चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५२ चरकसंहिता [ अ० १४ तत्र यानि मृदु-शिथिल-सुकुमाराणि स्पर्शासहानि रक्त-पीत-नील- कृष्णानि स्वेदोपक्लेदबहुलानि विस्रगन्धीनि तनु-पीत-रक्त-स्रावीणि दाह- कण्डू-शूल-निस्तोद-पाकवन्ति शिशिरोपशयानि संभिन्नपीतहरितवर्चांसि पीत-विस्रगन्ध-प्रचुर-विण्मूत्राणि पिपासाज्वरतमकसंमोहभोजनद्वेषकरा- णि पीत-नख-नयन-त्वङ्-मूत्र-पुरीषस्य पित्तोल्बणान्यर्शांसीति विद्यात् १५॥ पित्तप्रधान-अर्शों के लक्षण—जो अर्श कोमल, शिथिल, सुकुमार, स्पर्श को न सहन करने वाले, लाल, पीले, नीले, काले जिनमें पसीना और क्लिन्नता बहुत रहती हो, जिनसे सड़ी, आम गन्ध आती हो, पतला, पीला रक्त जिनसे बहता हो, रक्तस्राव होता हो, जिनमें जलन, कण्डू ( खाज ), शूल, तोद, वेदना तथा पाक हो, जो शीत क्रिया से शान्त हो जाये, जिनमें पतला ( भिन्न ), पीला, हरा मल आता हो, जिनमें मल मूत्र पीले वर्ण तथा बुरी गन्ध का और मात्रा मे बहुत हो, रोगी को प्यास, ज्वर, तमक, श्वास, संमोह ( मूर्च्छा ) तथा भोजन से द्वेष रहता हो, नख, आखे, त्वचा, मल, मूत्र पीले हों तो पित्तप्रधान-अर्शों को समझना चाहिये ॥ १५ ॥ भवतश्चात्र—कट्वम्ललवणक्षारव्यायामाग्न्यातपप्रभाः । देशकालावशिशिरौ क्रोधो मद्यमसूयनम् ॥ १६ ॥ विदाहि तीक्ष्णमुष्णं च सर्वपानान्नभेषजम् । पित्तोल्बणानां विज्ञेयः प्रकोपे हेतुरर्शसाम् ॥ १७ ॥ कारण—कटु, अम्ल, लवण, क्षार, व्यायाम, अग्नि, धूप, और प्रभा ( ज्योति ), उष्ण देश, उष्ण काल, क्रोध का आना, मद्य, असूया (परनिन्दा), विदाही, तीक्ष्ण और उष्ण प्रकृति का सब खानपान, पित्तप्रधान-अर्शो का प्रकोपक कारण है ॥ १६-१७-॥ तत्र यानि प्रमाणवन्त्युपचितानि श्लक्ष्णानि स्पर्शासहानि श्वेतपाण्डु- पिच्छिलानि स्तब्धानि गुरूणि स्तिमितानि सुप्तसुप्तानि स्थिरश्वयथूनि कण्डूबहुलानि प्रतत-पिञ्जर-श्वेत-रक्त-पिच्छलास्रावीणि गुरु-पिच्छिल-श्वेत- मूत्र-पुरीषाणि रूक्षोष्णोपशयानि प्रवाहिकातिमात्रोत्थानवड्क्षणाहव- न्ति परिकर्तिका-हल्लास-निष्ठिविका-कासारोचक-प्रतिश्याय-गौरव-च्छर्दि- मूत्र-कृच्छ्र-शोष-शोथ-पाण्डु-रोग-शीत-ज्वराश्मरी-शर्करा-हृदयेन्द्रियास्यो- पलेपास्यमाधुर्य-प्रमेह-कराणि दीर्घकालानुपशयान्यतिमात्रमग्नि-मार्दव- क्लैब्य-कराण्याम-विकार-प्रबलानि गुरूणि च शुक्ल-नख-नयन-वदन-त्वङ्- मूत्र-पुरीषस्य श्लेष्मोल्बणार्शांसीति विद्यात् ॥ १८ ॥