भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४६ त्रिकशूल या इनका जकड़ाव हो जाता है। रोगी निरन्तर चिन्ताशील और अत्यन्त आलसी होता है । जन्मकाल से ही लेकर गुदा-मार्ग के बन्द होने के कारण अपानवायु ऊपर की ओर आकर समान वायु, प्राण वायु, व्यान वायु, उदान वायु तथा पित्त ओर कफ को प्रकुपित कर देती है। ये पाचो वायुए तथा पित्त और कफ कुपित होकर अर्श-रोगी मे वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य रोगो को उत्पन्न करने है । इस प्रकार से सहज अर्शों का वर्णन किया जा चुका है ॥ ८ ॥ अत ऊर्ध्वं जातस्योत्तरकालजानि व्याख्यास्यामः ॥ ६ ॥ इसके आगे बालक की उत्पत्ति के पीछे होने वाले अर्श रोग की व्याख्या करते है ॥ ॥ ६ ॥ गुरु-मधुर-शीताभिष्यन्दि-विदाहि-विरुद्धाजीर्ण-प्रमिताशनासात्म्य- भोजनाद् गव्य-मात्स्य-कुक्कुट-वाराह-माहिषाजाविक-पिशित-भक्षणात् कृश-शुष्क-पूतिमास-पैष्टिक-परमान्न-क्षीर-मन्दक-दधि-तिल-गुड-विकृति- सेवनाच्च माप-यूषेशु-रस-पिण्याक-पिण्डालुक-शुष्क-शाक-शुक्त-लशुन-- किलाट-पिण्डक-बिस-मृणाल-शालूक-क्रौञ्चादन-कशेरुक-शृङ्गाटक-तरुण- विरूढ-नवधान्याममूलकोपयोगाद् गुरु-फल-शाक-राग-हरितक-मर्दक- वसा-शिरस्पंद-पर्युषित-पूति-शीत -संकीर्णान्नाभ्यवहरणान्मन्दक्रा तिकक्रान्त- मद्य-पानाद् व्यापन्न-गुरु-सलिल-पानादतिस्नेह-पानादसंशोधनाद्वस्तिकर्म- विभ्रमादव्यवायाद्दिवास्वप्नात्सुखशयनासनोपसेवनाच्चोपहताग्नेर्मलोपच- यो भवत्यतिमात्रम् । गुरु, मधुर, शीतल, अभिष्यन्दी, विदाही, विरुद्ध, अजीर्ण, प्रमिताशन, ( एक रस के भोजन से ), असात्म्य भोजन के कारण, गाय, मत्स्य, कुक्कुट, वराह (शूकर ), महिष ( भैसा ), बकरी, भेड इन पशुओ के मास के भक्षण से, कृश और शुष्क प्राणी का मास खाने से, सडे, दुर्गन्धयुक्त मास से, पिष्ठी से बने अन्न का, परमान्न को, दूध, दही, दधिमण्ड, तिल, गुड से बने पदाथौ के सेवन से, उडद, गन्न के रस, पिण्याक ( खल ), पिण्डालु ( कचालु ), शुष्क शाक, शुक्त, लहसुन, किलाट ( फटा हुआ दूध ), तक्रपिण्डक ( तक्र कूर्चिका अथवा तक्र का घना भाग ), बिस, मृणाल, शालूक ( कन्द ), क्रोञ्चा- दन, कसेरू, सिंघाडा, तरुण ( कच्चे ), अविरूढ ( अंकुरित ), नव ( नये ) शूक-धान्य, शमी-धान्यो के सेवन से, कच्ची मूली के खाने से, गुरु फल, गुरु- शाक के खाने से, राग ( रायता षाडव ), हरित ( आर्द्रक आदि ), करमर्द, वसा, शिरस्पद, पर्युषित (बासी), पूति (दुर्गन्धयुक्त), शीतल, सकीर्ण