भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ७ ] शारीरस्थानम् ६५ चैव केश-श्मश्रु-लोमानीत्येतद्यथावत्संसंख्यात त्वक्प्रभृति दृश्यं, अतः पर तर्क्यम् । एतदुभयमपि न विकल्प्यते प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ॥ १६ ॥ इसके आगे जो देखी नहीं जा सकतीं, वा दिखलाई नहीं देतीं वे सब अनि र्देश्य हैं। अतः उनको अनुमान द्वारा ही जाना जाता है। जैसे—९०० स्नायु, ७०० सिराये, २०० धमनियां, ४०० पेशिया, १०७ मर्म, २०० सन्धिया, २६- ६५६ सिरा-धमनियों के मुखो के अग्रभाग और इतने ही २६६५६ केश, श्मश्रु और शरीर के बाल हैं। ये यहा ठीक २ प्रकार से गिना दिये गये। इनमे त्वचा आदि दृश्य है। इसमे आगे सब अनुमान गम्य हैं। यह दृश्य और तर्क्य दोनों प्रकार का मान शरीर के अविकृत होने से विकल्पित नहीं होता। शरीर के विकृत होने पर त्वचा आदि का मान भी विकृत हो जाता है ॥ १६ ॥ यत्त्वञ्जलिमख्येयं तदुपदेक्ष्यामः, तत्पर प्रमाणमभिज्ञेयं, तच्च वृद्धि ह्रास-योगि, तर्क्यमेव । तद्यथा—दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेना- ञ्जलिप्रमाणे न यत्तत् प्रच्यावमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून, यत्तत् सर्वशरीरचरं बाह्याऽत्वग्बिभर्ति, यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्द लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्ध लोमकू- पेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणम् । नवाञ्ज- लयः पूर्वस्याऽऽहार-परिणाम-धातोर्यं त रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणि- तस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसायाः, द्वौ मेदसः, एको मज्ज्ञः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य ताव- देव प्रमाणं, तावदेव श्लेष्मणश्चौजस इत्येतच्छरीरतत्त्वमुक्तम् ॥ १७ ॥ शरीर में जो वस्तु अञ्जलि से मापने योग्य है उसका वर्णन करते हैं। इस परिणाम की वृद्धि या ह्रास भी अनुमान द्वारा ही जाना जाता है। प्रत्येक मनुष्य की अपनी अञ्जलि की अपेक्षा से शरीर के अन्दर उदक की मात्रा दस अञ्जलियां है। यह जल अधिक होने पर पुरीष के साथ, मूत्र, रक्त और शरीर के अन्य धातुओं के साथ मिल कर बाहर आता है और जो जल त्वचा के अन्दर व्रण मे पहुचाता है, उसे 'लसीका' कहते है और जो जल शरीर की गरमी के साथ मिल कर लोम कूपों से निकलता है, उसे 'स्वेद' कहते हैं। यह सब जल दस अंजलि परिमाण है। आहार के प्रथम परिणाम धातु रस की नौ अजलिया हैं। रक्त की आठ अजलियां हैं। मल की सात, कफ की छः, पित्त की पाच, मूत्र की चार, वसा की तीन, मेद की दो मज्जा की एक, मस्तिष्क की आधी अंजलि, शुक्र की भी आधी अंजलि और