BharatKosha
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

Page 760 of 889

Read in context
Page 760
अ० ६ ]षष्ठ स्कन्ध७५१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चित्तं ते प्रीतिसंयुक्तं करिष्यति तु साम्प्रतम्।<br>सत्याधारा धरा नूनं सत्येन च दिवाकरः॥ २१<br>तपत्ययं यथाकालं वायुः सत्येन वात्यथ।<br>उदन्वानपि मर्यादां सत्येनैव न मुञ्चति॥ २२<br>तस्मात्सत्येन सख्यं वा भवत्वद्य यथासुखम्।<br>एकत्र शयनं क्रीडा जलकेलिः सुखासनम्॥ २३<br>युवाभ्यां सर्वथा कार्यं कर्तव्यं सख्यमेत्य च।परिपूर्ण कर देंगे। सत्यके आधारपर ही यह पृथ्वी स्थित है, सत्यसे ही भगवान् सूर्य नित्य तपते हैं, सत्यसे ही समयके अनुसार वायु बहती है और सत्यके कारण ही समुद्र भी अपनी मर्यादाका परित्याग नहीं करता। इसलिये सत्यके आधारपर ही आज आप दोनोंमें मित्रता हो जाय, जिससे आपलोग सुखपूर्वक साथ-साथ शयन, क्रीडा, जलकेलि कर सकें और बैठ सकें। इसलिये आप दोनोंको एकत्रित होकर अवश्य ही मित्रता कर लेनी चाहिये॥ १९—२३ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>महर्षिवचनं श्रुत्वा तानुवाच महामतिः॥ २४<br>अवश्यं भगवन्तो मे माननीयास्तपस्विनः।<br>भवन्तो मुनयः क्वापि न मिथ्यावादिनो भृशम्॥ २५<br>सदाचाराः सुशान्ताश्च न विदुश्छलकारणम्।<br>कृतवैरे शठे स्तब्धे कामुके च गतत्विषि॥ २६<br>निर्लज्जे नैव कर्तव्यं सख्यं मतिमता सदा।<br>निर्लज्जोऽयं दुराचारो ब्रह्महा लम्पटः शठः॥ २७<br>न विश्वासस्तु कर्तव्यः सर्वथैवेदृशे जने।<br>भवन्तो निपुणाः सर्वे न द्रोहमतयः सदा॥ २८<br>अनभिज्ञास्तु शान्तत्वाच्चित्तानामतिवादिनाम्।व्यासजी बोले—उन महर्षियोंका वचन सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् वृत्रासुरने कहा—हे भगवन्! आप सभी तपस्वीगण मेरे मान्य हैं। आप मुनिगण कभी असत्य भाषण नहीं करते। आपलोग सदाचारी तथा अति शान्त स्वभाववाले हैं और छल करना नहीं जानते। किंतु वैरी, मूर्ख, जड़, कामी, कलंकित और निर्लज्जसे बुद्धिमान्‌को मित्रता नहीं करनी चाहिये। यह (इन्द्र) निर्लज्ज, दुराचारी, ब्राह्मणघाती, लम्पट और मूर्ख है—इस प्रकारके व्यक्तिका विश्वास नहीं करना चाहिये। आप सभी लोग कुशल हैं, किंतु द्रोह-बुद्धिवाले कभी नहीं हैं। आप सब शान्तचित्त होनेके कारण अतिवादियोंके मनकी बात नहीं जानते॥ २४—२८ १/२ ॥
मुनय ऊचुः<br>जन्तुः कृतस्य भोक्ता वै शुभस्य त्वशुभस्य च॥ २९<br>द्रोहं कृत्वा कुतः शान्तिमाप्नुयान्नष्टचेतनः।<br>विश्वासघातकर्तारो नरकं यान्ति निश्चयम्॥ ३०<br>दुःखं च समवाप्नोति नूनं विश्वासघातकः।<br>निष्कृतिर्ब्रह्महन्तॄणां सुरापानां च निष्कृतिः॥ ३१<br>विश्वासघातिनां नैव मित्रद्रोहकृतामपि।<br>समयं ब्रूहि सर्वज्ञ यथा ते चेतसि ध्रुवम्॥ ३२<br>तेनैव समयेनाद्य सन्धिः स्यादुभयोः किल।मुनि बोले—प्रत्येक प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगता है। जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी हो, वह द्रोह करके भी क्या शान्ति प्राप्त कर सकता है? विश्वासघात करनेवाले निश्चय ही नरकमें जाते हैं। विश्वासघाती निश्चितरूपसे दुःख प्राप्त करता है। ब्राह्मणकी हत्या करनेवालों और मद्यपान करनेवालोंके लिये तो प्रायश्चित्त है, परंतु विश्वासघातियों और मित्रद्रोहियोंके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। अतः हे सर्वज्ञ! आपने मनमें जो शर्त निश्चय कर रखी हो, उसे बताइये; जिससे उस शर्तके अनुसार आज ही आप दोनोंमें सन्धि हो जाय॥ २९—३२ १/२ ॥
वृत्र उवाच<br>न शुष्केण न चार्द्रेण नाश्मना न च दारुणा॥ ३३<br>न वज्रेण महाभाग न दिवा निशि नैव च।<br>वध्यो भवेयं विप्रेन्द्राः शक्रस्य सह दैवतैः॥ ३४<br>एवं मे रोचते सन्धिः शक्रेण सह नान्यथा।वृत्रासुर बोला—हे महाभाग! सभी देवताओंसहित इन्द्र न शुष्क या गीली वस्तुसे, न पत्थरसे, न काष्ठसे, न वज्रसे, न दिनमें और न रातमें मेरा वध कर सकें। हे विप्रेन्द्रो! इसी शर्तपर मैं इन्द्रसे सन्धि करना चाहता हूँ, अन्यथा नहीं॥ ३३—३४ १/२ ॥