चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५६० चरकसंहिता [ अ० १४ ( ६ ) जोक द्वारा, शस्त्र द्वारा अथवा सूई द्वारा बार बार रक्त को जो कि रक्त अभ्यगादि क्रिया से नहा निकलता निकालना चाहिये ॥ ६२ ॥ गुदश्वयथुशूलात्ते मन्दाग्नि पाययेत्तु तम् । त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं पाठा हिङ्गु शचीत्रकम् ॥ ६३ ॥ सौवर्चलं पुष्कराख्यमजाजीं विल्वपेशिकाम् । बिडं यवानी हपुषा विडङ्गं संव्यचं वचाम् ॥ ६४ ॥ तिन्तिडीकं च मण्डेन मद्येनोष्णोदकेन च । तथाऽर्शोग्रहणीदोषशूलानोहादिगुच्यते ॥ ६५ ॥ ( ७ ) जिस अर्श रोगी का गुदा मे शोथ, गुदा मे शूल, मन्दाग्नि हो उसको सोठ, मरिच, पिप्पली, पिप्पलीमूल, पाठा, हींग, नीता, संचल पुष्करमूल, जीरा, बिल्व की गिरी, बिड् नमक, अजवाइन, हपुवेर, बायविडग, सैन्धा नमक, वच और इमली इन अठारह वस्तुओ का समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को मण्ड ( दधि वस्तु ), मद्य या गरम पानी के साथ देना चाहिये । इससे अर्श, ग्रहणीरोग, शूल, आनाह शान्त होते है ॥६३-६५॥ कुर्याद्वा पाचनं तस्य यदुक्तं ह्यतिसारिके । सगुदामभया वाऽथ प्राशयेत्तोऽन्नभक्तीकीम् ॥ ६६ ॥ पाययेत् त्रिवृच्चूर्णं त्रिफलाया रसेन वा । हृते गुदाश्रये दोषे गच्छन्त्यर्शासि संक्षयम् ॥ ६७ ॥ ( ८ ) जिन पाचनों को अतिसार-चिकित्सा मे कहगे उनको पिलाना चाहिये । भोजन से पूर्व हरड को गुड़ के समान भाग मे खाना चाहिये । अथवा त्रिफला क्वाथ के साथ निशाथ का चूर्ण देना चाहिये । गुदाश्रित दोष के नष्ट होने पर अर्श स्वय नष्ट हो जाते ह ॥ ६६-६७ ॥ गोमूत्राध्युषिता दद्यात्सगुडा वा हरीतकीम् । हरीतकी तक्रयुता त्रिफला वा प्रयोजयेत् ॥ ६८ ॥ सनागरं चित्रकं वा शीधुयुक्तं प्रयोजयेत् । दापयेच्चव्ययुक्तं१ वा सीधु साजाजिचित्रकम् ॥ ६९ ॥ सुरा वा हपुषापाठा२युक्ता सौवर्चलायुताम् । दधित्थं बिल्वसंयुक्तं युक्तं वा चव्यचित्रकम् ॥ ७० ॥ भल्लातकयुतं वाऽथ प्रदद्यात्तत्र तर्पणम् । १. 'चव्य वा शीधुसंयुक्तमजाजीदीप्यक पिबेत्' इति । २. 'हपुषा पाठा युक्ता' इति च पाठः ।