चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] शारीरस्थानम् ५६ किया करता है, वह नाना वस्तुओं की याचना करता है। अतः ज्ञानी पुरुष उस समय माता के शरीर में 'द्वैहृदय्य' अर्थात् दो हृदय बने बतलाते हैं। इस गर्भ का हृदय माता से बनता है, गर्भ का हृदय गर्भ का पोषण करने वाली रसवाहिनी नाड़ियों द्वारा माता के हृदय के साथ सम्बन्धित रहता है। इसलिये माता और गर्भ की इच्छा रसवाहिनी नाड़ी द्वारा मिली रहती है। उस समय माता की इच्छा गर्भ की इच्छा होती है। इसी कारण को देख कर विद्वान् लोग गर्भवती माता की इच्छा का व्याघात करना उचित नहीं जानते। इस माता की इच्छा का विनाश करने मे गर्भ की मृत्यु अथवा गर्भ मे विकार आ जाता है। कुछ बातों में माता और गर्भ का योग और क्षेम (सुख और रक्षा आदि) समान होता है। इसलिये कुशल पुरुष प्रिय और हितकारक उपचारों से गर्भिणी का विशेष रूप मे उपचार करते हैं ॥१६॥ तस्या गर्भापन्नेद्वैहृदय्यस्य च विज्ञानार्थं लिङ्गानि समासेनोपदे- क्ष्यामः। उपचारसाधन ह्याज्ञाने दोषः । ज्ञानं च लिङ्गतः । तस्मा- दिष्टो लिङ्गोपदेशः । आर्तवादर्शनमास्यसंस्रवणमन्नाभिलाषश्छर्दिर- रोचकोऽम्लकामता च विशेषेण श्रद्धाप्रणयनं चोच्चावचेषु भावेषु गुरु- गात्रत्वं चक्षुषोग्लानिः स्तनयोः स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्ण्य- मत्यर्थं श्वयथुः पादयोरीषल्लोमराड्युद्गमो योन्याश्च चाटालत्वमिति गर्भे पर्यागते रूपाणि र्भवन्ति ॥ १७॥ दो हृदयो के लक्षण—स्त्री के गर्भ स्थिर हो जाने और उसके द्वैहृदय्य अर्थात् दो हृदय हो जाने को पहचानने के लिये सक्षेप में लक्षण कहते हैं। लक्षणो का ज्ञान होने से ही परिचर्य्या ठीक २ प्रकार से होती है। विशेष लक्षणों से ही ज्ञान हो सकता है। इसलिये लक्षणों का उपदेश करना आवश्यक है। जैसे—आर्त्तव का दिखाई न देना, मुख से पानी बहना, भोजन में अनिच्छा, वमन (प्रात काल मे विशेष), अरुचि, खटाई की विशेष इच्छा, नाना खाद्य पदार्थों में इच्छा, शरीर में भारीपन, आँखों में ग्लानि, स्तनों में दूध, ओठ और चूचकों के चारों ओर खूब गहरे काले रग का निक्षेप होना, पावो मे थोड़ा थोड़ा सूजन, शरीर में रोमांच, योनि में फैलाव ये गर्भ के आने के उपरान्त (दो-हृदय होने) के लक्षण हैं ॥१७॥ सा यद्यदिच्छेत्तत्तदस्य दद्यादन्यत्र गर्भोपघातकरेभ्यो भावेभ्यः। उस समय गर्भिणी जो जो वस्तु चाहे वह वह इसको देनी चाहिये, परन्तु गर्भ को हानि पहुचानेवाले कोई पदार्थ नहीं देना चाहिये।