BharatKosha
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

Page 3 of 474

Read in context
Page 3

प्रथमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ३ श्रेयस्त्रैविक्रमस्ते वितरतु विबुधद्वेषिणां कालदण्डः ॥ कालदण्डो यमदण्डस्वरूपः, त्रिविक्रमस्यायमिति त्रैविक्रमो विष्णुसम्बन्धी अङ्घ्रि- श्चरणो दण्ड इवेत्यङ्घ्रिदण्डश्चरणदण्डस्ते तुभ्यं तव वा श्रेयो मङ्गलं सुकृतं वा वितरतु ददातु । अत्र रूपकालङ्कारसंसृष्टिः । ब्रह्माण्ड-क्षोणी-स्वर्गाङ्गासु छत्र-नौ-पट्टिकानामा- रोपो भगवच्चरणे दण्ड-कूपदण्ड-ध्वजदण्डत्वारोपे हेतुरिति परम्परितरूपकं तच्चात्रा- श्लिष्टशब्दनिबन्धनम् । ज्योतिश्चक्राक्षदण्डेत्यत्र तु चक्रशब्दस्य श्लिष्टत्वात् श्लिष्ट- शब्दनिबन्धनम् । अन्यत्र तु केवलं निरङ्गरूपकम् । तेषाञ्च परस्परनिरपेक्षत्वात् संसृष्टिः । वृत्तञ्चात्र स्रग्धरा । वह चरण क्या, मानो ब्रह्माण्डरूपी छत्रका स्वर्णमय दण्ड है । अथवा ब्रह्माके उत्पत्ति स्थानरूपी कमलका नाल-दण्ड है । वा पृथ्वीरूपी नौकाका कूपदण्ड (*गुनरखा) है । अथवा स्वर्गसे गिरनेवाली आकाशगंगारूपी पताकाका केतुदण्ड है । अथवा चन्द्रादि नक्षत्रोंके ज्योतिषचक्रका अक्षदण्ड है । अथवा भगवान्‌के त्रैलोक्य-विजयको सूचित करने- वाला सूचक स्तम्भ है तथा इन्द्रादि देवोंके शत्रुओंको ताड़ना देनेवाला कालदण्ड है । व्युत्पत्ति इस श्लोकमें प्रतिपादके अन्तमें आठ बार दण्ड शब्द व्यवहृत हुआ है तथा प्रतिपादके पाँचवें अक्षरके पश्चात् यह शब्द आया है । अतः पादान्त्यानुप्रास और पदान्त्यानुप्रास इसे कहना चाहिये । हिन्दीमें इसे तुकान्त कविता कहा जाता है । परन्तु चौथे पादमें पाँच अक्षरोंके पश्चात् पदान्त्यानुप्रास कुछ शिथिल है क्योंकि वहाँ दण्ड शब्द व्यवहृत नहीं है । यति स्थल में दण्डः शब्द है परन्तु, अङ्घ्रिके पूर्व दण्डो होनेसे स्वरूप-प्रक्रमभंगदोष कहा जा सकता है । यदि प्रकारान्तरसे ये शब्द रचे जायें तो निर्दोष हो जायेंगे । तीनों भुवनोंको जीतनेके लिए भगवान् वामनने तीन बार पैरको विस्तृत किया इसी भावको झलकानेके लिए त्रिभुवन एवं त्रैविक्रम पद विशेषणरूपसे द्योतित किये गये हैं । अतः इसे परिकरालंकार जानना चाहिये । दण्डी कवि भगवान् वामनके चरणकमलोंमें श्रद्धासे नतमस्तक हो रहे हैं । इससे यहाँ शुद्ध भक्ति प्रकट हो रही है। अंघ्रि अर्थात् चरण- को दण्डरूप मानकर सात स्वरूपोंमें उसे व्यक्त करनेका प्रयास किया गया है जिससे यहाँ रूपकालंकार है । वही रूपक ब्रह्माण्डच्छत्रदण्डः क्षोणीनौकूपदण्डः क्षरदमरसरित्पट्टिका- केतुदण्डः आदि तीनों चरणोंमें अश्लिष्ट परम्परित है तथा 'ज्योतिश्चक्राक्षदण्डः' में श्लिष्ट- परम्परित है, अन्य शेष स्थलोंमें साधारण है । इस सम्पूर्ण ग्रन्थमें पदे-पदे अनुप्रास तथा यमकालंकार आये हैं । अतः उन्हें मैं न

  • गुनरखा—अनुकूल पवनकी ओर बिना पतवार नौका ले जाते समय जो बाँस जलमें धँसाया जाता है उसे मल्लाह लोग गुनरखा कहते हैं ।