उपरोक्तयूषों के साथ बकरे का मास-रस या बटेर आदि पक्षियों का मास- रस मिला कर देना चाहिये । मल संग्राहक बेलगिरी, पाठा आदि के चूर्ण से युक्त, अनार आदि फलों से या तक्र से खट्टा करके यूषों को देना चाहिये ॥६५॥ १ वाग्भट मे कहा भी है—अमद्यपो वा पिबेच्च शृतशीतमल्पमुदक शृत धान्यानागराभ्याम् । लघुना पंचमूलेन वा, पचकोलाजाजीकारवीगजशौण्डीबि- ल्वंशलाठुपाठातुम्बरुधान्यकैर्वा । एभिरेव घृत साधयेत् ।