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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

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तृतीयोच्छ्वासः ] बालबोधिनीव्याख्यासहितम् । २३७ (२१) सा च सुभ्रूः सुषीमकामा शनैरुपेत्य तत्र मामदृष्ट्वा बलवद- व्यथिष्ट । व्यसृजच्च मत्तराजहंसीव कण्ठरागवल्गुगद्गदां गिरम्—'व्यक्त- मस्मि विप्रलब्धा । नास्त्युपायः प्राणितुम् । अयि हृदय, किमिदमकार्यं कार्यवदध्यवसाय तदसम्भवेन किमेवमुत्ताम्यसि । भगवन् पञ्चबाण, कस्तवापराधः कृतो मया यदेवं दहसि; न च भस्मीकरोषि' इति । (२२) अथाहमाविर्भूय विवृतदीपभाजनः 'भामिनि, ननु बह्वपराधं

(२१) सा कल्पसुन्दरी । सुषीमकामा सुषीमं शिशिरं कामयते या तथा शैत्यार्थिनी । शनैर्मन्दम् । तत्र संकेतागारे । मामुपहारवर्माणमित्यर्थः । बलवत् सातिशयम् । अभ्यथिष्ट-पीडिताऽभवत् । कण्ठेति-कण्ठरागेण कण्ठस्वरेण वल्गुः सुन्दरो गद्गदोऽस्पष्टभाषणं यस्यां तादृशीम् । गिरं व्यसृजत् उक्तवती । व्यक्तं स्फुटम् । विप्रलब्धा-प्रतारिता । प्राणितुं-जीवितुम् । अयि हृदयेति स्वहृदयं सम्बोध्य ब्रवीति । किमिदं किं प्रक्रान्तं त्वयेत्यर्थः । अकार्यम् अकरणीयम् । कार्यवत् कार्येण तुल्यम् अध्यवसाय निश्चित्य । तदसंभवेन-कार्यासंभवेन किं कथम् । एवं एवं प्रका- रण । उत्ताम्यसि-खिद्यसे । तव-तव सकाशे । दहसि-तापयसि । भस्मीकरोषि भस्म- सात्करोषि-प्राणानापहरसीति एतादृशात् तापात्मृत्युरपि श्रेयानिति भावः । (२२) अथ कल्पसुन्दरीपरिदेवनानन्तरम् । अहम् उपहारवर्मा । आविर्भूय— कल्पसुन्दर्याः पुरः प्रकटीभूय विवृतदीपभाजनः समुद्घाटितप्रदीपसंपुटकः । भामिनि

(२१) वह सुन्दर भौंहवाली कल्पसुन्दरी धीरे-धीरे उस गर्भागार में शीतलता की अभिलाषा से आयी और उस संकेतस्थल में मुझे न देख कर के अतिशय पीड़ित हुई । उन्मत्तावस्थाको प्राप्त राजहंसी के सदृश कण्ठस्वर से सुन्दर अस्फुट वाणी से कहने लगी । हन्त ! मैं निश्चय ही स्पष्ट रीति से प्रतारित हुई । अब जीवन रहनेका कोई साधन नहीं मालूम पड़ता है । ( अपने चित्तको सम्बोधित करती हुई कहने लगी—)'हे चित्त ! तुमने इस अकरणीय कार्य में करणीय कार्य के समान निश्चय करके मुझे प्रवृत्त कराया और उसके असम्भव होनेपर ( असिद्ध होनेपर ) मुझे क्यों ताप दे रहे हो । हे भगवन् ! हे पञ्चबाण !! आपका मैंने कौन सा अपराध किया है जो आप मुझे इस प्रकार से दह रहे हैं किन्तु भस्म नहीं करते हैं।' ( हा ! ऐसे दुःख से तो मृत्यु अच्छी होती है ।) (२२) कल्पसुन्दरीकी ऐसी वेदनाओंके सुनने के अनन्तर मैं (उपहारवर्मा) उस गर्भागारसे प्रकट हो गया । और प्रदीपसम्पुटको समुद्घाटित करके उस कल्पसुन्दरीसे बोला—'हे कोपने ! आपके द्वारा कामदेवके अनेक अपराध किये गये हैं । देखिये, आपको