भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ८] चिकित्सितस्थानम् ४४१


इष्टवर्णरसस्पर्शगन्धवत्पानभोजनम् ॥ १८० ॥ इष्टमित्रैरुपहितं सुखमद्यात्सुखप्रदम् । (१) पथ्य गन्ध पुष्पमाला, स्वच्छ वस्त्र, आभूषणो से शोभित रोगी गाय, देवता, स्वर्ण आदि मगंलकारक वस्तुओ का स्पर्श करके, देव, ब्राह्मण और वैद्यो का पूजन करके, मनको पसन्द, वर्ण, रस, स्पर्श और गन्ध वाले, हितकारी, सुखदायक अन्न-पान को अभीष्ट व्यजनो के साथ खावे ॥ १७६-१८०-॥ समातीतानि धान्यानि कल्पनीयानि शुष्यताम् ॥ १८१ ॥ लघून्यहीनवीर्याणि स्वादूनि गन्धवन्ति च । यानि प्रहर्षकारीणि तानि पथ्यतमानि हि१ ॥ १८२ ॥ यच्चोपदेक्ष्यते पथ्यं क्षतक्षीणचिकित्सिते । यक्ष्मणस्तत्प्रयोक्तव्यं बलमांसाभिवृद्धये ॥ १८३ ॥ (२) शोष के रोगी को एक साल पुराने धान्य देने चाहिये । ये धान्य लघु, वीर्य से पूर्ण, स्वादु और गन्ध से युक्त, आनन्ददायक होने चाहिये, इस प्रकार के धान्य अतिपथ्य अर्थात् हितकारक है । क्षतक्षीण चिकित्सा म जो पथ्य कहेगे, बल, मास की वृद्धि के लिये उसका भी यक्ष्मा-रोग मे प्रयोग करे ॥ १८१-१८३ ॥ अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैरवगाह्रैर्विमार्जनैः । वस्तिभिः क्षीरसर्पिर्भिर्मासैर्मांसरसौदनैः ॥१८४॥ इष्टैर्मद्यैर्मनोज्ञानां गन्धानामुपसेवनैः । यथर्तुविहितैः स्नानैर्वासोभिरहृतैः प्रियैः ॥ १८५ ॥ सुहृदा रमणीयानां प्रमदाना च दर्शनैः । गीतवादित्रशब्दैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च ॥ १८६ ॥ हर्षणाश्वासनैर्नित्यं गुरूणा समुपासनैः । ब्रह्मचर्येण दानेन तपसा देवतार्चनैः ॥ १८७ ॥ सत्येनाचारयोगेन मङ्गलैरप्यहिंसया२ । वैद्यविप्रार्चनाच्चैव रोगराजो निवर्तते ॥ १८८ ॥ अभ्यग से (तैल आदि की मालिश से) उबटन से, स्नान से, अवगाहन से, शरीर का बहि -परिमार्जन करने से, बस्तियो से, दूध-घी से, मास से, मास रस और भात से, मन के प्रिय मद्य से, मन को लुभाने वाले गन्धो के सेवन से,


१ 'लघूनि हीनवीर्याणि तानि पथ्यतमानि हि' इति च पाठ क्वचित् । २ 'रविहिंसया' इति वा ।