भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 538

५५४ चरकसंहिता [ अ० १४ विष्टम्भोऽन्नस्य दौर्बल्यं कुक्षेराटोप एव च । कार्श्यमुद्गारबाहुल्यं सक्थिसादोऽल्पविट्कता ॥ २२ ॥ ग्रहणीदोषपाण्ड्वर्तेराशङ्का चोदरस्य च । पूर्वरूपाणि निर्दिष्टान्यर्शसामभिवृद्धये ॥ २३ ॥ पूर्वरूप—अन्न का विष्टम्भ, दुर्बलता, कुक्षि मे वेदनायुक्त गुड़-गुड़ शब्द, शरीर मे कृशता, डकार का अधिक आना, टागो मे दर्द, मल का थोड़ा आना, ग्रहणी-रोग या पाण्डु-रोग की शका ( सम्भावना ), अथवा उदररोग की आशका होना ये अर्शरोग की उत्पत्ति के पूर्वरूप है ॥ २२-२३ ॥ अशांसि खलु जायन्ते नासन्निपतितैस्त्रिभिः । दोषैर्दोषविशेषान्तु विशेषः कल्प्यतेऽर्शसाम् ॥ २४ ॥ अर्श-रोग तीनो दोषो क सन्निपात से ही उत्पन्न होते है । सब अर्श त्रिदोष- जन्य ही है । किन्तु दोष विशेष की प्रधानता से ही इनको वातजन्य, पित्तजन्य या कफजन्य कहा जाता है ॥ २४ ॥ पञ्चात्मा मारुतः पित्तं कफो गुदवलित्रयम् । सर्वे एव प्रकुप्यन्ति गुदजाना समुद्भवे ॥ २५ ॥ तस्मादर्शासि दुःखानि बहुव्याधिकराणि च । सर्वदेहोपतापानि प्रायः कृच्छ्रतमानि च ॥ २६ ॥ प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान पाच प्रकार की वायु, पित्त, कफ और गुदा की तीनों वलिया अर्श-रोग की उत्पत्ति मे कुपित हो जाती हैं । इसी कारण से अर्श-रोग अतिदु ख देने वाला, नाना रोगो को उत्पन्न करने वाला, सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने के साथ-साथ अतिकृच्छ्रसाध्य होता है ॥ २५-२६ ॥ हस्ते पादे मुखे नाभ्या गुदे वृषणयोस्तथा । शोथो हृत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ २७ ॥ हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुग्ज्वरः । तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ २८ ॥ सहजानि त्रिदोषाणि यानि चाभ्यन्तरा वलिम् । जायन्तेऽशांसि संश्रित्य तान्यासाध्यानि निर्दिशेत् ॥ २९ ॥ असाध्यता—जिस व्यक्ति के हाथ, पाव, मुख, नाभि, गुदा, अण्डकोश मे शोथ हो जाये, रोगी को हृदयशूल, पार्श्वशूल हो वह अर्श-रोगी असाध्य है । हृदयशूल, पार्श्वशूल, मूर्च्छा, वमन, अगों मे दर्द, ज्वर, तृष्णा और गुदा का