भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

६८ चरकसंहिता [ अ० ४ इत्येवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विध भेदांशं विद्याद्रोषांशत्वात् ५२ ( ६ ) शाकुन—जो कामो मे फसा हुआ, निरन्तर आहार-विहार मे रित, चञ्चल, असहनशील, सचय न करने वाला पुरुष हो उसको 'शाकुन' जाने । इस प्रकार से रोष अर्थात् क्रोध के अश होने से राजस सत्त्व के ये छः भेद जाने ॥ ५१-५२ ॥ तामस के तीन प्रकार— निरलंकरिष्णुमधमवेशं जुगुप्सिताचाराहार-मैथुन-पर स्वप्नशीलं पाशवं विद्यात् ॥ ५३ ॥ ( १ ) पाशव—जो शरीर को अलकृत करने की इच्छा न रखने वाला, अपवित्रस्वभाव, निन्दितआचार और भोजनवाला, मैथुनकामी, सोने के स्वभाववाला पुरुष हो उसको 'पाशव' प्रकृति का जाने ॥ ५३ ॥ भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्त-काम-क्रोध सरणशीलं तोयकाम मात्स्य विद्यात् ॥ ५४ ॥ ( २ ) मात्स्य—जो डरपाक, अज्ञानी, भोजन का लोभी, अस्थिरचित्त, चंचल, काम और क्रोध में फसा हुआ, भ्रमणशील, पानी की अधिक चाह करनेवाला हो उसको 'मात्स्य' प्रकृति का जाने ॥ ५४ ॥ अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्या हीनं वानस्पत्यं विद्यात् ५५ इत्येव खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविध भेदाश विद्यान्मोहांशत्वात् ५६ ( ३ ) वानस्पत्य—जो आलसी, केवल भोजन मे ही दत्तचित्त, सब प्रकार के ज्ञान वा बुद्धि से रहित जड़ पुरुष हो उसको 'वानस्पत्य' अर्थात् स्थावर प्रकृति का जाने । इस प्रकार से मोह का अश होने से तामस सत्त्व के तीन भेद हैं ॥ ५५-५६ ॥ इत्यपरिसंख्येयभेदानां खलु त्रयाणामपि सत्त्वानां भेदैकदेशो व्याख्यातः, शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधो ब्रह्मर्षि-शक्र-वरुण-यम-कुबेर- गन्धर्व-सत्त्वानुकारेण, राजसस्य षड्विधो दैत्य-राक्षस-पिशाच-सर्प-प्रेत- शकुनि-सत्त्वानुकारेण, तामसस्य त्रिविधः पशु-मत्स्य-वनस्पति-सत्त्वा- नुकारेण । कथं च यथासत्त्वमुपचारः स्यादिति । केवलश्वायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति गर्भावक्रान्तिसंप्रयुक्तः। तस्यार्थस्य विज्ञाने सामर्थ्यं—गर्भकरणा च भावानामनुसमाधिर्विघातश्च विघातकरणा भावानामिति ॥५७॥ इस प्रकार से तीनों प्रकार के सत्त्वों (चित्तों) के असंख्य भेद होने पर भी कुछ भेदों के कुछ अंश की व्याख्या कर दी है। ब्रह्म, ऋषि, शक्र, यम,