चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 532, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५४८ चरकसंहिता [ अ० १४ तैरुपहतो जन्मप्रभृति भवत्यतिकृशो विवर्णः क्षामो दीनः प्रचुरवि- बद्ध-वात-मूत्र-पुरीषः शार्करी चाश्मरी वा तथाऽनियत-वि बद्ध-मुक्त-पक्वा- मश्रुष्कभिन्नवर्चा अन्तगान्तरा श्वेत-पाण्डु-हरित-पीत-रक्तारुण-तनु-सान्द्र- पिच्छिल-कुणप-गन्धाम-पुरीषोपवेशी नाभि-बस्ति-वङ्क्षणोद्देशे प्रचुरपरि- कतिकान्वितः सशूलगुदप्रवाहिकः परिहर्ष-प्रमोह-प्रसक्त-विष्टम्भान्त्र-कूजो- दावर्त्त-हृदयेन्द्रियोपलेपः प्रचुरविवद्धतिक्ताम्लोद्गारः सुदुर्बलो सुदुर्बला- ग्निरल्पशुक्रः क्रोधनो दुःखोपचारशीलः काश-श्वास-तमक-तृष्णा-हृल्लास- च्छर्दिररोचकाविपाक-पीनस-क्षवथु-पर्वांतरतैर्मिरिकः शिरःशूली क्षाम- भिन्न-सन्न-सक्त-जर्जर-स्वरः कर्णरोगी सशूल-पाणि-पाद-वदनाक्षि-कूटः सज्वरः साङ्गमर्दः सर्वपर्वास्थिशूली चान्तरान्तरा पार्श्व-कुक्षि-बस्ति- हृदय-पृष्ठ-त्रिक-ग्रहोपतप्तः प्रध्यानपरः परमालसश्चेति । जन्मप्रभृत्यस्य गुदजेरावृतो मार्गोपरोधाद्वायुरपानः प्रत्यारोहन्समानव्यानप्राणोदानान् पित्तश्लेष्माणो च प्रकोपयति, ते प्रकुपिताः पञ्च वाताः पित्तश्लेष्माणौ चार्संसमभिद्रवन्त एतान् विकारानुपजनयन्तीत्युक्तानि सहजा- न्यर्शांसि ॥ ८ ॥ लक्षण—अर्शरोग के कारण रोगी जन्म से ही अति कृश, विवर्ण ( कान्ति- रहित ), क्षीण, दीन होता हं । वायु, मूत्र और मल की अधिकता ओर रुकावट रहती है । अश्मरी ( पथरी ) तथा मूत्र मे शर्करा ( रेत ) रोग की शिकायत होती है । अनिश्चित रूप मे बधा, ढीला, कच्चा, पका, शुष्क या पतला मल आता है । बीच-बीच मे कभी कभी श्वेत, पीला, हरा, धूसर वर्ण, लाल, अरुण, पतला, गाढ़ा, चिकना, शव के समान गन्धयुक्त, कच्चा मल त्याग करता है । नाभि, बस्ति और वक्षण ( कोख ) प्रदेश मे काटने के समान वेदना होती है । गुदा मे शूल, प्रवाहिका, परिहर्ष ( रोमांच ) प्रमोह रहता है । निरन्तर विष्टम्भ ( अवरोध, वायु का ), आटोप ( वेदनायुक्त गुड़गुड़ शब्द ), आंतो मे कूजन, उदावर्त्त, हृदय और इन्द्रियों का उपलेप ( कार्यों मे असमर्थता ) रहती है । उद्गार ( डकार ) बहुत, विबद्ध, तिक्त और अम्ल आता है । निर्बल, मन्दाग्नि, अल्पशुक्र, क्रोधी, निरन्तर दुःखी, कास, श्वास, तमक श्वास, प्यास, जी- मचलाना, वमन, अरुचि, अविपाक, पीनस, छीक इन रोगों से युक्त, तिमिर नामक नेत्ररोग से पीड़ित, शिरःशूलयुक्त हाता है । इसका स्वर निर्बल फटा तथा जर्जरित रहता है । कर्ण रोग होते है । हाथ, पाव, मुख और आखों के गोलकों पर सूजन होती है । ज्वर, अंगों का टूटना, पर्व अस्थियो मे शूल रहता है । बीच-बीच मे पार्श्वशूल, कुक्षिशूल, बस्तिशूल, हृदयशूल, पृष्ठशूल,