भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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५४६ चरकसंहिता [ अ० १४ चतुर्दशोऽध्यायः। अथार्शश्चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे अर्शारोग चिकित्सा की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है¹ ॥ १-२ ॥ आसीनं मुनिमव्यग्रं कृतजप्यं कृतक्षणम् । पृष्टवानर्शसां मुक्तिमग्निवेशः पुनर्वसुम् ॥ ३ ॥ प्रकोपह्तुसंस्थानं स्थानं लिङ्गचिकित्सितम् । साध्यासाध्यविभागं च तस्मै तन्मुनिरब्रवीत् ॥ ४ ॥ मन्त्र आदि जप करके स्वस्थ रूप मे बैठे हुए भगवान् आत्रेय से अवसर देखकर अग्निवेश ने अर्श-रोग से छूटने का उपाय पूछा । आत्रेय मुनि ने अग्निवेश को अर्श रोग के प्रकोपके कारण, आकृति, उत्पत्ति, स्थान, लक्षण, चिकित्सा और साध्य-असाध्य भेदो का उपदेश किया ॥३-४॥ इह खल्वग्निवेश ! द्विविधान्यर्शांसि सहजानि कानिचित् कानि- चिज्जातस्योत्तरकालजानि । तत्र बीजं गुदवलिबीजोपतप्तमायतनमर्शसा सहजानाम् । तत्र द्विविधौ बीजावुपतप्तौ हेतुर्मातापित्रोरपचारः, पूर्वकृतं च कर्म, तथाऽन्येषामपि सहजाना विकाराणाम् । तत्र सहजानि सह- जातानि शरीरेण, अर्शांसीत्यधिमांसविकाराः ॥ ५ ॥ हे अग्निवेश ! अर्श-रोग दो प्रकार के होते है । कई अर्श सहज अर्थात् गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न होते है, और कई अर्श उत्पत्ति काल के पीछे उत्पन्न हो जाते हैं । इनमे गुदवलि के आरम्भक बीजभाग के उपतप्त ( दूषित ) होने से सहज अर्श उत्पन्न होते है । शुक्र और आर्त्तव के उपतप्त ( दूषित होने से ) अर्श होते है । शुक्र-आर्त्तव रूपी बीज के उपतप्त ( दूषित ) होने के दो कारण हैं । एक—माता पिता का अनुचित आहार-विहार और दूसरा-पूर्वकृत कर्म । १ कुछ लोगों की धारणा है कि यहा से आरम्भ करके अन्त तक के भाग को आचार्य दृढबल ने पूरा किया है । जैसा कि कहा जाता है— 'अखण्डार्थं दृढबलो जातः पञ्चनदे पुरे । कृत्वा बहुभ्यः शास्त्रेभ्यो विशेषाच्च बलोच्चयम् । सप्तदशौषधाध्यायसिद्धकल्पैरपूरयत् ॥'