भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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५५८ चरकसंहिता [अ० १४ तुम्बुरूणि विडङ्गानि देवदार्वक्षता घृतम् । बृहती चाश्वगन्धा च पिप्पल्यः सुरसा घृतम् ॥ ५१ ॥ वराहवृषद्विट् चैव धूपनं शक्तवो घृतम् । कुञ्जरस्य पुरीषं च घृतं सर्जरसो रसः ॥ ५२ ॥ (४) धूपन—काला साप, सुअर, ऊट, जोंक, वृषदंश (बिल्ली) इनकी वसा से अर्शों को स्निग्ध करके धूपन देना चाहिये¹ । (१) धूपन के लिये पुरुषो के बाल, साप की केचुली, बिल्ली की त्वचा, आक की जड़, शमी (खेजडा) वृक्ष के पत्ते हितकारी है। इन वस्तुओ को घी के साथ बरतना चाहिये² । (२) तुम्बरू, बायविडग, देवदारु, अक्षत और घी इनका धूपन देना चाहिये । (३) बड़ी कटेरी का फल, असगन्ध, पिप्पली, तुलसी और घी इनका धूपन देना चाहिये । (४) सुअर की विष्ठा, बिल्ली की विष्ठा, सत्तू और घी इनका धूप देना चाहिये । (५) हाथी की विष्ठा, घी और राल इनका धूप देना चाहिये । धूपन के लिये पाच याग है ॥४६-५२॥ हरिद्राचूर्णसंयुक्तं सुधाक्षीरं प्रलेपनम् । गोपित्तपिष्टाः पिप्पल्यः सहरिद्राः प्रलेपनम् ॥ ५३ ॥ शिरीषबीजं कुष्ठं च पिप्पल्यः सैन्धवं गुडः । अर्कक्षीरं सुधाक्षीरं त्रिफला च प्रलेपनम् ॥ ५४ ॥ पिप्पल्यश्चित्रकः श्यामा किण्वं मदनतण्डुलाः । प्रलेपः कुक्कुटशकृद्धरिद्रागुडसंयुतः ॥ ५५ ॥ निकुम्भः सामृतासङ्गः पारावतशकृद्गुडः । प्रलेपः स्याद् गजास्थीनि निम्बो भल्लातकानि च ॥ ५६ ॥ प्रलेपः स्यादलर्केण वासन्तकवसायुतः । शूलश्वयथुहृद्युक्तश्शुलुकीवसायाऽथवा ॥ ५७ ॥ आर्कं पयः सुधाकाण्ड कटुकालाबुपल्लवाः । करञ्जो बस्तमूत्रं च लेपनं श्रेष्ठमर्शसाम् ॥ ५८॥ (५) आठ प्रलेप—(१) हल्दी के चूर्ण को थोर के दूध मे मिला कर १ कहीं २ पर 'जलौका' के स्थान पर 'जतुका' पाठ है जिससे मकड़ी लेना । वाग्भट मे 'जलौका' पाठ है । यथा—'कृष्णाहिबिडालोष्ट्रजलौकाशूकर- वसाभिर्वा अभ्यज्य।' २ वाग्भट मे यह योग इस प्रकार से पढ़ा है—'धूपयेच्च सघृतशमीपत्रार्क- मूलमानुषकेशाहिनिर्मोकबिडालचर्मभिः इससे घी लेना चाहिये ।