भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 616 में से

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पृष्ठ 534

५५० चरकसंहिता [ अ० १४ (नाना द्रव्य से मिलकर बना मिश्र-प्रकृतिक), अन्न के प्रयोग करने से, मन्दक दधि, अतिक्रान्त (व्यापन्न, दूषित) मद्य के पान करने से, दूषित और भारी पानी के पीने से, अति स्नेहपान से, शरीर शुद्धि न करने से, बस्तिकर्म के मिथ्यायोग से, मैथुन के सर्वथा अभाव से, दिन मे सोने से, सुखकारक शय्या, आसन और स्थान के सेवन से, मन्द अग्निवाले पुरुष मे मल की वृद्धि अति मात्रा मे होती है ॥ तथोत्कटुक-विषम-कठिनासन-सेवनादुद्भ्रान्तयानोष्ट्रयानादतिव्य- वायाद्बस्तिनेत्रासम्यक्प्रणिधानाद् गुदक्षणनादभीक्ष्णं शीताम्बुसंस्पर्शा- च्चेलोष्टतृणादि घर्षणात्प्रततातिनिर्बहणाद् वातमूत्रपुरीषवेगोदीरणात्स- मुद्तीर्णवेगविनिग्रहात्स्त्रीणा चाऽऽमगर्भभ्रंशाद् गर्भोत्पीडनाद् बहुविषम- प्रसूतिभिश्च प्रकुपितो वायुरपानस्तं मलमुपचितमधोगममासाद्य गुद- वलिष्वाधत्ते, ततस्तास्वर्शांसि प्रादुर्भवन्ति ॥ १० ॥ इसी प्रकार से उत्कट आसन, विषम या कठिन आसन के सेवन से, विक्षो- भकारक पान से, ऊँट की सवारी से, अतिमैथुन से, बस्ति-नेत्र के मिथ्यायोग से, गुदा मे क्षत होने से, ठण्डे पानी के स्पर्श से, वस्त्र, ढेला, तिनके आदि से घसड़ लगने पर, निरन्तर वेगपूर्वक प्रवाहण से, अनुपस्थित वायु, मूत्र, मल को जोर से प्रवाहण करने से, उपस्थित मल मूत्र के वेगो को रोकने से, स्त्रियो मे आम-गर्भ के गिरने से, प्रवृद्ध गर्भ द्वारा उत्पीडन होने से, विषम प्रसूति (अकाल- प्रसव) से, प्रकुपित अपानवायु अधोगत मल (दोष) को गुदवलियो मे एक त्रत कर देते है। इससे गुदवलियो मे अर्श उत्पन्न हो जाते है ॥१०॥ सर्षप-मसूर-माष-मुद्ग-कुष्ठक-यव-कलाय-पिण्डि-टिण्टिकेर-खर्जूर-कर्क- न्धु-काकणन्तिका-बिम्बी-बदर-करीरोदुम्बर-जाम्बव-गोस्तनाङ्गुष्ठ-कशेरु- क-शृङ्गाटक-शृङ्गी-दक्ष-शिखि-शुकतुण्ड-जिह्वा-पद्ममुकुल-कर्णिका-संस्था- नानि सामान्याद्वातपित्तकफप्रबलानि ॥११॥ उत्पत्ति के पीछे उत्पन्न होने वाले वात, पित्त और कफजन्य तथा द्वन्द्वज अर्श सामान्यरूप से—सरसो, मसूर, उड़द, मोठ, जौ, मटर, पिण्ड (पिण्डा- कार), टिण्टिकेर (टेटु), केवुक, तिन्दुक, काकणन्तिका (काकदन्तिका, रत्ती), कर्कन्धु (बेर), कदर (श्वेत खदिर), बिम्बी फल, करीर, गूलर, खजूर, जामुन, गाय के स्तन, अगूठा, कशेरू, सिंघाड़ा, कुक्कुट, मोर, तोते की चोच के समान तथा जीभ की भाति, कमल के डोडे के समान और कर्णिका (पद्मकर्णिका) के समान आकार के अर्श होते है ॥११॥