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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४६

क्वचिच्छून्यमठिकायां मात्राः समवतार्य, तद्रक्षणनियुक्तराजपुत्रः, कृतकु- शीलववेषलीलः प्रचण्डवर्माणमेत्यान्वरञ्जयम् अनुरञ्जितातपे तु समये, जनसमाजज्ञानोपयोगीनि संहृत्य नृत्यगीतनानारुदितादिहस्तचङ्क्रम- णमूर्ध्वपादालतपादपीठवृश्चिकमकरलङ्घनादीनि मत्स्योद्धर्त्तनादीनि च कारणानि, पुनरादायादायासन्नवर्तिनां छुरिकाःताभिरुपाहितवर्मा चित्र- दुष्कराणि करणानि श्येनपातोत्क्रोशपातादीनि दर्शयन्, विंशतिचापा-

प्रत्ययः । मात्राः कल्यादिपरिच्छेदान् । मात्रा परिच्छेदेऽल्पेंऽशे इति कोषात् । तद्र- क्षणे मात्रासंरक्षार्या नियुक्तो राजपुत्रो येनासौ । कृतकुशीलवेति-कुशीलवच्छद्म- नेत्यर्थः । अनुरञ्जितो रक्त आतपो यस्मात्-दिवावसानकाले । जनसमाजस्य लोकसमूहस्य ज्ञानोपयोगीनि यथा लोकाः ज्ञातुं प्रभवेयुस्तथाभूतानि । संहृत्य दर्शयित्वा । नृत्यं नर्त्तनं, गीतं गानं नानारुदितादि नानाविधक्रन्दनानुकारि शब्दादि, हस्तचक्रमणम् इतस्ततो हस्तभ्रामगम्, ऊर्ध्वपादोऽलातपादश्चेति नृत्य- विशेषौ, वृश्चिकलंघनं वृश्चिकेन क्रीडनं मकरलंघनपि तथा । द्वन्द्वान्ते बहुव्रीहिः। मत्स्योद्धर्त्तनं मीनविलसितम् । करणानि क्रियाविशेषान् । आदायादाय विश्वासो- त्पादनार्थं पुनःपुनर्गृहीत्वा । आसन्नवर्त्तिनां समीपस्थितानाम् । छुरिकाः शस्त्रिकाः । आदायेत्यस्य कर्म । ताभिश्च्छुरिकाभिः । उपाहितवर्म्मा संयुक्तशरीरः । चित्रदुष्क- राणि चित्राणि आश्चर्याणि दुष्कराणि अन्यैः कर्तुमशक्यानि । श्येनः पक्षिविशेषः उत्क्रोशः-कुररपक्षी तद्वत्पातः पतनं तादृशानि । विंशतिचापेति-विंशतिचाप-

राजप्रासाद के एक कोने में वर्तमान शून्य मठ में चले गये । वहाँ पर जाकर हमने कापालिक वेष उतार कर धर दिया और चारण का रूप धारण करके प्रचण्डवर्मा के समीप चले गये । कह-सुनकर समझकर राजकुमार को भी उसकी सेवा में लगा दिया तथा कविता सुनाकर प्रचण्डवर्मा का मनोरंजन करने लगे । जब सायंकाल का समय हुआ और सूर्यभगवान् लाल हो गये तब हमने ऐसा रूप धारण किया जिससे साधारण लोग हमें पहचान न सकें । नृत्य गान, विविध रीति के हाव-भाव, रोदन-हास, हाथ-पाँव मटकाकर दोनों हाथों से पृथिवी पकड़कर शिर घुमाते हुए ऊपर की ओर पैरों को उठाकर स्वांग दिखाये । फिर एक पांव उठाकर दूसरा पैर संकुचित कर नाचने, बिच्छू वा मकर के समान आकार बनाने, मछली के समान रेंगने-उलटने-पुलटने आदि के कौशल दिखाये । तब बाजीगर के समान अपने पास के दर्शकों से छुरियाँ लेकर उनके ऊपर अपनी देह का भार रख दिया-मेरे ऐसे कार्य को देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये क्योंकि वैसे कार्य साधारण लोग नहीं कर सकते थे। तत्पश्चात् कुररी पक्षी के समान

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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