भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

३१४ चरकसंहिता [अ० ३ (साल का भेद), स्यन्दन (सादन), वातपोथ (ढाक), शाल, ताड, धव, तिनिश (जिससे रथ बनता है वह वृक्ष), खैर, कदर (श्वेत खैर), कदम्ब, गम्भारी का फल, सर्ज (राल जिससे निकलती है वह वृक्ष), प्लक्ष (पिलखन), वट (बरगद), कपीतन (गिरीस या पारस पीपल), गूलर, पीपल, बरगद (जिसमे जटाये लटकती है), वाय के फूल, दूब, इत्कट (तृण विशेष), सिंघाडा, मजीठ, मालकंगनी, कमल बीज, क्रोञ्चादन (खिरनी), बेर, कोवि- दार (श्वेत कचनार), वेतस, मवर्त्तक (बहेडा), नीम, शतपर्वा (श्वेत दूब), शीत कुम्भिका (काठ पाटला, जिससे फूल नहीं आता वह पाटला), शतावरी, श्रीपर्णी (गम्भारी), श्रावणी (मुण्डी), महाश्रावणी (मुण्डी भेद), रोहिणी (कुटकी), शीतपाकी (गन्धदूर्वा या शिखण्डिका), ओदनपाकी (नील झिण्टी), काला (सारिवा या मजीठ), खरैंटी, पयस्या (क्षीरकाकोली या क्षीरविदारी), विदारीकन्द, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, मधुरा (काकोली या मूर्वा), क्षुद्रसहा (मूगपर्णी), ऋष्यप्रोक्ता (अतिबला), तृणशून्य (केतकी, केवडा), मोचरस (सेमलकी गोद), अडूसा, मौलसरी, वूड़ा, पटोलपत्र, नीम, सेमल की जड़, नारियल, खजूर, अगूर, पियाल, फूल प्रियगु, धन्वन, क्रौंच और मुलहठी । इन्हें तथा अन्य जो शीतल द्रव्य प्राप्त हो सके उनको लेकर क्वाथ करे। इस क्वाथ से दुगुना दूध, इन्ही द्रव्यो का कल्क और कषाय से आधा तैल मिलाकर तैल सिद्ध करे। यह तैल शीघ्र दाह ज्वर को नष्ट करता है। इन्ही ओषधियो को अत्यन्त बारीक पीस कर पतला लेप करे। इनके क्वाथ मे अव- गाहन या परिषेचन करे। [बारीक लेप करना चाहिये गाढा लेप उष्णता करता है ] ॥ २५८ ॥ मद्यारनाल-क्षीर-सौवीर-दधि-घृत-सलिल-सेकावगाहाश्च सद्योदाह- ज्वरमपनयन्ति शीतस्पर्शत्वादिति ॥ २५६ ॥ मद्य, आरनाल (काँजी), दूध, सौवीर (धान्यासव), दही, घी और जल का परिषेक और अवगाहन बहुत जल्दी दाहज्वर को नष्ट करता है। क्योकि ये वस्तुएँ शीत स्पर्शवाली है ॥ २५६ ॥ भवन्ति चात्र-पौष्करेषु सुशीतेषु पद्मोत्पलदलेषु च। कह्लाराणां च पत्रेषु क्षौमेषु विमलेषु च ॥ २६० ॥ चन्दनोदकशीतेषु सुप्याद्दाहादितः सुखम् । हिमाम्बुसिक्ते सदने शीते धारागृहेऽपि वा ॥ २६१ ॥ हेमशङ्खप्रवालानां मणीनां मौक्तिकस्य च ।