चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 537, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ । चिकित्सितस्थानम् ५५३ कफप्रधान-अर्शों के लक्षण—जो अर्श बहुत बडे प्रमाण के ( बढे हुए ), चिकने, स्पर्श को सहने वाले, स्निग्ध, श्वेत, पाण्डु और चिक्कन ( पिच्छिल ), स्तब्ध ( जड़ी भूत ), भारी, स्तिमित ( गीले वस्त्र से ढपे हुए के समान ), अति सुप्त ( स्पर्श ज्ञान से रहित ), स्थिर, शाथयुक्त जिनमे बहुत खाज हो, जिनमे स्राव मात्रा मे अधिक तथा निरन्तर आये, स्राव, धूमर, श्वेत, लाल, शुक्र, पिच्छा ( सीम्बल के गाद के समान ) जैसा हो, मल और मूत्र, भारी, पिच्छिल और श्वेतवर्ण हो, रुक्ष और उष्णक्रिया से जिनमे शान्ति होती हो, प्रवाहिका बार-बार उठ कर बैठना ( थोडा मल बाहर आये ), वक्षणो मे आनाह हो, परिकर्त्तिका, जी मचलाना, निष्ठीवन ( थूक का आना ), कास, अरुचि, प्रतिश्याय, भारीपन, छर्दि, मूत्रकृच्छ्र, शोष, शोथ, पाण्डुरोग, शीत ज्वर, अश्मरी, शर्करा, हृदय-उपलेप, इन्द्रिय उपलेप ( कफाधिकता ), मुख मे मधुर रस, प्रमेह-रोग का होना, दीर्घ काल तक रहने वाली अग्नि की अति- मन्दता, क्लीबता को करने वाले, आमजन्य प्रा उठ रोगो को पैदा करने वाले, नख, नयन, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का वर्ण श्वेत होता है, इन अर्शों को कफप्रधान-अर्श समझना चाहिये ॥ १८ ॥ भवन्ति चात्र-मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च । अव्यायामो दिवास्वप्नः शय्यासनसुखे रतिः ॥ १६ ॥ प्राग्वातसेवा शीतो च देशकालावचिन्तनम् । श्लैष्मिकाणां समुद्दिष्टमेतत्कारणमर्शसाम् ॥ २० ॥ कारण—मधुर, स्निग्ध, शीतल, लवण, अम्ल, गुरु भोजनो के सेवन से, व्यायाम न करने से, दिन मे सोने से, शय्या-सुख, आसन-सुख की प्रवृत्ति, जोर की सीधी वायु का सेवन, शीतल देश, शीतल काल, चिन्ता न करना ये कफजन्य अर्शरोग के कारण है ॥ १६-२० ॥ हेतुलक्षणसंसर्गाद्विद्याद् द्वन्द्वोल्बणानि च । सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणां सहजैर्लक्षणं समम्१ ॥ २१ ॥ उपरोक्त दो कारण ओर लक्षणो के मिलने से द्वन्द्वज-अर्श ( वात, पित्तो- ल्बण, वात, श्लेष्मोल्बण, पित्तश्लेष्मोल्बण ) उत्पन्न होते है । तीनों दोषो के मिलने से सन्निपातजन्य अर्श-रोग उत्पन्न होते है, इसके लक्षण सहज ( गर्भ शरीर के साथ उत्पन्न ) अर्श के समान होते है ॥ २१ ॥ १ 'लक्षणैः समम्' इति वा पाठः ।