चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६३ अपकर्षो यथोत्कर्षो न त्वन्नादपकृष्यते । शक्त्यागमनरक्षार्थं दार्ढ्यार्थमनलस्य च ॥ ८४ ॥ काल-क्रम को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि एक मास तक तक्र का प्रयोग करने पर सहसा तक्र को बन्द न करदे, अपितु धीरे-धीरे कम करते हुए एक मास मे जाकर तक्र छुडवाये । जिस क्रम से अपकर्ष होता है, उसी प्रकार से अपकर्ष करना चाहिये । इस घटाव मे अन्न की कमी नही करनी चाहिये । तक्रमे जितनी कमी हो, उतनी ही अन्नमे वृद्धि करनी चाहिये । जिससे रोगी मे शक्ति का सञ्चार हो और अग्नि दृढ हो जाये, तथा शरीर मे बल और वर्ण ( कान्ति ) की वृद्धि होवे, यह क्रम है ॥ ८३-८४ ॥ बलोपचयवर्णार्थमेप निर्दिश्यते क्रमः । रूक्षमर्धोद्धृतस्नेह यतश्चानुद्धृत घृतम् ॥ ८५ ॥ तक्रं दोषाग्निबलवित् त्रिविधं तत्प्रयोजयेत् । दोष, अग्नि और बल को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि रूक्ष ( जिसमे से सम्पूर्ण मक्खन निकाल लिया ), अर्द्धोद्धृत ( आवा मक्खन निकाला हो ), अनुद्धृत ( जिस मे से मक्खन बिलकुल न निकाला गया हो ) ऐसे तीन प्रकार के तक्रों का प्रयोग करे । कफजन्य, मन्दतम अग्नि मे तथा अधम बल मे रूक्ष तक्र, पित्त-जन्य, मन्दतर अग्नि के मध्यम बल मे अर्द्धोद्धृत तक्र, वातजन्य, मन्द अग्नि मे और उत्तम बल मे अनुद्धृत तक्र बरतना चाहिये ॥ ८५- ॥ हतानि न विरोहन्ति तक्रेण गुदजानि तु ॥ ८६ ॥ भूमावपि निषिक्तं तद्दहेत्तक्रं तृणोलुपम् । किं पुनर्दीप्तकायाग्नेः शुष्काण्यार्शासि देहिनः ॥ ८७ ॥ तक्र के कारण मरे हुए अर्श पुनः हरे नही होते । भूमि पर गिरा हुआ भी तक्र तिनका को जला देता है । दीप्ताग्नि वाले पुरुष मे शुष्क अर्शों को जलादे, इसमे क्या सन्देह है ॥ ८६-८७ ॥ स्रोतःसु तक्रशुद्धेषु रसः सम्यगुपैति यः । तेन पुष्टिर्बलं वर्णः प्रहर्षश्चोपजायते ॥ ८८ ॥ वातश्लेष्मविकाराणा शतं चापि निवर्तते । नास्ति तक्रात्पर किचिदौषधं कफवातजे ॥ ८९ ॥ तक्र द्वारा स्रोतों के शुद्ध होने पर अन्न-रस धातुओं में भली प्रकार से पहुचता है । इससे पोषण, बल, वर्ण, आनन्द ( प्रसन्नता ) मिलती है। वात-