भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६३ अर्बुद अर्थात् शंख प्रदेश मे २, शिर कपाल ४, वक्ष में १७, इस प्रकार से ३६० अस्थिया पूरी होती हैं । २४-२४ अर्बुद के २४ स्थालक हैं ये सब मिलाकर ७२ हैं ॥ ७ ॥ पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि । तद्यथा-त्वग्, जिह्वा, नासिका, अक्षिणी, कर्णौ च ॥ ८ ॥ इन्द्रियों के आश्रय पाच हैं। जैसे- त्वचा, जिह्वा, नासिका, दो आख और दो कान ॥ ८ ॥ पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि । तद्यथा- स्पर्शन, रसन, घ्राणं, दर्शनं श्रोत्रमिति ॥ ६ ॥ ये पाच बुद्धि इन्द्रिया हैं। जैसे-स्पर्श, रसन, घ्राण दर्शन और श्रोत्र ॥६॥ पञ्च कर्मेन्द्रियाणि । तद्यथा- हस्तौ, पादौ, पायुरुपस्थो, जिह्वा चेति ॥ १० ॥ पाच कर्मेन्द्रिया हैं। यथा - दो हाथ, दो पाव, पायु ( गुदा ), उपस्थ ( लिंग ) और जिह्वा ॥१०॥ हृदय चेतनाधिष्ठानमेकम् ॥ ११ ॥ हृदय एक है, वह चेतना का स्थान है ॥११॥ दश प्राणायतनानि । तद्यथा- मूर्धा कण्ठो हृदयं नाभिः गुदं बस्ति- रोजः शुक्र शोणितं मासमिति । तेषु षट् पूर्वाणि मर्मसंख्यातानि ॥१२॥ प्राण के आयतन स्थान दस है। यथा-मूर्द्धा ( सिर ), कण्ठ, हृदय, नाभि, गुदा ( मलाशय ), बस्ति ( मूत्राशय ), ओज, शुक्र, रक्त और मास । इनमें प्रथम छ मर्म गिने जाते हैं॥ ॥१२॥ पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि । तद्यथा - नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, प्लीहा च, वृक्कौ च, बस्तिश्च, पुरीषाधारश्च, आमाशयश्च, पक्वाशयश्च, उत्तरगुदं च, अधरगुदं च, क्षुद्रान्त्र च, स्थूलान्त्र च, वपावहनं चेति ॥१३॥ कोष्ठ के पन्द्रह अग है। जैसे- नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत, प्लीहा, बुक्क ( वृक्क, गुर्दे ) बस्ति, पुराषाधार ( मलाशय ), आमाशय, पक्वाशय, उत्तर गुदा, अधरगुदा, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र और वपावहन ॥ १३ ॥ ❄ दश प्राणायतनीय अध्याय में - दो शंख, तीन मर्म, कण्ठ, रक्त, शुक्र, ओज और गुदा ये दस गिने हैं। नाभि और मास के गिनने से ये भी मर्म प्राणायतन मानने चाहियें। यहा पर शंख नहीं गिना ।