दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
by महाकवि दण्डी
Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)
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Read in contextCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF ४५० . दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां न्तरालावस्थितस्य प्रचण्डवर्मणश्छुरिकयैकया प्रत्युरसं प्रहृत्य, 'जीव्या- द्वर्षसहस्रं वसन्तभानुः' इत्यभिगर्जन्, मद्गात्रमुत्कर्त्तुमुद्यतासेः कस्यापि चारभटस्य पीवरासबाहुशिखरमाक्रम्य, तावतैव तं विचेतीकुर्वन्, आकुलं च लोकमुच्चक्षुकुर्वन्, द्विपुरुषोच्छ्रितं प्राकारमत्यलङ्घ्यम् । ( ३३ ) अवप्लुत्य चोपवने 'मदनुपातिनामेष पन्था दृश्यते' इति ब्रुवाण एव नालीजङ्घसमीकृतसैकतास्पृष्टपादन्यासया तमालवीथ्या चानु- मशीतिहस्तपरिमाणं तत्प्रमाणेडन्तराले दूरेऽवस्थितस्य वर्त्तमानस्य । प्रत्युरसं वक्षसि । विभक्त्यर्थेऽव्ययीभावः । उत्कर्त्तं छेत्तुम् । उद्गतासेः गृहीतखड्गस्य । चारश्चरः स चासौ भटो योद्धा चेति । पीवरौ स्थूलौ अंसौ ययोस्तयोर्बाह्वोः करयोः शिखरं मूर्द्धभागम् । तावता तन्मात्रेणैव । आकुलं सम्भ्रान्तम् । उच्चक्षुकुर्वन् ऊर्द्ध्वनेत्रं सम्पादयन् । द्विपुरुषोच्छ्रितं पुरुषद्वयप्रमाणोन्नतम् । (३३) अवप्लुत्य उल्लङ्घ्य । मदनुपातिनां मामनुधावताम् । पन्था गति- रित्यर्थः । यो मां धर्तुं धाविष्यति स एवं हतो भविष्यतीति भावः । नाली- जंघेति-नालीजंघेन समानीकृतेन समीकृतेन सैकतेन बालुकामयस्थानेन अपृष्टोऽ- लग्नो यः पादस्तादृशस्य न्यासो निक्षेपो यस्यां तथा। पादचिह्नगोपनार्थमेतत् । रोदन का तथा वाज पक्षी के समान झपट्टा मारने का काम लोगों को दिखाया । उस समय हमसे प्रचण्डवर्मा बीस धनुष ( ८० हाथ) दूरी पर बैठा हुआ था। खेल के कौतूहल को करते करते हम उसके समीप जा पहुँचे और उसी की कटार लेकर उसी के पेट में भोंक दी तथा 'महाराज वसन्तभानु सहस्रों वर्ष तक विजयी होकर जीवें' ऐसा कहते हुए चिल्ला उठे । इसी समय उन गुप्तचरों में से किसी वीर योद्धा ने हमारे ऊपर आक्रमण करने को तलवार उठायी । झट से हमने उसका हाथ झपटकर पकड़ लिया। फिर उसे मूर्च्छित करके हमने उन चिन्तित जनों के समुदाय को अपनी ओर आकृष्ट किया और दो पुरुषों की लम्बाई के बराबर (दो पुरुसा) ऊँची चहारदीवारी को लाँघ कर (पार करके) भाग आये । (३३) और उसके बाहर होकर हम उपवन में पहुँचे। जो लोग हमारा पीछा कर रहे थे उन्हें 'यही मार्ग दीख पड़ता है' कहते हुए हम नालीजंघ के द्वारा समतल किए हुए बालुकामय स्थल को बिना स्पर्श किये ही अर्थात् अति तेजी से प्राकार के इधर-उधर तमाल कुंजों में होकर पूर्व दिशा की ओर भाग निकले। परन्तु, आगे जाने पर ईंटों का एक ऊँचा टीला आ पड़ा। इस कारण हमें पुनः पश्चिम की ओर लौटना पड़ा। पुन Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu