चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५५६ चरकसंहिता [ अ० १४ काटना अर्श मे हितकारी है। दूसरे का कथन है कि क्षार से जलाना चाहिये ओर तीसरे का कथन है कि अग्नि से जलाना चाहिये । ये सब बातें सत्य हैं, परन्तु बहुत शास्त्र-ज्ञान से सम्पन्न, शस्त्र-कर्म के अनुभवी, बुद्धिमान् वैद्य ही ये कार्य कर सकते हैं और यदि कदाचित् इन कर्मो मे चूक हो जाये तो अति भयानक फल होता है । जैसे— शस्त्र, क्षार और अग्नि के अयुक्त प्रयोग से—पुरुषत्व का नाश, गुदा मे शोथ, मल का अवरोध, आध्मान ( अफारा ), तीव्र शूल, पीड़ा, अति रक्त स्राव, शस्त्र, क्षार, अग्नि से कट जाने पर भी पुनः उत्पत्ति, भर जाने पर क्लेद, गुद भ्रश अथवा शीघ्र मृत्यु हो जाती है ॥ ३४-३७ ॥ यत्तु कर्म सुखोपायमल्पभ्रंशमदारुणम् । तदर्शासां प्रवक्ष्यामि समूलानां निवृत्तये ॥ ३८ ॥ इसलिये जो कर्म सुखपूर्वक हो सकता है, जिसमे थोड़ी सी भूल होने पर भी भयानक फल नही होता, अर्श रोग का मूल नाश करने के लिये इस प्रकार के कर्म का उपदेश करता हू ॥ ३८ ॥ वातश्लेष्मोल्बणान्याहुः शुष्काण्यर्शासि तद्विदः । प्रस्रावीणि तथाऽऽर्द्राणि रक्तपित्तोल्बणानि च ॥ ३६ ॥ तत्र शुष्कार्र्शासा पूर्व प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् । अर्श-रोग को जानने वालो का कहना है कि वातप्रधान या कफप्रधान अर्श शुष्क होते है। पित्तप्रधान या रक्तप्रधान अर्श स्रावयुक्त और आर्द्र होते हैं। [सुश्रुत ने रक्तजन्य अर्श को माना है, चरकमे पित्तजन्य अर्श मे ही इसका अन्त- र्भाव किया है ]। इसलिये प्रथम शुष्क अर्शो की चिकित्सा को कहता हूँ ॥३६॥ स्तब्धानि स्वेदयेत्पूर्व शोफशूलान्वितानि च ॥ ४० ॥ चित्रकक्षारबिल्वानां तैलेनाभ्यज्य स्वेदयेत् १ । यवमाषपुलाकानां कुलत्थानां च पोट्टलैः ॥ ४१ ॥ गोखराश्वशकृत्पिण्डैस्तिलकल्कैस्तुपेस्तथा । (१) इसके लिये बुद्धिमान् वैद्य का चाहिये कि शोथ और शूल से युक्त कठोर अर्शों को प्रथम चित्रक क्षार, बिल्व के कल्क से साधित तेल से चिकने करके, जौ, माष, कुलत्थि, पुलाक (जिनसे चावल नही निकाले ऐसे धान्यो ) की पोटलियो से, गाय, घोड़ा, गधा इनके लीद के पिण्डा से, तिल कल्क से और तुष से और वच, सौफ इनके कल्क को पिण्डाकार करके, स्नेह से युक्त करके मन्द २ गरम स्वेद देना चाहिये ॥ ४०-४२- ॥ १. 'बुद्धिमान्' इति वा पाठः ।