भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 535

अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५५१ तेषामयं विशेषः- शुष्क-म्लान-कठिन-परुष-रूक्ष-श्यावानि तीक्ष्णा- ग्राणि वक्राणि स्फुटितमुखानि विषमविस्तृतानि शूलाक्षेप-तोद-स्फुरण- चिमिचिमासंहर्षणापरीतानि स्निग्धोष्णोपशमानि प्रवाहिकाध्मान-शिश्न- वृषण-बस्ति-वङ्क्षण-हृद्ग्रहाङ्गमर्द-हृदय-द्रव-प्रबलानि प्रतत-विबद्ध-वात- मूत्र-वर्चासि कठिन-वर्चस्यूरु-कटी-पृष्ठ-त्रिक-पार्श्व-कुक्षि-बस्ति-शूल-शिरो- ऽभिताप-क्षवथूद्गार-प्रतिश्याय-कासोदावर्तायास-शोष-शोथ-मूर्च्छारो- चक-मुखवैरस्य-तैमिर्य-कण्डू-नासा-कर्ण-शङ्ख-शूल-स्वरोपघात-कराणि श्यावारुण-परुष-नख-नयन-वदन-त्वङ्-मूत्र-पुरीषस्य वातोल्बणान्यर्शां- सीति विद्यात् ॥१२॥ इन वातादिजन्य अर्शो की विशेषता यह है—जो अर्श शुष्क, म्लान ( मुरझाये ), कठिन, परुष ( कर्कश ), रूक्ष, श्याव वर्ण के हो, आगे से तीक्ष्ण, टेढे, फटे ( विदीर्ण ) मुख वाले, विषम रूप मे फैले हो, जिनमे शूल, आक्षेप, भेदन, स्फुरण, चिमिचिमायन ( सरसो या राई के लेप के समान वेदना ) और सहर्ष ( खाज ) होती हो, स्निग्ध ओर उष्ण उपचार से शान्त हो जाये, प्रवा- हिका, आध्मान, शिश्नग्रह ( रोगी लिग का खींचे, या पकड़े ), वृषण-ग्रह, बस्ति- ग्रह, वक्षण-ग्रह, हृदय-ग्रह ( इनका जकड़ जाना या इनमे वेदना होना ), अगों का टूटना, हृदय का जल्दी-जल्दी चलना, वायु, मल, मूत्र का सदा अवरोध रहना, जाघ, कटि, पीठ, पार्श्व, कुक्षि तथा बस्ति मे शूल रहना, शिरोवेदना, छीक आना, उद्गार-प्रवृत्ति, प्रतिश्याय, कास, उदावर्त्त, आयाम ( वात रोग ) शोष, शोथ, मूर्च्छा, अरुचि, मुख की विरसता, तैमिर्य ( तिमिर नामक नेत्र रोग ), नासिका मे खाज, कर्णशूल, शखशूल, स्वरभेद, त्वचा, नख, आखे, मुख, मल और मूत्र का श्याव या अरुण ( नीला या लाल ) वर्ण, इनमे कठोरता का होना वात प्रधान अर्शो के लक्षण है ॥१२॥ भवतश्चात्र—कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च। प्रमिताल्पाशनं तीक्ष्णमद्यमैथुनसेवनम् ॥ १३ ॥ लङ्घनं देशकालौ च शीतौ व्यायामकर्म च । शोको वातातपस्पर्शो हेतुर्वातार्शसामिति ॥ १४ ॥ वातजन्य-अर्श के कारण—कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, लघु और शीतल प्रमित ( एक ही रस का सेवन ) और अल्प भोजन करने से, तीक्ष्ण मद्य से, मैथुन से, उपवास से, शीत देश मे वास वा शीत काल से, व्यायाम से, शोक से, वायु, धूप के स्पर्श से वातजन्य-अर्श उत्पन्न होते है ॥१३-१४॥

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान) · पृष्ठ 535, कुल 616 में से · BharatKosha